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मां भारती का रक् त से तिलक कर गया
Updated Wed, 08 Aug 2018 02:29 AM IST
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मुरादाबाद।
आजादी का आधार देशभक्तों की रक्त रंजित शिलाओं पर टिका है। युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ ही बच्चों ने भी बलिदानियों के शिलालेख पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। ऐसा ही नाम है 11 साल के बाल शहीद जगदीश प्रसाद का। आजादी का सपना आंखों में लिए जगदीश प्रसाद मां भारती का अभिनंदन अपने रक्त से कर गया। उसके साथ ही इतिहास के अध्याय का साक्षी बन गया वह खंभा... जिस पर वह शहीद हुआ था।
मंडी चौक से आगे पान दरीबा पर शहीद स्मारक है। इसको शहीद स्तंभ के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान देशभक्तों की तीर्थ स्थली बन गया है। इसका श्रेय जाता है 11 साल के बाल शहीद जगदीश प्रसाद को। इसको मातृभूमि को आजाद कराने का जज्बा ही कहा जाएगा कि खेलने और नासमझ समझी जाने वाली उम्र में जगदीश प्रसाद शहीदोें की अग्रिम पंक्ति में जाकर खड़ा हो गया। स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकार समिति के प्रवक्ता धवल दीक्षित ने बताया कि नौ अगस्त 1942 को देश में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था। इसके चलते गोरों की पुलिस ने रात में देश भक्तों को गिरफ्तार कर लिया था। उसके विरोध में पान दरीबा पर लोगों की विशाल सभा हो रही थी। लोगों में देशभक्ति हिलोरे मार रही थी। इसी दौरान अंग्रेज कप्तान पुलिस टीम के साथ वहां पहुंचा और देशभक्तों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। जब इस पर भी मां भारती के दीवाने पीछे नहीं हटे तो उसने गोली चलवा दी। इस दौरान 11 साल का जगदीश प्रसाद जोर-जोर से नारे लगाने लगा, लेकिन वह भीड़ में दिखाई नहीं दे रहा था। देशभक्ति के उत्साह से सराबोर जगदीश प्रसाद विद्युत पोल पर चढ़कर नारा लगाने लगा। यह देख आग-बबुला हुए अंग्रेज अफसर ने बच्चे को गोली मार दी। जगदीश प्रसाद का सीना चीरकर गोली लोहे के विद्युत पोल में जा घुंसी। सीने से बहती रक्तधार ने पहले मातृभूमि का अभिनंदन किया, उसके बाद जगदीश प्रसाद मां भारती की गोद में चिर निद्रा में लीन हो गया। शहीद स्तंभ पर गोली से छेद हुआ खंभा आज भी लगा है। मुरादाबाद को मुल्क में पहचान देने वाले और सात समंदर पार तक अपने शौर्य का खौफ पैदा करने वाले जगदीश प्रसाद का बलिदान स्थल लोगों के दिलों में देशक्ति का जज्बा प्रगाढ़ कर रहा है।
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आजादी का आधार देशभक्तों की रक्त रंजित शिलाओं पर टिका है। युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ ही बच्चों ने भी बलिदानियों के शिलालेख पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। ऐसा ही नाम है 11 साल के बाल शहीद जगदीश प्रसाद का। आजादी का सपना आंखों में लिए जगदीश प्रसाद मां भारती का अभिनंदन अपने रक्त से कर गया। उसके साथ ही इतिहास के अध्याय का साक्षी बन गया वह खंभा... जिस पर वह शहीद हुआ था।
मंडी चौक से आगे पान दरीबा पर शहीद स्मारक है। इसको शहीद स्तंभ के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान देशभक्तों की तीर्थ स्थली बन गया है। इसका श्रेय जाता है 11 साल के बाल शहीद जगदीश प्रसाद को। इसको मातृभूमि को आजाद कराने का जज्बा ही कहा जाएगा कि खेलने और नासमझ समझी जाने वाली उम्र में जगदीश प्रसाद शहीदोें की अग्रिम पंक्ति में जाकर खड़ा हो गया। स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकार समिति के प्रवक्ता धवल दीक्षित ने बताया कि नौ अगस्त 1942 को देश में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था। इसके चलते गोरों की पुलिस ने रात में देश भक्तों को गिरफ्तार कर लिया था। उसके विरोध में पान दरीबा पर लोगों की विशाल सभा हो रही थी। लोगों में देशभक्ति हिलोरे मार रही थी। इसी दौरान अंग्रेज कप्तान पुलिस टीम के साथ वहां पहुंचा और देशभक्तों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। जब इस पर भी मां भारती के दीवाने पीछे नहीं हटे तो उसने गोली चलवा दी। इस दौरान 11 साल का जगदीश प्रसाद जोर-जोर से नारे लगाने लगा, लेकिन वह भीड़ में दिखाई नहीं दे रहा था। देशभक्ति के उत्साह से सराबोर जगदीश प्रसाद विद्युत पोल पर चढ़कर नारा लगाने लगा। यह देख आग-बबुला हुए अंग्रेज अफसर ने बच्चे को गोली मार दी। जगदीश प्रसाद का सीना चीरकर गोली लोहे के विद्युत पोल में जा घुंसी। सीने से बहती रक्तधार ने पहले मातृभूमि का अभिनंदन किया, उसके बाद जगदीश प्रसाद मां भारती की गोद में चिर निद्रा में लीन हो गया। शहीद स्तंभ पर गोली से छेद हुआ खंभा आज भी लगा है। मुरादाबाद को मुल्क में पहचान देने वाले और सात समंदर पार तक अपने शौर्य का खौफ पैदा करने वाले जगदीश प्रसाद का बलिदान स्थल लोगों के दिलों में देशक्ति का जज्बा प्रगाढ़ कर रहा है।
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