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सपा कैंट बोर्ड का चुनाव लड़ेगी, भाजपा की मुश्किल बढ़ेगी
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सपा कैंट बोर्ड का चुनाव लड़ेगी, भाजपा की मुश्किल बढ़ेगी
मेरठ। इस बार सपा छावनी परिषद (कैंट बोर्ड ) का चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी है। बोर्ड में आठ वार्ड हैं। सभी पर सपा प्रत्याशी उतारे जाएंगे। सभ्ीा सीटों के लिए उम्मीदवार तैयार किए जा रहे हैं। चुनाव अक्तूबर-नवंबर में हो सकते हैं। पार्टी के जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि अभी तक सपोर्ट करते थे, मगर पार्टी स्तर से किसी को नहीं लड़ाते थे, इस बार लड़ाएंगे। दरअसल, छावनी परिषद के निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल 12 जुलाई को खत्म हो गया है। छावनी परिषद के निर्वाचित सदस्यों का छह साल का कार्यकाल रहा है। 13 जुलाई से परिवर्तित बोर्ड काम करेगा।
वहीं, सपा की तैयारी से भाजपा की राह मुश्किल हो जाएगी। ऐसे में भाजपा को कैंट की राजनीति में मंझे हुए नेताओं पर दांव खेलना पड़ेगा। उपाध्यक्ष का चुनाव अगर सीधे हुआ तो भी पूरे समीकरण बदल जाएंगे। कैंट बोर्ड के अगले चुनाव में उपाध्यक्ष को जनता सीधे चुनेगी या फिर सदस्यों द्वारा ही चुनाव होगा। इसे लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
बताया जा रहा है कि रक्षा मंत्रालय पूरे देश में एक साथ चुनाव कराएगा। कैंट को हमेशा से भाजपा का गढ़ कहा जाता है। सांसद हो या विधायक का चुनाव, यहां भाजपा आगे रहती है। इस बार सांसद के चुनाव में भी कैंट विधानसभा ने ही जीत दिलाई। कैंट के आठ वार्डों में मिश्रित आबादी अधिक है। यहां साल 2015 तक भाजपा के सिंबल पर एक-दो सदस्य ही चुनाव जीते हैं। उपाध्यक्ष पद के चुनाव में बीना वाधवा चुनाव जीती थीं। उनके सामने कोई सदस्य खड़ा ही नहीं हो पाया था। ऐसे में सपा सारे वार्डों पर चुनाव लड़ी तो भाजपा के उम्मीदवारों की राह आसान नहीं होगी।
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मेरठ। इस बार सपा छावनी परिषद (कैंट बोर्ड ) का चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी है। बोर्ड में आठ वार्ड हैं। सभी पर सपा प्रत्याशी उतारे जाएंगे। सभ्ीा सीटों के लिए उम्मीदवार तैयार किए जा रहे हैं। चुनाव अक्तूबर-नवंबर में हो सकते हैं। पार्टी के जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि अभी तक सपोर्ट करते थे, मगर पार्टी स्तर से किसी को नहीं लड़ाते थे, इस बार लड़ाएंगे। दरअसल, छावनी परिषद के निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल 12 जुलाई को खत्म हो गया है। छावनी परिषद के निर्वाचित सदस्यों का छह साल का कार्यकाल रहा है। 13 जुलाई से परिवर्तित बोर्ड काम करेगा।
वहीं, सपा की तैयारी से भाजपा की राह मुश्किल हो जाएगी। ऐसे में भाजपा को कैंट की राजनीति में मंझे हुए नेताओं पर दांव खेलना पड़ेगा। उपाध्यक्ष का चुनाव अगर सीधे हुआ तो भी पूरे समीकरण बदल जाएंगे। कैंट बोर्ड के अगले चुनाव में उपाध्यक्ष को जनता सीधे चुनेगी या फिर सदस्यों द्वारा ही चुनाव होगा। इसे लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
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बताया जा रहा है कि रक्षा मंत्रालय पूरे देश में एक साथ चुनाव कराएगा। कैंट को हमेशा से भाजपा का गढ़ कहा जाता है। सांसद हो या विधायक का चुनाव, यहां भाजपा आगे रहती है। इस बार सांसद के चुनाव में भी कैंट विधानसभा ने ही जीत दिलाई। कैंट के आठ वार्डों में मिश्रित आबादी अधिक है। यहां साल 2015 तक भाजपा के सिंबल पर एक-दो सदस्य ही चुनाव जीते हैं। उपाध्यक्ष पद के चुनाव में बीना वाधवा चुनाव जीती थीं। उनके सामने कोई सदस्य खड़ा ही नहीं हो पाया था। ऐसे में सपा सारे वार्डों पर चुनाव लड़ी तो भाजपा के उम्मीदवारों की राह आसान नहीं होगी।
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