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कौरवान आरक्षित केंद्र के जंगल से काटे जा रहे पेड़
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कौरवान आरक्षित केंद्र के जंगल से काटे जा रहे पेड़
हस्तिनापुर। कस्बे के निकट आरक्षित क्षेत्र कौरवान स्थित जंगल में माफियाओं द्वारा दिनदहाडे़ हरे पेड़ काटकर बेजुबान जंगली जीवों के आवास उजाडे़ जा रहे हैं। जबकि वन विभाग के अधिकारियों को मामले की जानकारी तक नहीं है।
बिजनौर बैराज से लेकर गढ़मुक्तेश्वर तक 2073 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले वन आरक्षित जंगल में दुर्लभ प्रजाति के राष्ट्रीय पक्षी मोर, सांभर, पहाड़ा, हिरन, बारहसिंघा, नीलगाय, तेंदुए, खरगोश, जंगली सूकर आदि के आवास हैं। कस्बे के निकट वन आरक्षित क्षेत्र में पिछले कई दिनों से बेशकीमती लकड़ियों का कटान दिनदहाड़े चल रहा है, जिसे क्षेत्र के लोग काटकर अन्य स्थानों पर बेच रहे हैं। अगर यही सिलसिला लगातार कुछ दिन और चलता रहा तो जंगली जीवों के जीवन पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे। शिकारी भी जंगली जीवों के प्रति सक्रिय हो जाएंगे।
वन आरक्षित क्षेत्र में अधिनियम के तहत किसी भी तरह की लकड़ी काटना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है। जबकि वन विभाग की नाक के तले वन आरक्षित क्षेत्र में बेशकीमती लकड़ियों का कटान धड़ल्ले से चल रहा है।
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प्रतिवर्ष की जाती है कटाई
वन क्षेत्र में पैदा होने वाली बेशकीमती मरोड़ फली का प्रयोग देसी दवाइयों में किया जाता है। इसकी लकड़ी भी बेशकीमती होती है। वन माफिया ने बताया कि मध्य गंगनहर किनारे स्थित वन क्षेत्र इस मरोड़ फली से गुलजार है। जिसके चलते यहां लाखों रुपये की लकड़ी काटी जाती है।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना
रेंजर अधिकारी नवरत्न सिंह का कहना है कि वन जंगल से काटी जा रही मरोड़ फली की लकड़ी का मामला संज्ञान में नहीं है। जानकारी कर लकड़ी काटने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। मामला संज्ञान में नहीं है।
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हस्तिनापुर। कस्बे के निकट आरक्षित क्षेत्र कौरवान स्थित जंगल में माफियाओं द्वारा दिनदहाडे़ हरे पेड़ काटकर बेजुबान जंगली जीवों के आवास उजाडे़ जा रहे हैं। जबकि वन विभाग के अधिकारियों को मामले की जानकारी तक नहीं है।
बिजनौर बैराज से लेकर गढ़मुक्तेश्वर तक 2073 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले वन आरक्षित जंगल में दुर्लभ प्रजाति के राष्ट्रीय पक्षी मोर, सांभर, पहाड़ा, हिरन, बारहसिंघा, नीलगाय, तेंदुए, खरगोश, जंगली सूकर आदि के आवास हैं। कस्बे के निकट वन आरक्षित क्षेत्र में पिछले कई दिनों से बेशकीमती लकड़ियों का कटान दिनदहाड़े चल रहा है, जिसे क्षेत्र के लोग काटकर अन्य स्थानों पर बेच रहे हैं। अगर यही सिलसिला लगातार कुछ दिन और चलता रहा तो जंगली जीवों के जीवन पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे। शिकारी भी जंगली जीवों के प्रति सक्रिय हो जाएंगे।
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वन आरक्षित क्षेत्र में अधिनियम के तहत किसी भी तरह की लकड़ी काटना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है। जबकि वन विभाग की नाक के तले वन आरक्षित क्षेत्र में बेशकीमती लकड़ियों का कटान धड़ल्ले से चल रहा है।
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प्रतिवर्ष की जाती है कटाई
वन क्षेत्र में पैदा होने वाली बेशकीमती मरोड़ फली का प्रयोग देसी दवाइयों में किया जाता है। इसकी लकड़ी भी बेशकीमती होती है। वन माफिया ने बताया कि मध्य गंगनहर किनारे स्थित वन क्षेत्र इस मरोड़ फली से गुलजार है। जिसके चलते यहां लाखों रुपये की लकड़ी काटी जाती है।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना
रेंजर अधिकारी नवरत्न सिंह का कहना है कि वन जंगल से काटी जा रही मरोड़ फली की लकड़ी का मामला संज्ञान में नहीं है। जानकारी कर लकड़ी काटने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। मामला संज्ञान में नहीं है।