{"_id":"5ea493408ebc3e90a55e4256","slug":"strengthen-biological-clock-city-news-mrt479207568","type":"story","status":"publish","title_hn":"जैविक घड़ी मजबूत बनाएं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जैविक घड़ी मजबूत बनाएं
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मेरठ। लॉकडाउन ने हर किसी की जिंदगी बदल दी है। इससे मन में तरह-तरह के भाव आ रहे हैं। ऐसे में शरीर के साथ मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखना बेहद जरूरी है। ये विचार सीसीएसयू के जूलॉजी विभाग की प्रोफेसर नीलू जैन गुप्ता का है।
वे बताती हैं कि हमारी रिदम यानी जैविक घड़ी आसानी से उपलब्ध संसाधन है। लॉकडाउन के दौरान मानसिक कष्ट कम करने और कोरोना के प्रति जागरूकता वैज्ञानिक आधार पर बढ़ानी होगी। शरीर की निष्क्रियता से उत्पन्न भय हमें बेचैन करता है। घबराहट भी बढ़ाता है। ऐसे में दैनिक जीवन के नकारात्मक भाव शरीर की क्रियाओं को ऊर्जा देने लगते हैं। इसलिए प्रतिरक्षा को बढ़ाकर जैविक घड़ी को मजबूत बना सकते हैं।
हमारे शरीर की हर कोशिका में घड़ी होती है। ये अदृश्य घड़ी शरीर के बाहर से, सांसारिक प्रकाश और अंधकार द्वारा हमारे मस्तिष्क को सिंक्रनाइज (चालित) करती हैं। ये अन्य अंगों को सिंक्रनाइज करने के लिए संभव बनाकर विभिन्न जरूरतों तथा प्रक्रियाओं को समयानुसर चलायमान रखती हैं। इस जैविक घड़ी का आधार हमारे मस्तिष्क में स्थित है जो पूरे शरीर के जागने, सोने, भूख-प्यास लगने और यहां तक कि हमारे मूड को भी प्रभावित करती है। मनुष्य स्वभाव व उद्भव से दिनचर प्राणी है। हम समय अनुसार दिन में खाते और रात को निष्क्रिय रहते हैं। इसलिए हमारी जैविक घड़ी स्वाभाविक कार्य करती है। जब हमारे कार्य रात में संपन्न होने लगते हैं तो अनजाने में ही हम खुद अपने अंगों को असमंजस में डाल देते हैं। हमारे अंग स्वयं को प्रकाश-अंधेरे चक्र से अलग व्यवहार करने के लिए प्रेरित हो जाते हैं। हमारे शरीर की समय प्रणालियां आपस में समझौता करने लगती हैं। यह सर्केडियन व्यवधान है। ऐसे में लॉकडाउन के दौरान रोजाना नियमित रूटीन के साथ सोने का समय रखें।
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हर दिन आधे घंटे धूप जरूर देखें। यह तनाव को हराने की क्षमता रखतीा है। सामाजिक अलगाव हमारे मानसिक उद्गारों पर सीधा हमला करता है। ऐसे में अलग-थलग न रहें। दूसरों के संपर्क में बने रहे और शारीरिक गतिविधि करें। नियमित व्यायाम करें। अच्छी दिनचर्या के साथ गहरी नींद लें। जिएं और दिन-प्रतिदिन बेहतर जिएं।
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वे बताती हैं कि हमारी रिदम यानी जैविक घड़ी आसानी से उपलब्ध संसाधन है। लॉकडाउन के दौरान मानसिक कष्ट कम करने और कोरोना के प्रति जागरूकता वैज्ञानिक आधार पर बढ़ानी होगी। शरीर की निष्क्रियता से उत्पन्न भय हमें बेचैन करता है। घबराहट भी बढ़ाता है। ऐसे में दैनिक जीवन के नकारात्मक भाव शरीर की क्रियाओं को ऊर्जा देने लगते हैं। इसलिए प्रतिरक्षा को बढ़ाकर जैविक घड़ी को मजबूत बना सकते हैं।
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हमारे शरीर की हर कोशिका में घड़ी होती है। ये अदृश्य घड़ी शरीर के बाहर से, सांसारिक प्रकाश और अंधकार द्वारा हमारे मस्तिष्क को सिंक्रनाइज (चालित) करती हैं। ये अन्य अंगों को सिंक्रनाइज करने के लिए संभव बनाकर विभिन्न जरूरतों तथा प्रक्रियाओं को समयानुसर चलायमान रखती हैं। इस जैविक घड़ी का आधार हमारे मस्तिष्क में स्थित है जो पूरे शरीर के जागने, सोने, भूख-प्यास लगने और यहां तक कि हमारे मूड को भी प्रभावित करती है। मनुष्य स्वभाव व उद्भव से दिनचर प्राणी है। हम समय अनुसार दिन में खाते और रात को निष्क्रिय रहते हैं। इसलिए हमारी जैविक घड़ी स्वाभाविक कार्य करती है। जब हमारे कार्य रात में संपन्न होने लगते हैं तो अनजाने में ही हम खुद अपने अंगों को असमंजस में डाल देते हैं। हमारे अंग स्वयं को प्रकाश-अंधेरे चक्र से अलग व्यवहार करने के लिए प्रेरित हो जाते हैं। हमारे शरीर की समय प्रणालियां आपस में समझौता करने लगती हैं। यह सर्केडियन व्यवधान है। ऐसे में लॉकडाउन के दौरान रोजाना नियमित रूटीन के साथ सोने का समय रखें।
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