विजय दिवस: 1971 की लड़ाई में बागपत के जांबाजों ने भी पाकिस्तान को चटाई धूल, 14 सैनिकों ने दी थी शहादत
- पाकिस्तान के खिलाफ सीना तानकर लड़े थे जिले के सैनिक
- साल 1971 की लड़ाई में जिले के 14 सैनिक हुए थे शहीद
विस्तार
वर्ष 1971 के एतिहासिक युद्ध में बागपत जिले के सैनिकों की अग्रणी भूमिका रही थी। पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में जिले के अधिकतर सैनिक बांग्लादेश के मोर्चे पर थे। सैनिक एक इंच पीछे नहीं हटे और विजयश्री दिलाई। लड़ाई में जिले के 14 सैनिक शहीद हुए थे। सर्वोच्च शहादत पर ग्रामीणों को आज भी फख्र है।
इन लाडलों ने दिया था सर्वोच्च बलिदान
जिले के सैनिकों ने सीना तानकर लड़ाई लड़ी। देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। इनमें टीकरी के इकबाल सिंह, दाहा के बलवंत सिंह, मुंशीराम, बड़ौत के सुरेंद्र सिंह, कंडेरा के नेपाल सिंह, ढिकौली के हरपाल सिंह, ढिकाना के जयपाल सिंह, ढिकौली के शीशपाल सिंह, बाछौड़ के धर्मपाल सिंह, छपरौली के नसीबुद्दीन, खेकड़ा के महावीर सिंह, शबगा गांव के जयपाल सिंह, बावली के सुरेंद्र पाल सिंह, बिजरौल के रोहताश सिंह ने अमर बलिदान दिया था।
क्षेत्रीय ग्रामीणों ने दिखाई थी सेना को राह
बालैनी के पूर्व सैनिक दाताराम बताते हैं कि युद्ध में पश्चिमी सेक्टर में तैनाती मिली थी। पश्चिमी सेक्टर में रास्ते के लिए सेना को परेशानी का सामना करना पड़ा था। युद्ध के दौरान बांग्लादेश में क्षेत्र के लोगों ने भी सेना कर पूरा सहयोग किया था। अंजान रास्ते होने के कारण सेना को परेशानी हुई थी, मगर क्षेत्र के लोगों के सहयोग से समस्याएं हल होती गई।
शहीद हुए थे चार सौ जवान, हौसला नहीं खोया
बावली गांव के मेजर शीशपाल सिंह बताते हैं कि उनकी तैनाती बांग्लादेश में आर्म फोर्स में थी। तीन दिसंबर को युद्ध शुरू हुआ था। पाकिस्तान ने 16 दिसंबर को भारतीय सेना के सामने घुटने टेक दिए थे।
युद्ध के दौरान दुश्मन का मोर्चा तोड़ने में उनके मोर्चे के 400 से अधिक जवान एक रात में शहीद हो गए थे। इसके बाद भी सेना के जवानों का हौसला नहीं टूटा था। वर्ष 1971 के युद्ध में सेना को हौसले और जुनून से जीत हासिल हुई थी। युद्ध में पहला हमला बहुत मायने रखता है।