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...जब बाबा टिकैत के तेवर में आई भाकियू, 1987 में पहला टकराव, गई थी दो किसानों की जान

Wed, 03 Oct 2018 04:54 PM IST
जगेंद्र उज्ज्वल, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
जगेंद्र उज्ज्वल, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Updated Wed, 03 Oct 2018 04:54 PM IST
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Strength was seen in peasant movement and there were many agitations during time of Mahendra Tikait
सिसौली के किसान भवन में जलती अखंड ज्योत - फोटो : अमर उजाला

भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की किसानों की मांगों के मुद्दे पर सरकारों से टकराव की उनकी नेतृत्व क्षमता ने भाकियू को ताकत दी थी। बड़े आंदोलनों का भाकियू का इतिहास रहा है। चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के वर्ष 2011 में निधन के बाद भाकियू ने पहली बार किसान क्रांति यात्रा का बिगुल फूंक कर प्रदेश और केंद्र की सरकारों की नीतियों पर सवाल ही नहीं उठाए, बल्कि अपनी मांगों पर सोचने को विवश किया है। 

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भाकियू के संस्थापक चौधरी टिकैत जिस अंदाज में सरकारों के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई करते थे, उसी तरीके से किसान क्रांति यात्रा के अंतिम चरण में भाकियू ने तेवर अपना लिए। सीएम योगी आदित्यनाथ से भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत एवं प्रवक्ता राकेश टिकैत ने वार्ता नहीं की। प्रतिनिधिमंडल से सीएम से बातचीत में कोई नतीजा नहीं मिला। प्रदेश सरकार की अनदेखी और केंद्र सरकार के कड़े रवैये से पदयात्रा को दिल्ली के यूपी बॉर्डर पर घेराबंदी कर रोक दिया गया। एकाएक सरकारों के बदले रुख को देख कर किसानों ने भी पीछे नहीं हटने का मन बना लिया। ऐसा नजारा करीब एक दशक बाद दिखाई दिया। बड़े आंदोलनों और कड़े संघर्ष ने ही भाकियू को ताकत दी थी। चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की सरकारों से सीधे टकराव की नीति थी। उनकी शैली से किसान ही संगठित नहीं हुए, बल्कि किसानों की सुनी भी जाने लगी। वर्ष 1987 में शामली के करमूखेड़ी बिजलीघर पर धरने के दौरान पुलिस प्रशासन से चौधरी टिकैत का पहला टकराव हुआ था, जिसमें जयपाल सिंह और अकबर दो किसानों की मौत हो गई थी। सिसौली आए तत्कालीन सीएम वीर बहादुर सिंह के आश्वासन भी संतुष्ट नहीं कर पाए। भाकियू ने संसद और विधानसभा में किसानों की समस्याएं नहीं उठाने पर जनप्रतिनिधियों का भी बहिष्कार कर दिया था।
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मेरठ कमिश्नरी पर 44 दिन धरने में जुटी किसानों की भीड़ ने चौधरी टिकैत को आगे बढ़ने का जज्बा दिया। मुरादाबाद के रजबपुर में इसका असर दिखा। यहां 110 दिन धरना चला, ट्रेनें रोकी गई। वर्ष 1988 में नई दिल्ली के वोट क्लब पर सात दिन के धरने में लाखों किसान जुटा कर भाकियू ने राष्ट्रीय पहचान बना ली। देश के बड़े नेता टिकैत के मंच पर आने को लालायित होने लगे। जिले के भोपा गंग नहर पर मुस्लिम बेटी नईमा हत्याकांड की जांच को लेकर टिकैत के धरने ने तत्कालीन एनडी तिवारी सरकार को झुकने को मजबूर कर दिया। चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, किसानों के बीच बाबा टिकैत का कद बढ़ गया। लखनऊ और दिल्ली में भाकियू के आंदोलन की घोषणा से ही सरकारों में हलचल हो जाती थी। कई आंदोलन उग्र हुए, चौधरी टिकैत को कई बार जेल भी जाना पड़ा, मगर उनके इरादे नहीं डिगे। उनकी बीमारी के बाद कुछ वक्त तक भाकियू आंदोलनों से पीछे रही। राजनीति में भाकियू का दखल बढ़ने के बाद संगठन की शक्ति में कमी आई। पांच साल पहले मुजफ्फरनगर दंगे ने भाकियू की ताकत को क्षति पहुंचाई। चौधरी टिकैत के खास सिपहसलार गुलाम मौहम्मद जौला ने अलग संगठन बना लिया। ठाकुर पूरण सिंह ने भी नया संगठन तैयार कर लिया। भाकियू भानू और भाकियू अंबावता भी किसानों की पैरवी में आ गए। चौधरी टिकैत के जाने के बाद पहली बार भाकियू ने बड़े स्तर पर किसान क्रांति यात्रा निकाली। हरिद्वार से प्रारंभ हुई पदयात्रा का रुख अनुशासित था, मगर दिल्ली पहुंचते ही भाकियू ने किसानों की मांगों को लेकर कड़ा तेवर अपना लिया।

