UP: खड़ी-झूला तो कोई सैकड़ों लीटर गंगाजल के साथ लाया कलश, खोड़ी बसेड़ा में सफेद कांवड़ लाने की परंपरा
शिवरात्रि पर जलाभिषेक करने के लिए कांवड़िये शिवालयों की ओर बढ़ रहे हैं। वहीं कुछ पहुंच चुके हैं। हाईवे भोलों के जयकारों से गुंजायमान हो रहा है। कोई झूला कांवड़ व खड़ी कांवड़ ला रहा है तो कोई सफेद कांवड़ लेकर पहुंच रहा है।
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शिवरात्रि पर जलाभिषेक करने के लिए शिवभक्त भोले पवित्र स्थानों से जलाभिषेक के लिए कांवड़ में गंगाजल लेकर तेजी के साथ शिवालयों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। जिससे नगर की सड़कें व गंग नहर पटरी भोलों के जयकारों से गुंजायमान हो रही है। नोएडा के खोड़ी बसेड़ा में केवल सफेद रंग की कांवड़ गांव में लाई जाती है। यहां के युवक गांव की सुख, समृद्धि के लिए पूर्वजों की अनूठी परंमपरा को निभा रहे हैं।
शनिवार की शाम शिवरात्रि पर चौदस का जलाभिषेक होगा। इसके लिए गोमुख, गंगोत्री, ऋषिकेश, हरिद्वार आदि पवित्र स्थानों से कांवड़ में जल भरकर शिवभक्त भोले तेजी के साथ अपने गंतव्यों की ओर बढ़ रहे हैं। मवाना की गंग नहर पटरी तथा मवाना नगर की सड़कें शुक्रवार को पूरी तरह से भोलों के बम बोल आदि के जयकारों से गुंजायमान रही।
कोई खड़ी कांवड़ तो कोई झूला कांवड तो कोई भोला सैकड़ों लीटर गंगाजल के साथ शिवालयों की ओर बढ़ता दिखा। भोलों को देखने तथा उनका पुष्प वर्षा आदि से स्वागत करने के लिए नगर की सड़कों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। वहीं भोलों की सेवा के लिए गंग नहर पटरी पर दर्जनभर से अधिक कांवड़ सेवा शिविर लगे हैं, जो दिन-रात भोलों की सेवा में लगे हैं।
दादा-दादी को कांवड़ में लाए पौत्र
मवाना में भद्रकाली के पास गढ़ी प्रताप नगर निवासी अनिल कुमार, सचिन व राहुल कश्यप पुत्र राजपाल सिंह अपनी दादी समुंद्री देवी (90) तथा दादा प्रेम सिंह (91) को हरिद्वार तीर्थ कराने के लिए लेकर गए थे। वहां से तीनों पौत्रों ने श्रवण कुमार की भूमिका निभाते हुए दादा-दादी को कांवड़ में बैठा लिया और अब पैदल कांवड़ में लेकर आ रहे हैं। साथ में गंगाजल भी है।
सचिन ने बताया कि उन्होंने 4 जुलाई को हर की पैडी से कांवड़ उठाई थी। इससे पहले उनका भाई राहुल कश्यप ही कांवड़ लेकर आता था। इस बार दादा-दादी ने इच्छा व्यक्त की कि उनको भी एक बार हरिद्वार के दर्शन करा दो। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए यह कदम उठाया।
सावन के महीने में शिव आराधना का बड़ा ही महत्व है। इस दौरान जगह-जगह कांवड़ियों की लम्बी कतारें बम बम भोले के जयकारे लगाते हुए दिखती हैं। हर साल श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवड़िए सुदूर स्थानों से आकर गंगाजल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं।
इस दौरान सभी रास्ते व कांवड़ और शिवभक्त केसरिया रंग में रंगे होते है। जिससे भक्तिमय माहौल का रंग केसरिया दिखाई देता है। वहीं, नोएडा के एक गांव में कांवड़ के रंग को लेकर अनूठी परंपरा कई सौ वर्षों से चली आ रही है। इस के शिवभक्त करीब दो सौ साल से अपने ही हाथ की बनी केवल सफेद कांवड़ लेकर ही अपने गांव के शिव मंदिर में जलाभिषेक करते हैं।
श्रावण की चतुर्दशी के दिन शिवभक्त गंगाजल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक करते हैं। ज्यादातर कांवड़ियां केसरी रंग के कपड़े पहनते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा करने से भगवान शिव सभी भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं और जीवन के सभी संकटों को दूर करते हैं। ऐसी ही अनूठी परंमपरा है नोएडा के गांव खोड़ी बसेड़ा की। जहां पिछले कई सौ वर्षों से शिवभक्त अपने पूर्वजों की परंपरा और आस्था के विश्वास को मजबूती से संजोए हुए हैं।
शिवभक्त सन्त कुमार, विकल, बबलू, विष्णु, शैलेन्द्र, अंकित, विशाल, योगेश ने बताया कि गांव खोड़ी बसेड़ा के करीब पचास अधिक लोगों ने हरिद्वार से जल उठाकर कांवड़ लाए हैं। गांव की एक पुरानी परंमपरा है कि सभी शिवभक्त केवल सफेद रंग और अपने हाथों से बनी कांवड़ लेकर ही अपने गांव के शिव मंदिर में जलाभिषेक करेंगे। उन्होंने बताया कि कई सौ वर्षों से पूवजों की परंमपरा और विश्वास की आस्था से हर साल कांवड़ केवल सफेद रंग की ही लाना अपने आप में अनूठी मिसाल है।
उनका कहना है कि पूरे हरिद्वार में लाखों भोलों की भीड़ में इस सफेद रंग की कांवड़ की परंमपरा और विश्वास के बारे मजें सब जानते हैं। गांव वालों का मानना है कि उनके पूर्वजों ने गांव की सुख, शांति और समृद्धि के लिए ही सफेद रंग की कांवड़ को अपनी आस्था का प्रतीक माना था। जिस पर दस हजार की आबादी के सभी ग्रामीण अटूट विश्वास और आस्था रखते हैं।
कांवड़ यात्रा की शुरुआत। कांवड़ यात्रा की शुरुआत के पूर्व फूल-माला के साथ ही घंटी और घुंघरू से सजे दोनों डंडे के दोनों किनारों पर वैदिक अनुष्ठान के साथ गंगाजल या प्रमुख नदियों का जल किसी लटकने वाले पात्र में भरा जाता है। धूप-दीप नैवेद्य की खुशबू के साथ ‘बोल बम’ का नारा लगाते कांवड़ लेकर जाने और जलाभिषेक की कामना आस्थावानों में होती है।