सहारनपुर दंगा: शब्बीरपुर गांव में हिंसा के सिवा और भी हैं गम
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सहारनपुर में हिंसा के बाद सुर्खियों में आए शब्बीरपुर गांव में सियासत सुर्ख हो चली है। सियासी दलों के नेता दुख दर्द बांटने के बहाने यहां पहुंच रहे हैं, लेकिन शब्बीरपुर की कठिनाइयों और मुश्किलों पर अब तक किसी ने जुबान नहीं खोली है। गांव की टूटी सड़कें, बिजली और पानी की विकराल समस्या, बेरोजगारी से जूझ रहे इस गांव में अब तक किसी सियासी दल ने कुछ नहीं किया। आए दिन नेताओं और मीडियाकर्मियों के दौरे से भी लोगों के कान पक गए हैं। यहां के लोग चाहते हैं कि सियासी हवाएं अब लौट जाएं।
शब्बीरपुर राजपूत और दलितों की बहुलता वाला गांव है
दरअसल, शब्बीरपुर राजपूत और दलितों की बहुलता वाला गांव है। गांव की टोटल आबादी करीब साढ़े पांच हजार है। यहां कुल 2800 वोटर हैं, जिनमें करीब 1800 राजपूत और एक हजार दलित शामिल हैं। दलितों में कम ही लोगों के पास पक्की छते हैं, जबकि ज्यादातर ने कच्ची-पीली ईंटें जोड़कर कड़ियों (बल्लियों) की छत डाली हुई है। अगजनी में कई मकानों की छतें इसी लिए ध्वस्त हो गईं, क्योंकि वह लकड़ी और घास फूस की बनी थीं। पिरथी पुत्र करेशन, सावन पुत्र गुलाब, सुरेश पुत्र चेतराम और टेकपाल पुत्र चंद्रपाल दलित समाज से हैं, जिनके पास आज भी कच्चे मकान हैं। यानी सरकार की मक्के मकान देने की योजना आज तक इस गांव में नहीं पहुंची है। राकेश पुत्र नियातरा और पटंबर पुत्र चमेला यह दो परिवार मुफलिसी के कारण छप्पर में रहते हैं। इनमें पटंबर राजपूत समाज से हैं। बताया गया है कि कर्ज अधिक होने की वजह से उन्हें अपना सबकुछ बेचना पड़ा। इसी वजह से वह आज छप्पर में रहने को मजबूर हैं।
पेयजल नहीं जहर पी रहे शब्बीरपुर के लोग
शब्बीरपुर गांव हिंडन नदी के किनारे बसा होने की वजह से अन्य गांवों की तरह यहां के हैंडपंपों का भी पानी जहर बन चुका है। दूषित पानी पीने की वजह से अभी तक अनेक लोग कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों में जकड़कर मौत का शिकार हो चुके हैं। अनेक लोगों में चर्म रोग फैल रहा है। शासन और प्रशासन की ओर से पेयजल की कोई व्यवस्था न होने की वजह से आज भी लोग जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं गांव के आधा दर्जन से अधिक सरकारी नल बंद पड़े हैं।
खुले में शौच जाती हैं बहू-बेटियां
गांव शब्बीरपुर में कुछ सक्षम परिवारों के पास अपने शौचालय हैं, जबकि गरीब परिवारों के पास शौचालय न होने की वजह से बहू और बेटियां आज भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं। यानी स्वच्छ भारत मिशन के तहत चल रहे खुले में शौचमुक्त भारत बनाने का अभियान अभी तक इस गांव में नहीं पहुंचा है।
शिक्षा के लिए छह किलोमीटर दूर जाते हैं बच्चे
शब्बीरपुर में केवल आठवीं तक का सरकारी स्कूल है। बेहतर शिक्षा के लिए उन्हें गांव छोड़ना पड़ता है। इंटर और डिग्री कॉलेज छह किलोमीटर दूर महेशपुर में है। महेशपुर में दाखिला न मिलने पर बच्चों को मजबूरन भायला जाना पड़ता है जो दस किलोमीटर दूर है।
स्वास्थ्य सेवा भी नदारद
क्षेत्र में बड़गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। ऐसे में छोटे-मोटे इलाज के लिए भी शब्बीरपुर के लोगों को बड़गांव जाना पड़ता है। हैरत की बात यह है कि बड़गांव का अस्पताल फॉर्मेसिस्ट के भरोसे चल रहा है।
सड़कों की हालत बेहद खराब
शब्बीरपुर को सहारनपुर से जोड़ने वाली मुख्य सड़क पर जलभराव की समस्या सालों से है। ऐसे में राहगीरों खासकर पैदल चलने वालों को समस्या रहती है। महेशपुर और शब्बीरपुर के बीच का मार्ग भी पूरी तरह जर्जर हो चुका है। जिसके खिलाफ आज तक आवाज नहीं उठी है।
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