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ब्रह्मजिज्ञासा के मार्ग पर चलना ही सच्ची साधना : आचार्य बलूनी
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रोहटा। बजाज शुगर मिल किनौनी में पाँच दिवसीय सनातन सत्संग ज्ञान यज्ञ का शुभारंभ हुआ। संस्थान
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहटा। बजाज शुगर मिल किनौनी परिसर में आयोजित पांच दिवसीय सनातन सत्संग ज्ञान यज्ञ की पावन यात्रा का शुभारंभ शनिवार को श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ हुआ। आचार्य सुशील चंद्र बलूनी की वाणी से ज्ञानामृत की सरिता प्रवाहित हुई, जिससे उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
आचार्य ने प्रवचन में हिरण्यकश्यप और शूर्पणखा के चरित्रों का गहन विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य का मूल तत्व प्रत्येक युग में समान रहता है चाहे वह सतयुग हो या कलयुग। समयानुसार बाह्य परिस्थितियां और भौतिक विकास अवश्य बदलते हैं, किंतु मनुष्य की आंतरिक प्रवृत्तियां, संस्कार और प्रमुख गुण सदैव अपरिवर्तनीय रहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर स्तर पर परिवर्तन अनिवार्य हैं, परंतु आत्मा के गहन स्तर पर स्थित प्रवृत्तियां शाश्वत और स्थायी होती हैं। यही कारण है कि युगों के परिवर्तन के बावजूद मनुष्य का तात्विक स्वरूप यथावत बना रहता है।
आचार्य ने कहा कि देश, काल, परिस्थिति और भगवद्गीता में वर्णित दिव्य सिद्धांत हमें यह बोध कराते हैं कि समय के अनुरूप वाणी, संवाद और आचरण में परिष्कार आवश्यक है। यही विवेक मनुष्य को धर्ममार्ग और सत्संग की दिशा में अग्रसर करता है। उन्होंने शब्दार्थ स्पष्ट करते हुए बताया कि अथ का अर्थ है अब, अतः का अर्थ है इसलिए, ब्रह्म का अर्थ है परमात्मा, और जिज्ञासा का अर्थ है जानने की इच्छा।
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आचार्य ने भूगोल, खगोल और भूगर्भ के रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मानव शरीर का मूलाधार चक्र वास्तव में भूगर्भ के समतुल्य है। यही चक्र जीवन का आधार है और साधना की प्रथम सीढ़ी के रूप में आत्मिक जागरण का प्रारंभ करता है।
कार्यक्रम के मुख्य यजमान यूनिट हेड केपी सिंह, पंडित डोरी लाल शर्मा, प्रवीन श्रीवास्तव, परमानंद चौहान, संजीव गुप्ता, जयवीर सिंह, पंकज पंवार, आनंद प्रकाश गुप्ता, डीके शुक्ला, नीरज कुमार, धर्मवीर सिंह, जगन्नाथ सिंह, आदेश तोमर, लोकेश राणा, विजय बालियान, मनीष दहिया, आदर्श राठी आदि रहे।
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रोहटा। बजाज शुगर मिल किनौनी परिसर में आयोजित पांच दिवसीय सनातन सत्संग ज्ञान यज्ञ की पावन यात्रा का शुभारंभ शनिवार को श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ हुआ। आचार्य सुशील चंद्र बलूनी की वाणी से ज्ञानामृत की सरिता प्रवाहित हुई, जिससे उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
आचार्य ने प्रवचन में हिरण्यकश्यप और शूर्पणखा के चरित्रों का गहन विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य का मूल तत्व प्रत्येक युग में समान रहता है चाहे वह सतयुग हो या कलयुग। समयानुसार बाह्य परिस्थितियां और भौतिक विकास अवश्य बदलते हैं, किंतु मनुष्य की आंतरिक प्रवृत्तियां, संस्कार और प्रमुख गुण सदैव अपरिवर्तनीय रहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर स्तर पर परिवर्तन अनिवार्य हैं, परंतु आत्मा के गहन स्तर पर स्थित प्रवृत्तियां शाश्वत और स्थायी होती हैं। यही कारण है कि युगों के परिवर्तन के बावजूद मनुष्य का तात्विक स्वरूप यथावत बना रहता है।
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आचार्य ने कहा कि देश, काल, परिस्थिति और भगवद्गीता में वर्णित दिव्य सिद्धांत हमें यह बोध कराते हैं कि समय के अनुरूप वाणी, संवाद और आचरण में परिष्कार आवश्यक है। यही विवेक मनुष्य को धर्ममार्ग और सत्संग की दिशा में अग्रसर करता है। उन्होंने शब्दार्थ स्पष्ट करते हुए बताया कि अथ का अर्थ है अब, अतः का अर्थ है इसलिए, ब्रह्म का अर्थ है परमात्मा, और जिज्ञासा का अर्थ है जानने की इच्छा।
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आचार्य ने भूगोल, खगोल और भूगर्भ के रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मानव शरीर का मूलाधार चक्र वास्तव में भूगर्भ के समतुल्य है। यही चक्र जीवन का आधार है और साधना की प्रथम सीढ़ी के रूप में आत्मिक जागरण का प्रारंभ करता है।
कार्यक्रम के मुख्य यजमान यूनिट हेड केपी सिंह, पंडित डोरी लाल शर्मा, प्रवीन श्रीवास्तव, परमानंद चौहान, संजीव गुप्ता, जयवीर सिंह, पंकज पंवार, आनंद प्रकाश गुप्ता, डीके शुक्ला, नीरज कुमार, धर्मवीर सिंह, जगन्नाथ सिंह, आदेश तोमर, लोकेश राणा, विजय बालियान, मनीष दहिया, आदर्श राठी आदि रहे।