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शोध डिग्री की खातिर नहीं, योगदान के लिए किया जाए

Sun, 21 Jun 2020 01:24 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 21 Jun 2020 01:24 AM IST
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the research should be done not to contribute to the degree
मेरठ। शोध एक विद्रोह है, यह विद्रोह सकारात्मक दिशा में किया जाने वाला है। यह नए ज्ञान का सृजन करता है। नया ज्ञान समाज और देश के लिए नया मार्ग प्रशस्त करता है। ये विचार शनिवार को मेरठ कॉलेज एवं एडवांस रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर डेवलेपमेंट ऑफ सोशल साइंस तथा रक्षा अध्ययन विभाग मेरठ कॉलेज के तत्वावधान में आयोजित 11 दिवसीय ऑनलाइन फैकल्टी इंडक्शन प्रोग्राम में मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा चयन आयोग, प्रयागराज के सदस्य प्रो. हरबंश दीक्षित ने रखे। उन्होंने कहा कि आज का शोधार्थी जल्दबाजी दिखाता है। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि सबसे पहले उस शोधार्थी की इस भावना को समाप्त करें। उसको शोध की महत्ता समझाएं कि वह जो कार्य करने जा रहा है उसका जीवन, विषय, समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान होगा। जिस दिन हम ये भाव उसमें पैदा कर देंगे तभी से शोध की दशा और दिशा दोनों ही सकारात्मक परिणाम देंगी।
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विशिष्ट अतिथि माध्यमिक चयन बोर्ड, प्रयागराज के सदस्य डॉ. धीरेंद्र द्विवेदी ने कहा कि शोध करना और कराना दोनों कला हैं। शोध करने और कराने वाले की रुचि एक साथ मिलती है तो शोध का उद्देश्य निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम देगा। उन्होंने कहा कि शोध में शार्ट कट के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। शोध उन्हीं को करना चाहिए जो वास्तव में रुचि रखते हों। वे शोध के माध्यम से विषय और समाज के विकास में योगदान देना चाहते हों। शोध डिग्री के लिए नहीं बल्कि योगदान के लिए किया जाना चाहिए।
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विशिष्ट वक्ता डीएन कॉलेज के प्राचार्य डॉ. बीएस यादव ने कहा कि मनुष्य का आभूषण ज्ञान है और ज्ञान अध्ययन से आता है। इन दोनों के सामंजस्य से शोध किया जाए और क्रमबद्ध शोध प्रविधि को अपनाया जाए तो शोध गुणात्मक होगा। शोध दिशात्मक होगा एवं सृजनात्मक होगा।
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मुख्य वक्ता सीसीएसयू के डिप्टी लाइब्रेरियन डॉ. जमाल अहमद सिद्दीकी ने सामाजिक विज्ञान और विज्ञान के शोध में अंतर पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हम ज्ञान से ही सत्य एवं असत्य में अंतर कर पाते हैं। शिक्षक और छात्र के बीच संवाद से ज्ञान का जन्म होता है। जब ज्ञान आता है तो समझ आती है और जब हम किसी चीज को समझने लगते हैं तो हमें सूचना एकत्रित करना आ जाता है। जब हम सूचना एकत्र करने में निपुण हो जाते हैं तो शोध की सार्थकता की तरफ कदम आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार ज्ञान और सूचना से संग्रह करने की क्षमता का विकास होता है। शोध के प्रारंभ की ये पहली सीढ़ी है। उन्होंने कहा कि साहित्य चोरी से बचने का सबसे अच्छा मार्ग अध्ययन करना है। वहीं, डॉ. संजय कुमार, कोर्स कोऑर्डिनेटर ने बताया कि प्रोग्राम का आयोजन यूजीसी के निर्देशानुसार लॉकडाउन और अनलॉकडाउन के समय का सदुपयोग करते हुए शैक्षिक और शोध के ज्ञान का विस्तार करने के लिए है।

इन्होंने की अध्यक्षता
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य डॉ. युद्धवीर सिंह एवं डीन लॉ डॉ. अंजलि मित्तल ने की। कार्यक्रम के सफल आयोजन में सचिव डॉ. नीलम कुमारी, संयोजक डॉ. भूपेंद्र सिंह, डॉ. अनुराग जायसवाल, डॉ. अलका चौधरी, डॉ. रेनू सारस्वत, डॉ. बीना राय, डॉ. सुमन, डॉ. आनंद सिंह का विशेष योगदान रहा। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनुराग जायसवाल ने दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. संजय कुमार ने किया।
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