{"_id":"598a08c94f1c1ba6048b47e1","slug":"91502218441-mirzapur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कंस के हाथ से निकल पर्वत पर विराजमान हुई थीं भगवती","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कंस के हाथ से निकल पर्वत पर विराजमान हुई थीं भगवती
Updated Wed, 09 Aug 2017 12:24 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
मिर्जापुर। द्वापर में कंस की आसुरी शक्ति से मुक्त कराने के लिए मां विंदुवासिनी की अंश ही नंद के घर जन्मी थीं। मां विन्दुवासिनी का जन्मोत्सव भाद्रपद कृष्ण द्वितीया को मनाया जाता है। जिले भर में कजली का उत्सव मनाया जाएगा।
विन्ध्य सेवा मंच के प्रवक्ता व मां विंध्यवासिनी अष्टभुजा जयंती यज्ञ के कार्यक्रम संयोजक मिट़्ठू मिश्र ने बताया हर युग में पूजी जाती रहीं हैं। मां विंध्यवासिनी देवी को विंदुवासिनी भी कहते हैं । विंदु जिसके बिना एक रेखा का भी सृजन नहीं होता उसी प्रकार माँ विन्ध्यवासिनी के बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। मां यहां की प्रधान देवी लक्ष्मी हैं और इच्छा की देवी हैं। जब कंस देवकी की संतानों को मारने लगा तब बासुदेव को संतति के जीवन की चिंता सताने लगी। उन्होंने अपने कुल गुरु गर्ग ऋषि को कारागार में बुलाया और समाधान पूछा। गर्ग ऋषि ने कहा कि आप चिंता न करें, मैं विंदुवासिनी के दरबार में वहां लक्षचंडी यज्ञ करूंगा और मां की कृपा से आपको दीर्घजीवी संतान की प्राप्ति होगी। गर्ग ऋषि ने विन्ध्याचल में शिवलिंग स्थापना कर यज्ञ किया। मां प्रसन्न हुई उन्होंने कहा कि नंद के घर में अवतार लेने किया और बताया कि देवकी के यहां नारायण अवतार लेंगे। भगवती ने भादो कृष्ण पक्ष द्वितीया को नंद के घर जन्म लिया और ठीक छह दिन बाद देवकी के गर्भ से कृष्ण जन्म हुआ। माया के चलते जेल में सब सो गए और श्री कृष्ण सुरक्षित नंद के घर पहुंच गए। बालिका बिंदुवासिनी देवकी के पास आ गईं। कंस ने देवकी की आठवीं संतान समझ कर उन्हें पत्थर पर पटकने चला तो देवी छूट कर आकाश में चली गईं। कंस तुझे मारने वाला पैदा हो चुका है, ऐसा कहती हुई विंध्याचल आ गईं। यही भगवती विंध्य पर्वत पर भक्तों की अष्टभुजाओं से रक्षा करने वाली ज्ञान की देवी माँ अष्टभुजा हैं।
विन्ध्य सेवा मंच के प्रवक्ता व मां विंध्यवासिनी अष्टभुजा जयंती यज्ञ के कार्यक्रम संयोजक मिट़्ठू मिश्र ने बताया हर युग में पूजी जाती रहीं हैं। मां विंध्यवासिनी देवी को विंदुवासिनी भी कहते हैं । विंदु जिसके बिना एक रेखा का भी सृजन नहीं होता उसी प्रकार माँ विन्ध्यवासिनी के बिना इस सृष्टि की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। मां यहां की प्रधान देवी लक्ष्मी हैं और इच्छा की देवी हैं। जब कंस देवकी की संतानों को मारने लगा तब बासुदेव को संतति के जीवन की चिंता सताने लगी। उन्होंने अपने कुल गुरु गर्ग ऋषि को कारागार में बुलाया और समाधान पूछा। गर्ग ऋषि ने कहा कि आप चिंता न करें, मैं विंदुवासिनी के दरबार में वहां लक्षचंडी यज्ञ करूंगा और मां की कृपा से आपको दीर्घजीवी संतान की प्राप्ति होगी। गर्ग ऋषि ने विन्ध्याचल में शिवलिंग स्थापना कर यज्ञ किया। मां प्रसन्न हुई उन्होंने कहा कि नंद के घर में अवतार लेने किया और बताया कि देवकी के यहां नारायण अवतार लेंगे। भगवती ने भादो कृष्ण पक्ष द्वितीया को नंद के घर जन्म लिया और ठीक छह दिन बाद देवकी के गर्भ से कृष्ण जन्म हुआ। माया के चलते जेल में सब सो गए और श्री कृष्ण सुरक्षित नंद के घर पहुंच गए। बालिका बिंदुवासिनी देवकी के पास आ गईं। कंस ने देवकी की आठवीं संतान समझ कर उन्हें पत्थर पर पटकने चला तो देवी छूट कर आकाश में चली गईं। कंस तुझे मारने वाला पैदा हो चुका है, ऐसा कहती हुई विंध्याचल आ गईं। यही भगवती विंध्य पर्वत पर भक्तों की अष्टभुजाओं से रक्षा करने वाली ज्ञान की देवी माँ अष्टभुजा हैं।
विज्ञापन