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Meerut News: ...जो पल खुशियों भरा बीते वही त्योहार लगता है
Sat, 11 Jan 2025 10:10 PM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
Updated Sat, 11 Jan 2025 10:10 PM IST
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मेरठ। लालकुर्ती एसजीएम गार्डन में पंवार वाणी फाउंडेशन के तत्वावधान में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन शंभू शिखर जन्मोत्सव पर किया गया। कवि सम्मेलन का शुभारंभ कवि राजेश अग्रवाल ने किया। उन्होंने कहा कि जो अपने संग होते हैं सुखी संसार लगता है, कोई जो बोल दे हंस कर वहीं उपहार लगता है, किसी की आंख में आंसू नहीं देना मेरे दाता, जो पल खुशियों भरा बीते वही त्योहार लगता है।
विशिष्ट अतिथि एमएलसी धर्मेंद्र भारद्वाज, शुभम कौशिक रहे। निवेदक डॉ. हरिओम पंवार और अजय प्रेमी रहे। नोएडा से आई स्वाति खुशबू ने कहा कि बनकर और घर शंभू सा पापी को शोक दिया जाए, गलत राह पर चलें सभी कदमों को रोक दिया जाए। बिहार से आए शंभू शिखर ने कहा कि पोशाक पुरानी लिए अभिनव हूं मनाओ, नफरत में भी मैं प्यार का कलरव हूं मनाओ, रोने के लिए और भी महफिल है जहां में, शंभू शिखर मैं हास्य का उत्सव हूं मनाओ। मेरठ की कवि कोमल रस्तोगी ने कहा कि संस्कृत की पुत्री है हिंदी, वाणी का वरदान, मां और मातृभूमि सी हिंदी, तुझ पर है अभिमान सुनाकर सभी का मन मोहा।
कवि सुमनेश सुमन ने कहा कि स्वाभिमान भारत का रथ यह कहीं नहीं रुकने देंगे, और किसी दुश्मन के आगे देश नहीं झुकने देंगे। कवि सम्मेलन के अंत में बाराबंकी से आए प्रियांशु गजेंद्र ने कहा कि पतझरों में घटा ढूंढने पत्थर में आस्था ढूंढने, दो मुट्ठी लेकर के चावल आए हैं द्वारिका ढूंढने।
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विशिष्ट अतिथि एमएलसी धर्मेंद्र भारद्वाज, शुभम कौशिक रहे। निवेदक डॉ. हरिओम पंवार और अजय प्रेमी रहे। नोएडा से आई स्वाति खुशबू ने कहा कि बनकर और घर शंभू सा पापी को शोक दिया जाए, गलत राह पर चलें सभी कदमों को रोक दिया जाए। बिहार से आए शंभू शिखर ने कहा कि पोशाक पुरानी लिए अभिनव हूं मनाओ, नफरत में भी मैं प्यार का कलरव हूं मनाओ, रोने के लिए और भी महफिल है जहां में, शंभू शिखर मैं हास्य का उत्सव हूं मनाओ। मेरठ की कवि कोमल रस्तोगी ने कहा कि संस्कृत की पुत्री है हिंदी, वाणी का वरदान, मां और मातृभूमि सी हिंदी, तुझ पर है अभिमान सुनाकर सभी का मन मोहा।
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कवि सुमनेश सुमन ने कहा कि स्वाभिमान भारत का रथ यह कहीं नहीं रुकने देंगे, और किसी दुश्मन के आगे देश नहीं झुकने देंगे। कवि सम्मेलन के अंत में बाराबंकी से आए प्रियांशु गजेंद्र ने कहा कि पतझरों में घटा ढूंढने पत्थर में आस्था ढूंढने, दो मुट्ठी लेकर के चावल आए हैं द्वारिका ढूंढने।
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