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शिवभक्तों की परीक्षा लेती है खड़ी कांवड़
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हरिद्वार से जल लेकर NH 58 मोदीपुरम से गुजरते शिव भक्त
मेरठ। कांवड़ यात्रा में सर्वाधिक कठिन डाक कांवड़ और खड़ी कांवड़ की यात्रा है। इसके अलावा झूला और बैकुंठी कांवड़ भी अब काफी प्रचलित है। पैदल चलना, कावड़ को जमीन पर न रखना, और शुद्धता बनाए रखना यात्रा में जरूरी है। शिवालयों में जलाभिषेक के लिए शिवभक्त श्रावण मास में हरिद्वार, गोमुख, गंगोत्री से जल लेकर आते हैं। शिवालयों में शिवरात्रि के दिन गंगाजल अर्पित किया जाता है। नियतानुसार पांच मंदिरों में जलाभिषेक किया जाता है। इसके बाद घर में पांच कन्याओं के लिए प्रसाद तैयार उन्हें भोग लगाया जाता है। इसके बाद यात्रा पूर्ण होती है।
डाक कांवड़ : इसे भक्त पैदल तेज गति से या दौड़ते हुए यात्रा करते हैं। जल को किसी बोतल में लेकर दौड़ना होता है। खाने पीने पर संयम रखना होता है। यात्रा में जल को ठहराव नहीं दिया जाता है। यात्रा के दौरान जल को जमीन पर भी नहीं रखा जाता है। डाक कांवड़ में जल उठाने के बाद अपने शिवालय में जलाभिषेक का समय तय होता है। डाक कांवड़ लाने वाले यात्री बोल बम, बोल बम के जयकारे लगाते हैं।
खड़ी कांवड़ : यह कांवड़ शारीरिक और मानसिक ताकत की परीक्षा लेती है। इस कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता है। अगर कांवड़िया कहीं विश्राम के लिए रुकता है तो कोई स्वच्छ व्यक्ति उस कांवड़ को कंधे पर लेकर खड़ा हो जाता है। जितनी देर कांवड़िया विश्राम करता है। इस कांवड़ यात्रा को पूर्व करने के लिए समय की बाध्यता नहीं होती है।
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झूला कांवड़ : इसमें भी शिवभक्त कांवड़ को जमीन पर नहीं रखता है। विश्राम के दौरान कांवड़ को बांस के डंडे या पाइप पर बांधा जाता है। यह कांवड़ बीते कुछ बहुत अधिक प्रचलित है। मेरठ से दिल्ली तक कांवड़ लाने वाले यात्री इसी कांवड़ को लाते है।
बैकुंठी कांवड़ : इस कांवड़ एक डंडे के दोनों ओर टोकरी में गंगाजल रखा जाता है। इस कांवड़ में स्टैंड भी बना होता है। ऐसे में यात्रा में कहीं भी रुकने पर इस कांवड़ को शिवभक्त कहीं भी स्वच्छ स्थान पर रख सकता है। इस यात्रा को भी पूर्ण करने के लिए अवधि निर्धारित नहीं है, लेकिन सभी शिवभक्तों को शिवरात्रि पर अपने शिवालय में जलाभिषेक करना होता है। सभी यात्राओं में शराब, तंबाकू से दूर रहना और सात्विक जीवन जीना आवश्यक है।
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डाक कांवड़ : इसे भक्त पैदल तेज गति से या दौड़ते हुए यात्रा करते हैं। जल को किसी बोतल में लेकर दौड़ना होता है। खाने पीने पर संयम रखना होता है। यात्रा में जल को ठहराव नहीं दिया जाता है। यात्रा के दौरान जल को जमीन पर भी नहीं रखा जाता है। डाक कांवड़ में जल उठाने के बाद अपने शिवालय में जलाभिषेक का समय तय होता है। डाक कांवड़ लाने वाले यात्री बोल बम, बोल बम के जयकारे लगाते हैं।
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खड़ी कांवड़ : यह कांवड़ शारीरिक और मानसिक ताकत की परीक्षा लेती है। इस कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता है। अगर कांवड़िया कहीं विश्राम के लिए रुकता है तो कोई स्वच्छ व्यक्ति उस कांवड़ को कंधे पर लेकर खड़ा हो जाता है। जितनी देर कांवड़िया विश्राम करता है। इस कांवड़ यात्रा को पूर्व करने के लिए समय की बाध्यता नहीं होती है।
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झूला कांवड़ : इसमें भी शिवभक्त कांवड़ को जमीन पर नहीं रखता है। विश्राम के दौरान कांवड़ को बांस के डंडे या पाइप पर बांधा जाता है। यह कांवड़ बीते कुछ बहुत अधिक प्रचलित है। मेरठ से दिल्ली तक कांवड़ लाने वाले यात्री इसी कांवड़ को लाते है।
बैकुंठी कांवड़ : इस कांवड़ एक डंडे के दोनों ओर टोकरी में गंगाजल रखा जाता है। इस कांवड़ में स्टैंड भी बना होता है। ऐसे में यात्रा में कहीं भी रुकने पर इस कांवड़ को शिवभक्त कहीं भी स्वच्छ स्थान पर रख सकता है। इस यात्रा को भी पूर्ण करने के लिए अवधि निर्धारित नहीं है, लेकिन सभी शिवभक्तों को शिवरात्रि पर अपने शिवालय में जलाभिषेक करना होता है। सभी यात्राओं में शराब, तंबाकू से दूर रहना और सात्विक जीवन जीना आवश्यक है।