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मेडिकल कॉलेज में डिप्थीरिया का बनेगा अलग वार्ड
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मेरठ। मेडिकल कॉलेज में छह बेड का डिप्थीरिया (गलाघोंटू) का अलग वार्ड बनाया जाएगा, ताकि बीमार बच्चों को दिल्ली रेफर न करना पड़ा। मेरठ में इस साल डिप्थीरिया के 33 मरीज मिले हैं। ये सभी मरीज वे हैं जिन्हें डिप्थीरिया का टीका नहीं लगा था। इन्हें दिल्ली रेफर किया गया। इनमें से दो बच्चों की मौत हो गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की टीम ने सोमवार को मेडिकल कॉलेज का निरीक्षण किया। टीम ने मेडिकल कॉलेज में अलग वार्ड बनाने के निर्देश दिए।
डब्ल्यूएचओ की टीम में नई दिल्ली से सर्विलांस हेड डॉ. अरुण कुमार, अमेरिका अटलांटा से सर्विलांस हेड डॉ. हेनरी, डॉ. संजय मल्होत्रा, डॉ. आनंद किशोर गौतम आदि थे। डॉ. अरुण और डॉ. हेनरी ने बताया कि उनकी टीम ने पहले नंगला बट्टू में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का निरीक्षण किया, इसके बाद हस्तिनापुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और फिर हस्तिनापुर क्षेत्र झड़ाका गांव गए। करीब 11 बजे मेडिकल कॉलेज पहुंचे। यहां बच्चा वार्ड, नाक कान गला विभाग में छानबीन की। मेडिकल कॉलेज में के प्रधानाचार्य से वार्ता की। उनसे डिप्थीरिया के अलग से वार्ड बनाने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि उनका मकसद विभिन्न बिंदुओं पर पड़ताल करना है। पांच बीमारियों से बचाव के लिए पेंटावैलेंट वैक्सीन लगाई जाती है। ये बीमारियां हैं, डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस, मिजिल्स रुबेला और पक्षाघात। इन बीमारियों से पीड़ित बच्चों का स्वास्थ्य केंद्रों पर सही से इलाज किया जा रहा है या नहीं। उनकी टीम 20 नवंबर तक मेरठ में रहेगी। पड़ताल के बाद अपनी रिपोर्ट शासन को पेश करेगी। जो सुधार की जरूरत उन्हें लग रही है, उसे वह मौके ही संबंधित अधिकारियों को बता रहे हैं। टीम के साथ रहे एसीएमओ डॉ. प्रवीण गौतम ने बताया कि डिप्थीरिया के अलावा और किसी बीमारी के मरीज मेरठ में नहीं मिले हैं।
यह है डिप्थीरिया
डिप्थीरिया कॉरीनेबैक्टेरियम बैक्टीरिया के इंफेक्शन से होता है। इसकी चपेट में ज्यादातर बच्चे आते हैं। इसमें सबसे पहले गले में इंफेक्शन होता है। सांस नली तक इंफेक्शन फैल जाता है। मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है। एक स्थिति के बाद इससे जहर निकलने लगता है जो खून के जरिए दिमाग और दिल तक पहुंच जाता है।
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डिप्थीरिया के लक्षण
सांस लेने में कठिनाई, गर्दन में सूजन
बुखार, गले में खराश और खांसी
बचाव
वैक्सीनेशन से बच्चों को डिप्थीरिया से बचाया जा सकता है। पांच बीमारियों से बचाव के लिए पेंटावैलेंट वैक्सीन का टीका लगाया जाता है। एक साल तक के बच्चे को तीन टीके लगते हैं। इसके बाद डेढ़ साल पर चौथा टीका और चार साल की उम्र पर पांचवां टीका लगता है।
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डब्ल्यूएचओ की टीम में नई दिल्ली से सर्विलांस हेड डॉ. अरुण कुमार, अमेरिका अटलांटा से सर्विलांस हेड डॉ. हेनरी, डॉ. संजय मल्होत्रा, डॉ. आनंद किशोर गौतम आदि थे। डॉ. अरुण और डॉ. हेनरी ने बताया कि उनकी टीम ने पहले नंगला बट्टू में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का निरीक्षण किया, इसके बाद हस्तिनापुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और फिर हस्तिनापुर क्षेत्र झड़ाका गांव गए। करीब 11 बजे मेडिकल कॉलेज पहुंचे। यहां बच्चा वार्ड, नाक कान गला विभाग में छानबीन की। मेडिकल कॉलेज में के प्रधानाचार्य से वार्ता की। उनसे डिप्थीरिया के अलग से वार्ड बनाने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि उनका मकसद विभिन्न बिंदुओं पर पड़ताल करना है। पांच बीमारियों से बचाव के लिए पेंटावैलेंट वैक्सीन लगाई जाती है। ये बीमारियां हैं, डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस, मिजिल्स रुबेला और पक्षाघात। इन बीमारियों से पीड़ित बच्चों का स्वास्थ्य केंद्रों पर सही से इलाज किया जा रहा है या नहीं। उनकी टीम 20 नवंबर तक मेरठ में रहेगी। पड़ताल के बाद अपनी रिपोर्ट शासन को पेश करेगी। जो सुधार की जरूरत उन्हें लग रही है, उसे वह मौके ही संबंधित अधिकारियों को बता रहे हैं। टीम के साथ रहे एसीएमओ डॉ. प्रवीण गौतम ने बताया कि डिप्थीरिया के अलावा और किसी बीमारी के मरीज मेरठ में नहीं मिले हैं।
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यह है डिप्थीरिया
डिप्थीरिया कॉरीनेबैक्टेरियम बैक्टीरिया के इंफेक्शन से होता है। इसकी चपेट में ज्यादातर बच्चे आते हैं। इसमें सबसे पहले गले में इंफेक्शन होता है। सांस नली तक इंफेक्शन फैल जाता है। मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है। एक स्थिति के बाद इससे जहर निकलने लगता है जो खून के जरिए दिमाग और दिल तक पहुंच जाता है।
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डिप्थीरिया के लक्षण
सांस लेने में कठिनाई, गर्दन में सूजन
बुखार, गले में खराश और खांसी
बचाव
वैक्सीनेशन से बच्चों को डिप्थीरिया से बचाया जा सकता है। पांच बीमारियों से बचाव के लिए पेंटावैलेंट वैक्सीन का टीका लगाया जाता है। एक साल तक के बच्चे को तीन टीके लगते हैं। इसके बाद डेढ़ साल पर चौथा टीका और चार साल की उम्र पर पांचवां टीका लगता है।