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Meerut News: स्नातक व शिक्षक एमएलसी चुनाव में भाजपा को चुनौती देंगे शिक्षक संगठन
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12 जुलाई को लखनऊ में बैठक करके प्रत्याशी घोषित करेगा शिक्षक संघ शर्मा गुट
-अंदरखाने दोनों संगठनों में गठबंधन करके चुनाव लड़ने की भी की जा रही पैरवी
कुलदीप त्यागी
मेरठ। भाजपा ने वर्ष 2020 के शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव में शिक्षकों संघों का वर्चस्व तोड़कर अधिकतर सीटों पर जीत हासिल की थी। मेरठ-सहारनपुर शिक्षक सीट पर माध्यमिक शिक्षक संघ शर्मा गुट के प्रदेश अध्यक्ष रहे ओमप्रकाश शर्मा (आठ बार जीत के बाद) की ऐतिहासिक हार हुई थी। ठकुराई गुट के डॉ. उमेश त्यागी भी लगातार चौथी बार चुनाव हारे थे। इसके बाद से ही शिक्षक नेताओं के मन में भाजपा से चुनाव हारने की टीस बरकरार है। इस टीस को मिटाने के लिए शिक्षक संगठनों ने भाजपा को मात देने के लिए कमर कस ली है। अंदरखाने दोनों शिक्षक संगठनों के बीच गठबंधन की पैरवी भी की जा रही है।
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी फिर बढ़ने वाली है। विधानसभा चुनावों के समय से पहले होने की अटकलें चल रही है तो इसी वर्ष शिक्षक व स्नातक एमएलसी चुनाव भी होने हैं। मेरठ-सहारनपुर खंड शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव को लेकर शिक्षक संगठनों ने अपनी तैयारी कर ली है। इस बार का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने की उम्मीद है, क्योंकि शिक्षक संगठन सत्ताधारी दल भाजपा सहित अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों को कड़ी चुनौती देने के मूड में नजर आ रहे हैं।
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पूरी ताकत से मैदान में उतरेंगे शिक्षक संगठन
शिक्षक हितों की अनदेखी से नाराज विभिन्न शिक्षक संगठनों ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकने का फैसला किया है। शिक्षक संगठन अपना पुराना वर्चस्व साबित करने की कवायद कर रहे हैं। मेरठ-सहारनपुर शिक्षक सीट पर लगातार आठ बार शिक्षक नेता ओमप्रकाश शर्मा ने जीत हासिल की तो स्नातक सीट पर हेम सिंह पुंडीर ने चार बार एमएलसी बने।
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निजी संस्थानों के शिक्षकों ने बदल दिया इतिहास
2020 के चुनावों में निजी संस्थानों के शिक्षकों को भी मतदान देने का अधिकार मिल गया। इसका परिणाम यह रहा कि सरकारी शिक्षकों के भरोसे चुनाव जीतते आ रहे शर्मा गुट के नेता चुनाव हार गए। शिक्षक सीट पर भाजपा के श्रीचंद शर्मा और स्नातक पर भाजपा नेता दिनेश गोयल चुनाव जीते। शिक्षक सीट पर भाजपा ने श्रीचंद शर्मा को फिर से टिकट दिया है। स्नातक सीट पर कांग्रेस से विक्रांत वशिष्ठ एडवोकेट चुनाव मैदान है। जबकि सपा से प्रमेंद्र भाटी एडवोकेट प्रत्याशी है।
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गठबंधन और बागी उम्मीदवारों की अटकलें
शिक्षक सीट पर माध्यमिक शिक्षक संघ शर्मा गुट ने अभी तक मेरठ के जिलाध्यक्ष गजेंद्र वर्मा को उम्मीदवार घोषित किया हुआ है, लेकिन इस सीट पर पूर्व एमएलसी हेम सिंह पुंडीर के बेटे डॉ. सुशील पुंडीर भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं। ऐसे में शर्मा गुट में बागी उम्मीदवार भी उतरने की आशंका बनी हुई है। शर्मा गुट की 12 जुलाई को लखनऊ में होने वाली बैठक में उम्मीदवारों पर निर्णय लिया जाएगा। जबकि ठकुराई गुट भी चुनाव को लेकर शीघ्र ही निर्णय करेगा। चर्चा है कि शर्मा और ठकुराई गुट के बीच गठबंधन करके चुनाव लड़ने की भी पैरवी की जा रही है। कहा जा रहा है कि अगर दोनों दल स्नातक व शिक्षक सीट पर एक-एक उम्मीदवार उतारकर चुनाव लड़े तो भाजपा को मजबूत चुनौती दे सकते हैं। हालांकि इस बारे में अभी कोई शिक्षक नेता बोलने को तैयार नहीं है।
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क्यों अहम है यह चुनाव -
एमएलसी (शिक्षक व स्नातक) चुनाव में केवल शिक्षक और स्नातक ही मतदान करते हैं। ऐसे में शिक्षक संगठनों की सीधे तौर पर मतदाताओं (शिक्षकों और बुद्धिजीवियों) के बीच गहरी पैठ होती है। इस बार पुरानी पेंशन बहाली, मानदेय और शिक्षकों की अन्य समस्याओं को मुख्य मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा जा रहा है। इस साल होने वाले इस चुनाव ने अभी से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी पारे को चढ़ा दिया है। अब देखना यह होगा कि शिक्षक संगठनों की यह एकजुटता और बागियों के तेवर राजनीतिक दलों के चुनावी गणित को कितना प्रभावित करते हैं।
