{"_id":"68e2604e14cbdc71400c0899","slug":"sharad-purnima-todaylord-vishnu-and-lakshmi-will-shower-their-blessings-meerut-news-c-14-1-mrt1002-994347-2025-10-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"Meerut News: शरद पूर्णिमा आज...भगवान विष्णु और लक्ष्मी की कृपा बरसेगी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Meerut News: शरद पूर्णिमा आज...भगवान विष्णु और लक्ष्मी की कृपा बरसेगी
विज्ञापन
- इस तिथि पर चंद्रमा की चांदनी में रहता है अमृत का वास
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। आज अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है। इसे शरद पूर्णिमा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और इसकी चांदनी से अमृत बरसता है। इसीलिए यह दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है। पवित्र नदी में स्नान और दान करने से पापों से मुक्ति मिलती है।
इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंस के सचिव आचार्य कौशल वत्स ने बताया इस पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन श्री हरि विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। धर्म, अध्यात्म व आयुर्वेद की दृष्टि से भी यह दिन विशेष है। इस तिथि पर मध्यरात्रि में चंद्रमा की रोशनी में केसरिया दूध व खीर प्रसादी रखने और मध्यरात्रि के उपरांत सेवन करने की परंपरा है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
ज्योतिषाचार्य विनोद त्यागी ने बताया कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की चांदनी में अमृत का निवास रहता है। इसीलिए उसकी किरणों से अमृत और आरोग्य की प्राप्ति सुलभ होती है। इस दिन मां लक्ष्मी रात में धरती पर विचरण करती हैं। इसलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा का नाम दिया गया है। चंद्रमा की किरण स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। पूर्णिमा की चांदनी में खीर बनाकर खुले आसमान में रखते हैं ताकि चंद्रमा की अमृत युक्त किरणें इसमें आएंगी और खीर औषधीय गुणों से युक्त होकर अमृत के समान हो जाती है। शरद पूर्णिमा के दिन द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के संग महारास रचाया था।
विज्ञापन
शरद पूर्णिमा पर मोह रात्रि की मान्यता
- पौराणिक मान्यता में वर्ष में तीन रात्रि विशेष मानी गई हैं। इनमें मोहरात्रि, कालरात्रि और सिद्धिरात्रि विशेष है। शरद पूर्णिमा को मोह रात्रि भी कहा गया है। इसका उल्लेख भागवत के शिव लीला कथा में मिलता है। कथानक के अनुसार शरद पूर्णिमा पर महारास के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने शिव पार्वती को निमंत्रण भेजा। मां पार्वती ने शिव से आज्ञा मांगी तो शिव ने मोहित होकर स्वयं वहां जाने की इच्छा व्यक्त की। इसलिए इस रात्रि को मोह रात्रि कहा जाता है।
विज्ञापन
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। आज अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है। इसे शरद पूर्णिमा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और इसकी चांदनी से अमृत बरसता है। इसीलिए यह दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है। पवित्र नदी में स्नान और दान करने से पापों से मुक्ति मिलती है।
इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंस के सचिव आचार्य कौशल वत्स ने बताया इस पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन श्री हरि विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। धर्म, अध्यात्म व आयुर्वेद की दृष्टि से भी यह दिन विशेष है। इस तिथि पर मध्यरात्रि में चंद्रमा की रोशनी में केसरिया दूध व खीर प्रसादी रखने और मध्यरात्रि के उपरांत सेवन करने की परंपरा है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
विज्ञापन
ज्योतिषाचार्य विनोद त्यागी ने बताया कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की चांदनी में अमृत का निवास रहता है। इसीलिए उसकी किरणों से अमृत और आरोग्य की प्राप्ति सुलभ होती है। इस दिन मां लक्ष्मी रात में धरती पर विचरण करती हैं। इसलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा का नाम दिया गया है। चंद्रमा की किरण स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। पूर्णिमा की चांदनी में खीर बनाकर खुले आसमान में रखते हैं ताकि चंद्रमा की अमृत युक्त किरणें इसमें आएंगी और खीर औषधीय गुणों से युक्त होकर अमृत के समान हो जाती है। शरद पूर्णिमा के दिन द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के संग महारास रचाया था।
विज्ञापन
शरद पूर्णिमा पर मोह रात्रि की मान्यता
- पौराणिक मान्यता में वर्ष में तीन रात्रि विशेष मानी गई हैं। इनमें मोहरात्रि, कालरात्रि और सिद्धिरात्रि विशेष है। शरद पूर्णिमा को मोह रात्रि भी कहा गया है। इसका उल्लेख भागवत के शिव लीला कथा में मिलता है। कथानक के अनुसार शरद पूर्णिमा पर महारास के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने शिव पार्वती को निमंत्रण भेजा। मां पार्वती ने शिव से आज्ञा मांगी तो शिव ने मोहित होकर स्वयं वहां जाने की इच्छा व्यक्त की। इसलिए इस रात्रि को मोह रात्रि कहा जाता है।