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मेरठ के इस गांव में हुआ था लघु जलियांवाला कांड, सिपाही ने अंग्रेजों के मंसूबों पर फेर दिया था पानी

Sat, 08 Jun 2019 03:55 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Sat, 08 Jun 2019 03:55 PM IST
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small Jallianwala Kand happened In bhamori village meerut of Meerut City
स्तंभ पर शहीदों के नाम आज भी अंकित हैं - फोटो : अमर उजाला

10 मई 1857 को शहर के सदर चौक से भड़की क्रांति की ज्वाला पूरे देश में फैल गई थी। इतिहास गवाह है कि 15 अगस्त 1947 को देश ने फिरंगियों को भगाकर देश की आजादी का जो जश्न मनाया उसकी पटकथा मेरठ से लिखी गई थी। शूरवीरों की इस धरा पर एक गांव ऐसा भी है जो आज भी लघु जलियांवाला बाग कांड के लिए जाना जाता है।

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सरधना ब्लॉक का गांव भामौरी शहीदों के गांव के नाम से मशहूर है। लोग बताते हैं कि 18 अगस्त 1942 को इस गांव में फिरंगियों के खिलाफ रणनीति बनाने के लिए ग्रामीण चौपाल पर एकत्र हुए थे। अचानक अंग्रेजी फौज ने ग्रामीणों पर हमला कर दिया था। ग्रामीणों पर घात लगाकर वार किया और अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इस गोलीबारी में 28 से अधिक ग्रामीण शहीद हो गए थे। 
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इनमें प्रहलाद सिंह, फतह सिंह, लटूर सिंह, बोबल सिंह, रणधीर सिंह, कश्मीर सिंह, महावीर सिंह, बनी सिंह, प्रेम सिंह, मलखान सिंह, शिवचरण सिंह,  नत्थूराम शर्मा, अमी सिंह, केन सिंह, देवी सिंह, पृथ्वी सिंह, जम्मू उर्फ जुगमंदर दास, मधू शर्मा, दाती सिंह, देवदत्त शर्मा, जीत सिंह व करम सिंह आदि के नाम शामिल हैं। बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए थे।
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जब यह घटना हुई तो उसी समय बारिश हो गई, जिस कारण मृतक और घायल क्रांतिकारियों का खून बारिश के पानी के साथ गांव की नालियों में बह निकला। जिसे देख गांव के लोगों का खून खौल उठा था। ग्रामीणों ने इकट्ठा होकर अंग्रेजों पर हमला बोल दिया था। इसके बाद अंग्रेजों ने ग्रामीणों को घेरकर जमकर गोलियां बरसाईं थी। 

भारतीय सिपाही ने फेर दिया था मंसूबों पर पानी
मोटो की चौपाल पर होने वाली इस सभा का नेतृत्व बलिया के रामस्वरूप शर्मा कर रहे थे। अंग्रेजों ने रामस्वरूप शर्मा की गर्दन को कलम कर दिया था। ठाकुर देवी सिंह, चेतनलाल, रणधीर सिंह, फकीरा, छुट्टन, बलजीत, शिवचरण, रघुवीर, ताराचंद, बाबूराम शर्मा, मुख्तियार, जमादार सिंह को जेल में डाल दिया गया था। इसमें से 18 लोगों को 12-12 वर्ष की कैद की सजा दी गई थी। इन सभी के नाम गांव में बने शहीद स्तंभ पर अंकित हैं।

इस घटना से बौखलाए अंग्रेज अफसर ने गांव भामौरी को तोप से उड़ाने का आदेश दे दिया और तोप गांव की तरफ चल पड़ी थी। लेकिन इस तोप का चालक हिंदुस्तानी था, जिसने भामौरी गांव से पहले पड़ने वाले गांव झिटकरी के तालाब में तोप को फंसा दिया, जो काफी मशक्कत के बाद भी दो दिन तक बाहर नहीं निकली। इस दौरान गांधी जी और पंडित जवाहरलाल नेहरू की पैरवी के बाद अंग्रेजों ने गांव को तोप से उड़ाने का फरमान वापस ले लिया। 

हर गली, नुक्कड़ में मना था आजादी का जश्न
शहीदों की भूमि भामौरी गांव में 15 अगस्त सन 1947 की सुबह का सूरज अपने साथ कभी नहीं भूलने वाला उत्सव लेकर आया था। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या को हर घर, गली, नुक्कड़ और पेड़ को तिरंगों से ढक दिया गया था। जबकि 15 अगस्त को दिनभर लोग तिरंगा हाथ में लेकर ढोल, नगाड़े के साथ गांव में जुलूस निकालते रहे। अंग्रेजों के जाने की जितनी खुशी भामौरी के बाशिंदों को हुई उसका अंदाजा लगाना नामुमकिन था।  

प्रथम प्रधानमंत्री भी आए थे भामौरी
आज भी भामौरी में हर वर्ष शहीदों की शहादत को याद करते हुए कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। आजादी के बाद इस गांव को शहीदों का गांव घोषित किया गया। इतना ही नहीं गांव में शहीद स्थल का निर्माण कराकर वहां स्तंभ लगवाया गया, इस स्तंभ पर शहीदों के नाम आज भी अंकित हैं। इन शहीदों को नमन करने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू स्वयं भामौरी आए थे।

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