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गंगा कटान से कई गांवों का आस्तीव खतरे में

Sat, 11 Aug 2018 12:46 AM IST
Updated Sat, 11 Aug 2018 12:46 AM IST
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गंगा कटान से कई गांवों का आस्तीव खतरे में
छानबे ब्लाक के भिनगौर में हुई कटान
मिर्जापुर। गंगा का जलस्तर घटने के साथ ही तटवर्ती गांवों में हो रही कटान को देख लोग भयभीत हैं। तटों पर स्थित खेत कट कर गंगा में विलीन हो रहे हैं। कई घरों को भी खतरा है। बरियाघाट पर स्थित मंदिर का अस्तित्व खतरे में है। कटान को देखकर नरायनपुर विकास खंड शिवपुर और शेरपुर गांव के लोगों ने सुरक्षित स्थानों पर ठौर ले लिया है। अगर कटान से बचाव का उपाय नहीं किया गया तो कई गांव खतरे में पड़ सकते हैं। नगर के जिला अस्पताल और कचहरी के आसपास भी कटान हो रहा है।
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जिगना: कटान के चलते हरगढ़, भौरुपुर, साटनपट्टी, गोगांव, मिश्रपुर, नगवासी, घुघटी, दुगौली, डंगहर, गौरा, कोठरा मिश्रान, भिलगौर, चड़ैचा, बीजर, नीबी गहरवार, आदमपुर व नौगांव के तटवर्ती लोग चिंतित हैं। गंगा का जलस्तर गिरने के साथ ही खतरा बढ़ गया हैै। कोन के भोगांव, चील्ह, कमासीन, कोल्हुआ हरसिंगपुर, मल्लेपुर आदि गांवों में कटान के कारण पानी गांवों में घुसने लगता है। विकास खंड सिटी में पिपराडाड़ व भटौली घाट का बुरा हाल है। पड़री: कटान के चलते गंगा का रुख गांवो की ओर हो रहा है। क्षेत्र के टौंआ,सरईयां, कठिनई, चंडिका, धरमदेवा, छटहां, छितमपट्टी, माधोपुर, ककरहा में गंगा के किनारे ही अधिक बस्तियां हैं। कटान लोग लेकर लोग चिंतित हैं। छटहां, धरमदेवा आदि गांवों में लोगों ने कटान रोकने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की है जो नाकाफी है। नरायनपुर: कटान के चलते शिवपुर, गांगपुर, रामरायपुर व शेरपुर की हालत खराब बताई जा रही है। ग्रामीणों ने कटान रोकने मांग की लेकिन कोई ठोस उपाय नहीं किया गया।
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गंगा कटान के चलते मंडलीय अस्पताल व कचहरी के कुछ भूभाग पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। बरियाघाट के पास स्थित एक मंदिर कटान के चलते गंगा में विलीन होने के कगार पर है।
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छानबे विकास खंड निफरा निवासी लाल साहब का कहना है कि गंगा कटान से गांवों पर संकट छाया हुआ है। कटान रोकने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। छानबे विकास खंड भिलगौर निवासी रमेश सिंह उर्फ सिंपू का कहना है कि गंगा कटान के चलते गांव के साथ साथ खेतों पर संकट छाया है। सिटी विकास खंड के भटौली गांव निवासी जटाशंकर का कहना है कि हो रहे गंगा कटान के चलते के गांव के अस्तित्व पर संकट छाया हुआ है। सबसे अधिक पिछड़ी जातियों की बस्तियां गंगा की जद में आ सकती है।
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