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-अंदरखाने दोनों संगठनों में गठबंधन करके चुनाव लड़ने की भी की जा रही पैरवी
कुलदीप त्यागी
मेरठ। भाजपा ने वर्ष 2020 के शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव में शिक्षकों संघों का वर्चस्व तोड़कर अधिकतर सीटों पर जीत हासिल की थी। मेरठ-सहारनपुर शिक्षक सीट पर माध्यमिक शिक्षक संघ शर्मा गुट के प्रदेश अध्यक्ष रहे ओमप्रकाश शर्मा (आठ बार जीत के बाद) की ऐतिहासिक हार हुई थी। ठकुराई गुट के डॉ. उमेश त्यागी भी लगातार चौथी बार चुनाव हारे थे। इसके बाद से ही शिक्षक नेताओं के मन में भाजपा से चुनाव हारने की टीस बरकरार है। इस टीस को मिटाने के लिए शिक्षक संगठनों ने भाजपा को मात देने के लिए कमर कस ली है। अंदरखाने दोनों शिक्षक संगठनों के बीच गठबंधन की पैरवी भी की जा रही है।
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी फिर बढ़ने वाली है। विधानसभा चुनावों के समय से पहले होने की अटकलें चल रही है तो इसी वर्ष शिक्षक व स्नातक एमएलसी चुनाव भी होने हैं। मेरठ-सहारनपुर खंड शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव को लेकर शिक्षक संगठनों ने अपनी तैयारी कर ली है। इस बार का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने की उम्मीद है, क्योंकि शिक्षक संगठन सत्ताधारी दल भाजपा सहित अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों को कड़ी चुनौती देने के मूड में नजर आ रहे हैं।
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पूरी ताकत से मैदान में उतरेंगे शिक्षक संगठन
शिक्षक हितों की अनदेखी से नाराज विभिन्न शिक्षक संगठनों ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकने का फैसला किया है। शिक्षक संगठन अपना पुराना वर्चस्व साबित करने की कवायद कर रहे हैं। मेरठ-सहारनपुर शिक्षक सीट पर लगातार आठ बार शिक्षक नेता ओमप्रकाश शर्मा ने जीत हासिल की तो स्नातक सीट पर हेम सिंह पुंडीर ने चार बार एमएलसी बने।
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निजी संस्थानों के शिक्षकों ने बदल दिया इतिहास
2020 के चुनावों में निजी संस्थानों के शिक्षकों को भी मतदान देने का अधिकार मिल गया। इसका परिणाम यह रहा कि सरकारी शिक्षकों के भरोसे चुनाव जीतते आ रहे शर्मा गुट के नेता चुनाव हार गए। शिक्षक सीट पर भाजपा के श्रीचंद शर्मा और स्नातक पर भाजपा नेता दिनेश गोयल चुनाव जीते। शिक्षक सीट पर भाजपा ने श्रीचंद शर्मा को फिर से टिकट दिया है। स्नातक सीट पर कांग्रेस से विक्रांत वशिष्ठ एडवोकेट चुनाव मैदान है। जबकि सपा से प्रमेंद्र भाटी एडवोकेट प्रत्याशी है।
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गठबंधन और बागी उम्मीदवारों की अटकलें
शिक्षक सीट पर माध्यमिक शिक्षक संघ शर्मा गुट ने अभी तक मेरठ के जिलाध्यक्ष गजेंद्र वर्मा को उम्मीदवार घोषित किया हुआ है, लेकिन इस सीट पर पूर्व एमएलसी हेम सिंह पुंडीर के बेटे डॉ. सुशील पुंडीर भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं। ऐसे में शर्मा गुट में बागी उम्मीदवार भी उतरने की आशंका बनी हुई है। शर्मा गुट की 12 जुलाई को लखनऊ में होने वाली बैठक में उम्मीदवारों पर निर्णय लिया जाएगा। जबकि ठकुराई गुट भी चुनाव को लेकर शीघ्र ही निर्णय करेगा। चर्चा है कि शर्मा और ठकुराई गुट के बीच गठबंधन करके चुनाव लड़ने की भी पैरवी की जा रही है। कहा जा रहा है कि अगर दोनों दल स्नातक व शिक्षक सीट पर एक-एक उम्मीदवार उतारकर चुनाव लड़े तो भाजपा को मजबूत चुनौती दे सकते हैं। हालांकि इस बारे में अभी कोई शिक्षक नेता बोलने को तैयार नहीं है।
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क्यों अहम है यह चुनाव -
एमएलसी (शिक्षक व स्नातक) चुनाव में केवल शिक्षक और स्नातक ही मतदान करते हैं। ऐसे में शिक्षक संगठनों की सीधे तौर पर मतदाताओं (शिक्षकों और बुद्धिजीवियों) के बीच गहरी पैठ होती है। इस बार पुरानी पेंशन बहाली, मानदेय और शिक्षकों की अन्य समस्याओं को मुख्य मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा जा रहा है। इस साल होने वाले इस चुनाव ने अभी से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी पारे को चढ़ा दिया है। अब देखना यह होगा कि शिक्षक संगठनों की यह एकजुटता और बागियों के तेवर राजनीतिक दलों के चुनावी गणित को कितना प्रभावित करते हैं।