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कैसे 'रावण' बना भीम आर्मी का अध्यक्ष चंद्रशेखर, सहारनपुर दंगे में कैसे उभरा नाम?

Thu, 08 Jun 2017 01:04 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ सहारनपुर
अमर उजाला ब्यूरो/ सहारनपुर Updated Thu, 08 Jun 2017 01:04 PM IST
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Saharanpur riots in one click read the reason behind, how to become 'Ravana' Bhima Army President
भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर

सहारनपुर के गांव गंगाली में स्थित एंग्लो हिंदुस्तानी पब्लिक इंटर कॉलेज भी शब्बीरपुर जातीय हिंसा के बाद अचानक सुर्खियों में है। वजह, शब्बीरपुर कांड के बाद सुर्खियों में आया भीम आर्मी का संस्थापक चंद्रशेखर उर्फ रावण इसी कॉलेज में पढ़ा था। 

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यहीं पर उसके साथ नल के इस्तेमाल व पानी को लेकर छुआछूत व भेदभाव की बातें प्रचारित की जा रही हैं और दावा किया कि उसके बाद उसने दलितों को संगठित करना शुरू कर दिया। इस कहानी की सच्चाई जानने की कोशिश में अमर उजाला टीम सोमवार को कॉलेज में पहुंची तो वहां एक जून को होने वाले गायत्री महोत्सव की तैयारियां चलती नजर आई। टीम को देखते ही कॉलेज के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी सुनील और सुशील पहुंचे और आने की वजह पूछी। चंद्रशेखर का जिक्र आते ही बोले, ‘अजी उसके साथ यहां कुछ नहीं हुआ, उसी ने कॉलेज को बदनाम कर दिया।’

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पानी को लेकर छुआछूत व भेदभाव

Saharanpur riots in one click read the reason behind, how to become 'Ravana' Bhima Army President
सहारनपुर में हुआ था बवाल

यह दोनों पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं, शुरूआती बातचीत के बाद वे टीम को प्रधानाचार्य के पास ले गए। गंगाली के ठाकुर परिवार से ताल्लुक रखने वाले स्वतंत्रता सेनानी स्व ठाकुर छज्जु सिंह पुंडीर ने वर्ष 1946 में इस कॉलेज की स्थापना की थी। कॉलेज के प्रधानाचार्य भूप सिंह बताते हैं कि वह स्वयं दलित छात्र के रुप में 1971 से 78 तक इस विद्यालय अध्ययनरत रहे हैं। 

वर्ष 2000 में अंग्रेजी प्रवक्ता के रुप में यहीं नियुक्ति पाई। वर्तमान में कार्यवाहक प्रधानाचार्य का दायित्व है। उनके साथ ना तो छात्र जीवन और ना ही अध्यापन के दौरान कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ। यहां ब्राह्मण, राजपूत और दलित सभी के बच्चे एक ही नल पर पानी पीते हैं तो एक साथ बेंचों पर बैठ कर शिक्षा ग्रहण करते हैं। पीटीए में भी चार शिक्षक दलित हैं। कुल 33 के स्टाफ में 13 दलित हैं। लिपिक ओमप्रकाश और प्रधान लिपिक संजय राठौर कालेज के बारे में प्रचलित भेदभाव की कहानी को सच्चाई से कोसो दूर बताते हैं।

टीम को प्रधानाचार्य के पास ले गए

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चंद्रशेखर आजाद के साथ उसकी मां

कॉलेज के शिक्षकों का कहना है कि दरअसल, चंद्रशेखर पर दलितों की रहनुमाई का भूत सवार है और इसके लिए वह करीब चार वर्षों से सक्रिय है। अब शब्बीरपुर की घटना के बाद उसे अचानक चमकने का मौका मिल गया। पिछले सात दशक से क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगा रहा एंग्लो हिंदुस्तानी पब्लिक स्कूल और उसका स्टाफ जातीय भेदभाव के आरोपों को सिरे से नकार रहा है। जिले में किसी भी कॉलेज के मुकाबले सर्वाधिक दलित छात्र इसी कॉलेज में हैं। वर्ष 1969 में प्रबंध समिति ने पहले दलित शिक्षक की नियुक्ति की थी। वर्तमान में भी प्रबंधक समिति में भी एक दलित सदस्य है। भेदभाव के आरोप कॉलेज को बदनाम करने की साजिश हो सकती है।

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कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ

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सहारनपुर में तनाव बरकरार

चंद्रशेखर की मां कमलेश देवी का कहना है कि मेरे पति अध्यापक थे और वे जहां जहां तैनात रहे वहां उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ा। उन्हें पानी भी अलग गिलास में दिया जाता था। यह बात चंद्रशेखर को बचपन से ही बुरी लगती थी। इसी बात ने उसे अपने समाज के लिए लड़ने का जज्बा दिया। कॉलेज में पढ़ते वक्त खुद चंद्रशेखर के साथ भी भेदभाव हुआ तो उसने अपने समाज को पहचान दिलाने की ठान ली। उसका बेटा निर्दोष है वह तो किसी का बुरा नहीं कर सकता है। वह केवल अपने समाज की पहचान मांग रहा है और पुलिस उसे नक्सली बता रही है।

चंद्रशेखर पर दलितों की रहनुमाई का भूत सवार

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महिलाओं को समझाते पुलिस अफसर

बता दें कि सहारनपुर में राजपूतों और दलितों के बीच चल रही जातीय हिंसा अब भयानकर रूप लेती नजर आ रही हैं। ये मामला पिछले एक-डेढ़ महीने से चला आ रहा है और अब तक इसमें दो लोगों की मौत हो चुकी है जबकि कई दर्जन लोग घायल हो चुके हैं। इसी दंगे की वजह से सुर्खियों में आये भीम आर्मी संगठन को अब पूरा देश जान गया है कि भीम आर्मी क्या है। इतना ही नहीं बल्कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन करने के बाद देश का हर व्यक्ति जान गया कि भीम आर्मी क्या है। सहारनपुर बवाल से पहले कोई नहीं जानता था कि भीम आर्मी कोई संगठन है, लेकिन दलितों के सहारे हवा लेकर दिल्ली पहुंचे भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण को आज हर कोई जान गया है कि ये दलितों का युवा नेता बनकर सामने आ रहा है।

पानी भी अलग गिलास में दिया जाता था

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सहारनपुर में तनाव बरकरार

वहीं मायावती ने सहारनपुर में सभा के दौरान साफ कहा था कि किसी संगठन के बजाय बसपा के बैन तले कार्यक्रम करो किसी की हिम्मत नहीं होगी रोकने की। उनके इस बयान से साफ दिखता है कि किसी और राजनीतिक पार्टी से पहले मायावती को ही भीम आर्मी संगठन से खतरा नजर आ रहा हैं। कहीं दलित इसी संगठन से जुड़कर बसपा पार्टी का नाम तक न भूल जाए। पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान चंद्रशेखर को भारी समर्थन मिलता दिखा। इस रैली में यूपी के अलावा बिहार, हरियाणा, झारखंड और पंजाब जैसे राज्यों से भी बड़ी संख्या में दलित यहां पहुंचे थे। 

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