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विंध्याचल बना गौरैया संरक्षण का मिसाल विश्व गौरैया दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष
ब्यूरो, अमर उजाला, मिर्जापुर।
Updated Sat, 19 Mar 2016 07:08 PM IST
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अभियान के तहत विंध्य सेवा मंच की ओर से विंध्य सरस्वती शिशु मंदिर में पोस्टर के जरिए गौरैया के प्रति जागरूक करते बच्चे।
- फोटो : mirzapur
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गौरैया की चर्चा हो और विंध्याचल के शेर कोठी का नाम न आए ये हो नहीं सकता। यहां ढाई दशक से गौरैया संरक्षित है। शेर कोठी निवासी पं. वीेरेंद्र मिश्र को एक गौरैया की मौत ने इतनी गहरी चोट पहुंचाई कि वह गौरैया को बचाने का अभियान ही शुरू कर दिए। अब वह नहीं हैं, लेकिन उनका संकल्प आज भी जिंदा है, उनका पूरा परिवार आज भी गौरैया बचाओ अभियान में जुटा है।
गौरैया बचाओ अभियान के तहत विंध्याचल के शेर कोठी परिसर में गौरैयों के लिए जगह-जगह दाना-पानी की उचित व्यवस्था सहित दीवारों पर इनके रहने के लिए आकर्षक लकड़ी के घोसले टंगे हुए है।
विंध्याचल निवासी पं. वीरेंद्र मिश्र शुरू से ही पक्षी प्रेमी थे, वे रोज पक्षियों को दाना-पानी दिया करते थे, जिससे एक गौरैया का जोड़ा उनके पूजन कक्ष में घोसला बना लिया और धीरे-धीरे उसमें दो चूजे झांकने लगे और चूजों के मां-बाप मिलकर दाना चुगाने लगे, ये दृश्य उनको हर्षाने लगे।
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एक दिन मादा गौरैया जब अपने बच्चों को दाना चुगाने आई तो पूजा कक्ष में लगे पंख से उसका सिर धड़ से अलग हो गया। उस समय श्री मिश्र उसी कमरे में बैठकर पूजा कर रहे थे। यह घटना उनके दिल को झकझोर दिया।
इतने में चूजों का बाप नर गौरैया मादा को न पाकर चहकने लगा, इस पूरे दृश्य को को देखने के बाद श्री मिश्र ने ठान लिया कि जब तक इस गौरैया के बच्चे बड़े होकर उड़ न जाएं तब तक ये पंखे नहीं चलेंगे, जिस दिन चूजे बड़े होकर उड़ गए उस दिन उन्हें काफी खुशी हुई और इस घटना से उनके अंदर गौरैया बचाने की प्रेरणा जागृत हुई जो एक संकल्प का रूप ले लिया।
वर्ष 2005 में पं. विरेंद्र मिश्र के दिवंगत होने के बाद से ही उनके पुत्र मिट्ठू मिश्र एवं उनका पूरा परिवार गौरैया को बचाने के लिए कटिबद्ध है। 1990 के संकल्प की सफलता का एहसास आज भी किया जा सकता है, विंध्याचल के शेर कोठी में आकर घनी बस्ती में भी गौरैयों की चहचहाहट सुना जा सकता है।
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गौरैया बचाओ अभियान के तहत विंध्याचल के शेर कोठी परिसर में गौरैयों के लिए जगह-जगह दाना-पानी की उचित व्यवस्था सहित दीवारों पर इनके रहने के लिए आकर्षक लकड़ी के घोसले टंगे हुए है।
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विंध्याचल निवासी पं. वीरेंद्र मिश्र शुरू से ही पक्षी प्रेमी थे, वे रोज पक्षियों को दाना-पानी दिया करते थे, जिससे एक गौरैया का जोड़ा उनके पूजन कक्ष में घोसला बना लिया और धीरे-धीरे उसमें दो चूजे झांकने लगे और चूजों के मां-बाप मिलकर दाना चुगाने लगे, ये दृश्य उनको हर्षाने लगे।
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एक दिन मादा गौरैया जब अपने बच्चों को दाना चुगाने आई तो पूजा कक्ष में लगे पंख से उसका सिर धड़ से अलग हो गया। उस समय श्री मिश्र उसी कमरे में बैठकर पूजा कर रहे थे। यह घटना उनके दिल को झकझोर दिया।
इतने में चूजों का बाप नर गौरैया मादा को न पाकर चहकने लगा, इस पूरे दृश्य को को देखने के बाद श्री मिश्र ने ठान लिया कि जब तक इस गौरैया के बच्चे बड़े होकर उड़ न जाएं तब तक ये पंखे नहीं चलेंगे, जिस दिन चूजे बड़े होकर उड़ गए उस दिन उन्हें काफी खुशी हुई और इस घटना से उनके अंदर गौरैया बचाने की प्रेरणा जागृत हुई जो एक संकल्प का रूप ले लिया।
वर्ष 2005 में पं. विरेंद्र मिश्र के दिवंगत होने के बाद से ही उनके पुत्र मिट्ठू मिश्र एवं उनका पूरा परिवार गौरैया को बचाने के लिए कटिबद्ध है। 1990 के संकल्प की सफलता का एहसास आज भी किया जा सकता है, विंध्याचल के शेर कोठी में आकर घनी बस्ती में भी गौरैयों की चहचहाहट सुना जा सकता है।