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प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से खतरा
ब्यूरो/अमर उजाला, मिर्जापुर।
Updated Sat, 23 Apr 2016 12:47 AM IST
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भरुहना स्थित कमला मेमोरियल स्कूल में विश्व पृथ्वी दिवस पर पृथ्वी बचाने का संकल्प लेते बच्चे।
- फोटो : mirzapur
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प्राकृतिक सौंदर्य के रूप में विख्यात विंध्य क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या एवं भौतिक सुविधाओं की चाह ने यहां की प्राकृतिक एवं सुरम्य वादियाें पर ग्रहण लगा दिया है। सूखते हुए झरने, वीरान जंगल, जल विहीन नदिया, रेत की चादर भयावह प्राकृतिक संकट का संदेश दे रहे हैं।
प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से भी स्थिति खतरनाक होती जा रही है।
संसाधनों से मनुष्यों द्वारा खिलवाड़ करने के कारण मनुष्यों का जीवन कष्यमय होता जा रहा है। संसाधनों के दोहन के चलते हर क्षेत्र में समस्याएं बढ़ती जा रही है। फिर चाहे जल हो, वन हो, पर्यावरण हो या अन्य कोई संसाधन।
हर क्षेत्र में लोगाें को कड़ा संघर्ष करना पड़ा रहा है। बढ़ती जनसंख्या के चलते प्राकृतिक संसाधनों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। खेती योग्य भूमि के क्षेत्रफल में कमी आ रही है। भूमिगत जलस्तर नीचे जा रहा है।
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नदी नाले और झरने यहां तक की बांध भी सूख गए हैं। हाल यही रहा तो आने वाले दस वर्षों में इस प्राकृतिक धरोधर से परिपूर्ण विंध्य क्षेत्र में भी पानी के लिए लोगाें को संघर्ष करना पड़ेगा। वनों की अंधाधुंध कटाई व पहाड़ाें पर धड़ल्ले से हो रहे अवैध खनन तथा ब्लास्टिंग से जंगल और पहाड़ कम होते जा रहे है।
जंगल में अब सूखे पेड़ और वीरान जमीन दिखाई दे रहे हैं। वन विभाग का आंकड़ा भले ही कुछ बताए लेकिन हकीकत कुछ ऐसा ही है। अवैध रूप से बालू का खनन गंगा में कटान का मुख्य कारण बनता जा रहा है। पहाड़ों पर हो रहा खनन पर्यावरण को प्रदूषित करता जा रहा है। हाल यही रहा तो अगले दस वर्षों में बुंदेलखंड की राह पर विंध्य क्षेत्र भी पहुंच जाएगा।
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प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से भी स्थिति खतरनाक होती जा रही है।
संसाधनों से मनुष्यों द्वारा खिलवाड़ करने के कारण मनुष्यों का जीवन कष्यमय होता जा रहा है। संसाधनों के दोहन के चलते हर क्षेत्र में समस्याएं बढ़ती जा रही है। फिर चाहे जल हो, वन हो, पर्यावरण हो या अन्य कोई संसाधन।
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हर क्षेत्र में लोगाें को कड़ा संघर्ष करना पड़ा रहा है। बढ़ती जनसंख्या के चलते प्राकृतिक संसाधनों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। खेती योग्य भूमि के क्षेत्रफल में कमी आ रही है। भूमिगत जलस्तर नीचे जा रहा है।
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नदी नाले और झरने यहां तक की बांध भी सूख गए हैं। हाल यही रहा तो आने वाले दस वर्षों में इस प्राकृतिक धरोधर से परिपूर्ण विंध्य क्षेत्र में भी पानी के लिए लोगाें को संघर्ष करना पड़ेगा। वनों की अंधाधुंध कटाई व पहाड़ाें पर धड़ल्ले से हो रहे अवैध खनन तथा ब्लास्टिंग से जंगल और पहाड़ कम होते जा रहे है।
जंगल में अब सूखे पेड़ और वीरान जमीन दिखाई दे रहे हैं। वन विभाग का आंकड़ा भले ही कुछ बताए लेकिन हकीकत कुछ ऐसा ही है। अवैध रूप से बालू का खनन गंगा में कटान का मुख्य कारण बनता जा रहा है। पहाड़ों पर हो रहा खनन पर्यावरण को प्रदूषित करता जा रहा है। हाल यही रहा तो अगले दस वर्षों में बुंदेलखंड की राह पर विंध्य क्षेत्र भी पहुंच जाएगा।