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बोर्ड परीक्षा: विद्यार्थी ही नहीं, माता-पिता भी झेल रहे मानसिक तनाव

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Tue, 06 Jan 2026 02:16 AM IST
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Board exams: Not only students, but parents too are facing mental stress
मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाओं की तारीखों का ऐलान हो चुका है। जैसे-जैसे परीक्षा का समय नजदीक आ रहा है, बड़ी संख्या में दसवीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों का तनाव बढ़ता जा रहा है। मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र में भी मानसिक समस्याओं से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। इसमें सिर्फ विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि माता-पिता से संबंधित मामले भी आए हैं। अब तक केंद्र पर 68 मामले आ चुके हैं। मनोवैज्ञानिक का कहना है कि प्रतिदिन तीन से चार मामलों की बढ़ोतरी हो रही है।
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दसवीं और 12वीं की परीक्षाएं 18 फरवरी से प्रस्तावित हैं। मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र में 15 दिसंबर से पांच जनवरी तक ऑफलाइन माध्यम से विद्यार्थियों के 48 मामले आए हैं। इसमें 30 मामले हाईस्कूल से संबंधित विद्यार्थियों के हैं, जबकि 18 मामले इंटरमीडिएट के विद्यार्थियों के हैं। इसके अलावा 20 केस अभिभावकों से संबंधित हैं। मनोवैज्ञानिक अधिकारी ने कहा कि याद करने के लिए एकाग्रचित होने की जरूरत है और इसमें समय लगता है, लेकिन बच्चों में धैर्य की कमी हो रही है। यदि किसी बच्चे के यूनिट टेस्ट में कम अंक आए हैं तो वह उसे बोर्ड परीक्षा के परिणाम से जोड़ रहा है। बच्चों के व्यवहार में हो रहे परिवर्तन से अभिभावक भी परेशान हो रहे हैं।
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खुद को थप्पड़ मारता है छात्र
दीनदयाल नगर निवासी युवती ने मनोवैज्ञानिक को बताया कि उसका छोटा भाई दसवीं का छात्र है। पिछले 15 दिन से उसके व्यवहार में असामान्य परिवर्तन देखने को मिल रहा है। वह बैठे-बैठे अचानक चौंक कर उठ जाता है। चिड़चिड़ा भी रहता है। यदि पढ़ने की कहते हैं तो अपने मुंह पर थप्पड़ मारने लगता है और कहता है कि पढ़ना मेरी गलती है। इससे अभिभावक डरे हुए हैं। वहीं, रामतलैया निवासी एक व्यक्ति ने बताया कि उसका बेटा इस बार दसवीं की परीक्षा देगा। यूनिट टेस्ट में कम अंक आए तो वह गुमसुम रहने लगा है। वह अपने बच्चे पर कभी अधिक अंक लाने का दबाव नहीं बनाते हैं। लेकिन अब डर लग रहा है कि यदि उसका पेपर खराब हुआ तो वह अपने साथ कुछ गलत न कर ले।
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दसवीं जैसा परिणाम लाने की चिंता
कक्षा 12 की एक छात्रा ने मनोवैज्ञानिक को बताया कि उसके दसवीं में 89 फीसदी अंक आए थे। परिजन और रिश्तेदार अब बात-बात पर उसी परिणाम जैसे अंक लाने की बात कहते हैं। इसकी वजह से अब याद नहीं होता और हमेशा डर बना रहता है। वहीं, दसवीं के छात्र ने कहा कि क्रिकेट खेलने का शौक है। खे की वजह से तैयारी नहीं हो पा रही है और यदि नहीं खेलूं तो मुझे गुस्सा आने लगता है।

यह करें अभिभावक और विद्यार्थी

- रात को दस बजे सो जाएं और चार बजे उठें। दो घंटा पढ़े हुए चैप्टर को याद करने के लिए निर्धारित करें।

- बच्चों के मित्रों के साथ भी संवाद बनाए रखें।
- जो विद्यार्थी लंबे समय तक एक साथ नहीं पढ़ पाते हैं, उन्हें प्रत्येक एक घंटे बाद दस मिनट का ब्रेक दें।
- प्रतिदिन कम से कम दो घंटे का समय विद्यार्थी सिर्फ लिखने पर दें।
- यदि कम अंक आने या फेल होने का डर लग रहा है तो खुलकर अभिभावकों और शिक्षकों को बताएं।
- मेधावी विद्यार्थियों के साथ कमजोर विद्यार्थियों की तुलना न करें।
- अभिभावक विद्यार्थियों की क्षमता को पहचानें, अपनी इच्छाएं न थोपें।

- विद्यार्थियों को जंक फूड देने के बजाय पौष्टिक खाना दें।
- आधा घंटा योग अवश्य करवाएं, ताकि विद्यार्थियों की एकाग्रता बढ़ सके।

यह हैं लक्षण

एंजाइटी, फोबिया, उल्टी जैसी लगना, भूख न लगना, चक्कर आना, नींद न आना, घर छोड़ने की इच्छा होना, सिर में दर्द, चिड़चिड़ाहट।

वर्जन...
खुद को थप्पड़ मारना एंजाइटी और पेनिक अटैक का लक्षण है। ऐसी स्थिति में बच्चे अपनी क्षमता का विकास करें और शिक्षकों से मूल्यांकन करवाते रहें। आज का कार्य कल पर न टालें। दूसरों के साथ तुलना के बजाय स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाएं। पढ़ाई में निरंतरता बनाए रखें। वहीं अभिभावक बच्चे के साथ लगातार संवाद बनाए रखें। उनके व्यवहार में आए बदलाव को नजरअंदाज न करें, बल्कि विशेषज्ञ से सलाह लेने में हिचक न दिखाएं।

डॉ. कुमार मंगलम सारस्वत, मनोवैज्ञानिक अधिकारी, मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र

ओपीडी में प्रतिदिन दो या तीन मामले आने लगे हैं। ज्यादातर मामलों में दवा के बजाय काउंसिलिंग की आवश्यकता होती है। परिजन बच्चों की प्रतिभा को अंकों से आंकते हैं। अभिभावकों को समझना होगा कि हर बच्चा अपने आप में अनूठा है। उनकी रुचि के हिसाब से यदि मौका दिया जाए तो सफलता के अवसर बढ़ जाते हैं। माता-पिता अपनी उम्मीदों का बोझ बच्चों पर न बनाएं। पढ़ाई के साथ एक या दो घंटे शारीरिक अभ्यास भी बहुत आवश्यक है। इससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
डॉ. अनंत राणा, मनोरोग विशेषज्ञ
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