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ऋग्वेद में मणिसूत्रता का सार बताया
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गुरूकुल प्रभात आश्रम टीकरी में आयोजित संगोष्ठी में शामिल विद्वान फोटो आश्रम
जानीखुर्द। स्वामी समर्पणानंद वैदिक शोध संस्थान, गुरुकुल प्रभात आश्रम और उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय वैदिक शोध संगोष्ठी का सोमवार को समापन हो गया। संगोष्ठी में आए वैदिक विद्वानों का वैदिक सम्मान किया गया।
स्वामी समर्पणानंउ वैदिक शोध संस्थान के निदेशक प्रो. मान सिंह ने वेदों में इतिहास का निर्णय करते हुए कहा कि वेद शाश्वत नित्य वाणी हैं। नित्य में अनित्य का विमर्श विचारणीय है। प्रो. कन्हैयालाल पाराशर ने अध्यक्षीय उद्बोधन में हुए आठ व्याख्यानों द्वारा प्रतिपादित ऋग्वेद में मणिसूत्रता का सार बताया। उन्होंने कहा कि वेद में सब कुछ है। समापन सत्र के अध्यक्ष प्रो. निरंजनलाल मांगल, हरियाणा ने स्वामी समर्पणानंउ और उनके द्वारा प्रतिपादित मणिसूत्रता का प्रतिपादन किया। गुरुकुल प्रभात आश्रम के कुलाधिपति स्वामी विवेकानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि वेदार्थ का चिंतन, वेद का मनन, भौतिक और नित्य पदार्थों का विमर्श नित्य पदार्थों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
शास्त्रीय चर्चा सत्र के पश्चात कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें प्रो. बृहस्पति मिश्र, डॉ. भावप्रकाश गांधी, डॉ. वेदव्रत, डॉ. योगेंद्रभानु, राजस्थान, डॉ. ललित, डॉ. तेज प्रकाश आदि ने कविताओं से श्रोताओं को आह्लादित किया।
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स्वामी समर्पणानंउ वैदिक शोध संस्थान के निदेशक प्रो. मान सिंह ने वेदों में इतिहास का निर्णय करते हुए कहा कि वेद शाश्वत नित्य वाणी हैं। नित्य में अनित्य का विमर्श विचारणीय है। प्रो. कन्हैयालाल पाराशर ने अध्यक्षीय उद्बोधन में हुए आठ व्याख्यानों द्वारा प्रतिपादित ऋग्वेद में मणिसूत्रता का सार बताया। उन्होंने कहा कि वेद में सब कुछ है। समापन सत्र के अध्यक्ष प्रो. निरंजनलाल मांगल, हरियाणा ने स्वामी समर्पणानंउ और उनके द्वारा प्रतिपादित मणिसूत्रता का प्रतिपादन किया। गुरुकुल प्रभात आश्रम के कुलाधिपति स्वामी विवेकानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि वेदार्थ का चिंतन, वेद का मनन, भौतिक और नित्य पदार्थों का विमर्श नित्य पदार्थों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
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शास्त्रीय चर्चा सत्र के पश्चात कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें प्रो. बृहस्पति मिश्र, डॉ. भावप्रकाश गांधी, डॉ. वेदव्रत, डॉ. योगेंद्रभानु, राजस्थान, डॉ. ललित, डॉ. तेज प्रकाश आदि ने कविताओं से श्रोताओं को आह्लादित किया।
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