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Strength was seen in peasant movement and there were many agitations during time of Mahendra Tikait
सिसौली में स्थित किसान भवन - फोटो : अमर उजाला

भाजपा सरकार का असली चेहरा सामने आया
हरिद्वार से चलकर दिल्ली जा रही किसान क्रांति यात्रा में शामिल किसानों पर बर्बरता पूर्वक किए गए लाठीचार्ज, पथराव और पानी की बौछार किए जाने से सिसौली तथा आसपास के गांव के किसानों में रोष फैल गया। क्षेत्र के बाकी किसान भी यात्रा में शामिल होने के लिए दिल्ली जाने की तैयारी में लगे हैं। मंगलवार को किसान क्रांति यात्रा में शामिल किसानों पर लाठीचार्ज से किसानों में आक्रोश है। किसानों ने केंद्र और प्रदेश सरकार की इस कार्रवाई की निंदा की है। भौराकलां के बुजुर्ग किसान रामपाल सिंह और महक सिंह का कहना है कि सरकार की इस कार्रवाई ने अंग्रेज सरकार की जलियावाला बाग कांड की याद दिला दी। सिसौली निवासी बलदेव सिंह, शैलेंद्र देशपाल और अभिजीत ने भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत से फोन पर वार्ता कर कहा कि किसानों को किसी कीमत पर पीछे नहीं हटना है। जब तक सरकार किसानों की मांग पूरी नहीं करती तब तक दिल्ली में डटे रहना है। किसानों के विकास का वादा कर सत्ता में आई भाजपा सरकार का असली चेहरा सामने आ गया है। किसान शांति पूर्वक अपना हक मांगने दिल्ली जा रहे थे। सरकार ने किसान और जवान को लड़ा दिया। सिसौली समेत आसपास के ग्रामों से किसान दिल्ली कूच की तैयारी में लगे हैं। कहा कि जब तक मांग पूरी नहीं होगी, लौट कर नहीं आएंगे। अधिकांश किसान क्रांति यात्रा में जाने के कारण किसान भवन सुनसान है। 

तरकश से निकले तीर
विपक्षी दलों के नेताओं ने हरिद्वार से दिल्ली की ओर शांतिपूर्ण ढंग से निकाली गई किसान क्रांति यात्रा पर लाठीचार्ज के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। विपक्षी दलों ने कहा कि किसानों पर बर्बर लाठीचार्ज कर सरकार को दोहरा चेहरा सामने आ गया है। भाजपा ने कहा कि इस मसले पर किसानों से वार्ता पहले होनी चाहिए थी।

निहत्थे किसानों को दिल्ली के किसान घाट पर क्यों नहीं जाने दिया गया। केंद्र और प्रदेश सरकार किसानों के हक की आवाज दबाना चाहती है। किसान अन्नदाता है, कोई आतंकवादी नहीं है। पूंजीपतियों ने सरकारों को कैप्चर कर लिया है। - अजीत राठी, जिलाध्यक्ष रालोद।

केंद्र सरकार का किसान विरोधी चेहरा सामने आ गया है। किसानों की आय दोगुनी करने का दावा झूठा है। क्रांति यात्रा शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों को लेकर दिल्ली जा रही थी। किसानों का उत्पीड़न, शोषण की सपा निंदा करती है। - मुकेश चौधरी, पूर्व राज्यमंत्री, सपा।

केंद्र सरकार किसान विरोधी है। भाकियू ने क्रांति यात्रा का दस दिन पहले एजेंडा बता दिया था। फिर भी सीएम और पीएम ने चुप्पी साधे रखी। किसानों पर आंसू गैस, पानी की बौछार, पथराव के हमले की न्यायिक जांच कराई जाए। किसान घाट पर किसानों को जाने से प्रतिबंधित किया जाना घोर अन्याय है।  - हरेंद्र मलिक, पूर्व सांसद कांग्रेस।

दिल्ली के यूपी बॉर्डर पर किसानों के साथ किया गया बर्ताव निंदनीय है। रालोद का समर्थन किसानों के साथ है। केंद्र सरकार चार साल में किसानों के लिए कुछ नहीं कर पाई। ऐसी सरकार बर्खास्त होनी चाहिए।  - योगराज सिंह, पूर्व मंत्री रालोद।

किसान क्रांति यात्रा में टकराव के हालात बनना दुर्भाग्यपूर्ण है। किसानों से वार्ता पहले होनी चाहिए थी। जिन किसानों को चोट लगी, घायल हुए, वो सभी हमारे भाई है। केंद्र सरकार ने मांगे मान ली है। किसान और गांव के हित को मोदी सरकार प्रतिबद्ध है। - डॉ संजीव बालियान, पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद।

सरकार की कोई मंशा किसानों के शोषण और उत्पीड़न की नहीं है। किसानों के हित में केंद्र और प्रदेश सरकार ने कई बड़े फैसले लिए है। टकराव और संघर्ष के हालात अचानक पैदा हुए, जिन्हें संभाल लिया गया। - उमेश मलिक, भाजपा विधायक, बुढ़ाना।

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