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Mirzapur News: जिउतिया आज, फल और खिलौनों से सजी रहीं दुकानें
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जिउतिया का पर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा। पूर्व संध्या पर बाजार में फल और खिलौने से दुकानें सजी रहीं। रेडीमेड कपड़ों की दुकानों पर भी चहल-पहल रहा। लोग छोटे बच्चों के लिए नये परिधान खरीदने में जुटे रहे।
रमईपट्टी, सिविल लाइन, रामबाग, महुवरिया, वासलीगंज, घंटाघर, मुकेरी बाजार, तेलियागंज, त्रिमुहानी, संगमोहाल व त्रिमोहानी आदि बाजारों में सुबह से ही ग्राहकों की चहल-पहल रही। पुरुष, महिलाएं फल, डलिया, खिलौने व कपड़ों की खरीदारी में जुटे रहे।
पर्व पर सोने और चांदी के जितिया की मांग रहती है। सोने के भाव में आई तेजी के चलते ज्यादातर लोग चांदी के ही जितिया खरीदने में जुटे रहे। त्योहार पर बढ़ी मांग को देखते हुए 40 से 50 रुपये दर्जन बिकने वाला केला पूर्व संध्या पर 50 से 60 रुपये दर्जन बिका।
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इसी तरह सेब के भाव बढ़े रहे। 80 रुपये किलो बिकने वाला सेब शनिवार को बढ़कर 100 व 120 रुपये किलोग्राम बिक रहा था। अन्य फल के दाम भी बढ़े रहे।
जीवित्पुत्रिका व्रत बच्चों की लंबी उम्र और उनकी अच्छी सेहत के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं अपने संतान के खुशहाल जीवन और लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास रखती हैं।
शास्त्रों के अनुसार जितिया करने वाली व्रती महिलाओं के संतान की रक्षा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण करते हैं। ज्योतिषाचार्य पं. चंद्र मौली त्रिपाठी ने बताया कि जीवित्पुत्रिका व्रत हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार ज्योतिषाचार्य ने बताया महाभारत युद्ध में अपने पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज था, वह सीने में बदले की भावना लिए पांडवों के शिविर में घुस गया। शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे। अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझ कर मार डाला।
क्रोध में आकर अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ मे पल रहे बच्चों को मार डाला। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की आजन्मा संतान को देकर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को पुर्न जीवित कर दिया।
भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से बच्चे के जिवित होने के बाद से जीवित्पुत्रिका का नाम दिया गया। तभी से संतान की लंबी आयु और मंगल कामना के लिए हर साल जीवित्पुत्रिका का व्रत मनाया जाता है।
पूजन का मुहूर्त
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 14 सितंबर रविवार को प्रातः 8 बजकर 41 मिनट से प्रारंभ होकर 15 सितंबर सोमवार को प्रातः 6 बजकर 26 मिनट पर समाप्त होगा। जीमूतवाहन की पूजा सायं 3 बजे से लेकर रात्रि 8 बजे तक करना लाभदायक है।
पूजा के लिए नदी ,सरोवर अथवा जल श्रोत के किनारे अथवा घर के स्वच्छ स्थान पर गोबर व मिट्टी से लिपाई कर एक छोटा सा तालाब बनाकर उसमे कुशा से भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित कर पूजन पाठ कर महिलाएं चील और सियारिन की कथा सुनी और सुनाई जाती है।
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रमईपट्टी, सिविल लाइन, रामबाग, महुवरिया, वासलीगंज, घंटाघर, मुकेरी बाजार, तेलियागंज, त्रिमुहानी, संगमोहाल व त्रिमोहानी आदि बाजारों में सुबह से ही ग्राहकों की चहल-पहल रही। पुरुष, महिलाएं फल, डलिया, खिलौने व कपड़ों की खरीदारी में जुटे रहे।
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पर्व पर सोने और चांदी के जितिया की मांग रहती है। सोने के भाव में आई तेजी के चलते ज्यादातर लोग चांदी के ही जितिया खरीदने में जुटे रहे। त्योहार पर बढ़ी मांग को देखते हुए 40 से 50 रुपये दर्जन बिकने वाला केला पूर्व संध्या पर 50 से 60 रुपये दर्जन बिका।
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इसी तरह सेब के भाव बढ़े रहे। 80 रुपये किलो बिकने वाला सेब शनिवार को बढ़कर 100 व 120 रुपये किलोग्राम बिक रहा था। अन्य फल के दाम भी बढ़े रहे।
जीवित्पुत्रिका व्रत बच्चों की लंबी उम्र और उनकी अच्छी सेहत के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं अपने संतान के खुशहाल जीवन और लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास रखती हैं।
शास्त्रों के अनुसार जितिया करने वाली व्रती महिलाओं के संतान की रक्षा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण करते हैं। ज्योतिषाचार्य पं. चंद्र मौली त्रिपाठी ने बताया कि जीवित्पुत्रिका व्रत हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार ज्योतिषाचार्य ने बताया महाभारत युद्ध में अपने पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज था, वह सीने में बदले की भावना लिए पांडवों के शिविर में घुस गया। शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे। अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझ कर मार डाला।
क्रोध में आकर अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ मे पल रहे बच्चों को मार डाला। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की आजन्मा संतान को देकर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को पुर्न जीवित कर दिया।
भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से बच्चे के जिवित होने के बाद से जीवित्पुत्रिका का नाम दिया गया। तभी से संतान की लंबी आयु और मंगल कामना के लिए हर साल जीवित्पुत्रिका का व्रत मनाया जाता है।
पूजन का मुहूर्त
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 14 सितंबर रविवार को प्रातः 8 बजकर 41 मिनट से प्रारंभ होकर 15 सितंबर सोमवार को प्रातः 6 बजकर 26 मिनट पर समाप्त होगा। जीमूतवाहन की पूजा सायं 3 बजे से लेकर रात्रि 8 बजे तक करना लाभदायक है।
पूजा के लिए नदी ,सरोवर अथवा जल श्रोत के किनारे अथवा घर के स्वच्छ स्थान पर गोबर व मिट्टी से लिपाई कर एक छोटा सा तालाब बनाकर उसमे कुशा से भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित कर पूजन पाठ कर महिलाएं चील और सियारिन की कथा सुनी और सुनाई जाती है।