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हजारों की भीड़ ने गुस्से के साथ दिखाया अनुशासन
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मुरादाबाद (उमेश शर्मा)। उनका जो काम है अहल-ए-सियासत जाने, अपना पैगाम है मोहब्बत जहां तक पहुंचे का एलान करने वाले जिगर के शहर का यह मिजाज काबिल ए तारीफ है। सड़कों पर हजारों की भीड़ थी। भीड़ में शामिल हर शख्स के चेहरा तमतमाया था और मुट्ठियां गुस्से से भिंची हुई थीं। कड़ाके की ठंड के बीच गरम हुए माहौल में सरकार के खिलाफ नारे बुलंद हो रहे थे। लेकिन इस भीड़ में गजब का अनुशासन था। न किसी सरकारी और सार्वजनिक संपत्ति को किसी ने नुकसान पहुंचाया न ही अभद्र शब्द प्रदर्शनकारियों के मुंह से सुनाई दिए। भीड़ के बीच से रह रहकर हिंदुस्तान जिंदाबाद की गूंज उठ रही थी। मुस्लिम आंदोलनों और आयोजनों में आम तौर पर गूंजने वाला नारा ए तकबीर का नारा यहां एकाध को छोड़ बाकी किसी ने नहीं लगाया। पड़ोस के जिलों में सुलग रही हिंसा के बीच शहर में इतनी बड़ी भीड़ का अनुशासित रहना वाकई काबिल ए तारीफ है।
मुगलपुरा थाने से चंद कदमों की दूरी पर स्थित जामा मस्जिद चौराहा यूं तो कई प्रदर्शनों और आयोजनों का गवाह रहा है। लेकिन शुक्रवार को हुआ विरोध प्रदर्शन कई मायनों में अलग और अहम था। प्रदर्शनकारियों के अनुशासन ने इस प्रदर्शन की धार तेज कर दी है। शुक्रवार को यहां नजारा बदला था। नमाज से कुछ देर पहले जामा मस्जिद पहुंचे युवाओं के माथे पर काली पट्टी बंधी थी और हाथों में तिरंगा लगा था। इन युवाओं ने पहुंचते ही जामा मस्जिद की दीवारों पर तिरंगे लगाना शुरू कर दिए। इनके पीछे भी प्रदर्शनकारियों के जो जत्थे आए वो हाथों में एनआरसी और सीएए के विरोध के स्लोगन के साथ ही तिरंगा भी थामे थे। मोदी के शाह के खिलाफ नारे खूब गूंजे लेकिन प्रदर्शनकारी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने से परहेज करते रहे। हजारों की इस भीड़ के सड़क पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन का श्रेय खुद लेकर बेशक अफसरशाही अपनी पीठ थपथपा लेकिन इसका असल श्रेय शहर की पब्लिक को ही जाता है। सड़क पर उतरने के बाद भीड़ न तो नेताओं के नियंत्रण में रहती है न ही प्रशासन के काबू में। खासकर तब जब पड़ोस के जिलों में चिंगारियां सुलग रही हों। लेकिन जिगर के शहर ने शुक्रवार को एक अनुशासित और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करके उन शहरों को भी अमन का पैगाम भेजा है जो एनआरसी और सीएए के विरोध के बहाने नेताओं के बहकावे में आकर सुलग रहे हैं।
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मुगलपुरा थाने से चंद कदमों की दूरी पर स्थित जामा मस्जिद चौराहा यूं तो कई प्रदर्शनों और आयोजनों का गवाह रहा है। लेकिन शुक्रवार को हुआ विरोध प्रदर्शन कई मायनों में अलग और अहम था। प्रदर्शनकारियों के अनुशासन ने इस प्रदर्शन की धार तेज कर दी है। शुक्रवार को यहां नजारा बदला था। नमाज से कुछ देर पहले जामा मस्जिद पहुंचे युवाओं के माथे पर काली पट्टी बंधी थी और हाथों में तिरंगा लगा था। इन युवाओं ने पहुंचते ही जामा मस्जिद की दीवारों पर तिरंगे लगाना शुरू कर दिए। इनके पीछे भी प्रदर्शनकारियों के जो जत्थे आए वो हाथों में एनआरसी और सीएए के विरोध के स्लोगन के साथ ही तिरंगा भी थामे थे। मोदी के शाह के खिलाफ नारे खूब गूंजे लेकिन प्रदर्शनकारी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने से परहेज करते रहे। हजारों की इस भीड़ के सड़क पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन का श्रेय खुद लेकर बेशक अफसरशाही अपनी पीठ थपथपा लेकिन इसका असल श्रेय शहर की पब्लिक को ही जाता है। सड़क पर उतरने के बाद भीड़ न तो नेताओं के नियंत्रण में रहती है न ही प्रशासन के काबू में। खासकर तब जब पड़ोस के जिलों में चिंगारियां सुलग रही हों। लेकिन जिगर के शहर ने शुक्रवार को एक अनुशासित और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करके उन शहरों को भी अमन का पैगाम भेजा है जो एनआरसी और सीएए के विरोध के बहाने नेताओं के बहकावे में आकर सुलग रहे हैं।
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