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खतरे में रालोद का सियासी वजूद
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 12 Mar 2017 02:26 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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लोकसभा चुनाव की तरह रालोद का विधानसभा चुनाव में भी सफाया हो गया। 350 सीटों पर लड़ाकर रालोद सिर्फ किसी तरह से अपना दुर्ग छपरौली ही बचा पाया। आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा से विरोध जता रहे जाट समाज का वोट लेने में चौधरी अजित सिंह कामयाब नहीं हो सके। यही कारण है कि उनके प्रत्याशियों को पांच हजार वोट भी नहीं मिले। कई की तो जमानत तक जब्त हो गई।
रालोद को पश्चिमी यूपी की किसानों की आवाज उठाने वाली पार्टी के रूप में जाना जाता है। वेस्ट यूपी में जाटों की अच्छी संख्या के चलते पार्टी का पचास से ज्यादा सीटों पर प्रभाव रहता है। वर्ष-2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के चलते पार्टी का जाट-मुसलमान वोटर टूट गया था। इसका हश्र पार्टी को लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा था। पार्टी अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह बागपत से और उनके पुत्र जयंत चौधरी मथुरा सीट से चुनाव हार गए थे। इसके बाद पार्टी ने उठने और विधानसभा चुनाव में खोई सियासी जमीन वापस पाने के लिए कभी दिल्ली की सरकारी कोठी तो कभी जाट आरक्षण मुद्दे का सहारा लिया। लेकिन, गांव-गरीब से नेताओं का संवाद खत्म होने और बूथ स्तर तक संगठन खड़ा नहीं होने का खामियाजा विधानसभा चुनाव भी भुगतना पड़ा। जाट-मुसलमान बेस वोटर टूटने के बाद पार्टी ने इन्हें जोड़ने के लिए गंभीरता के साथ ठोस जमीनी कार्य नहीं किया। यहां तक कि पार्टी मेरठ जैसे बड़े और महत्वपूर्ण शहर में भी आज तक अपना कार्यालय नहीं बना सकी।
बाहरियों को तरजीह पड़ी भारी
पार्टी ने पहली बार प्रदेश की 350 सीटों पर बिना किसी सक्रिय संगठन और सियासी गुणा-भाग के बाहरी प्रत्याशियों को वफादारों पर तरजीह देकर उतारा। जो नेता पार्टी के बुरे दौर में उसके साथ खड़े थे, प्रत्याशियों की सूची में उनके नाम के बजाय दूसरे दलों से आए बागियों के नाम थे। इसका अंजाम पार्टी को भुगतना पड़ा। कुछ को छोड़कर पार्टी के अधिकतर प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई।
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हवा में पाल बैठे जीत का सपना
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की जमीनी नेताओं से संवादहीनता और गैर सुलभता से पार्टी का वजूद लगातार दरक रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद लंबा समय मिलने के बाद भी पार्टी को उठाने के लिए न तो कोई ठोस रणनीति बनी और न ही ठोस प्रयास हुए। जाट-मुसलमान को फिर से जोड़ने और इसके अलावा पहले से पार्टी का साथ देने वाले अति पिछड़ा वर्ग को साथ लाने का प्रयास नहीं किया गया। शीर्ष नेतृत्व हवा में ही चुनाव जीतने का सपना पाले रहा और अनाप-शनाप फैसले लेता रहा।
वजूद बचाने की होगी चुनौती
लोकसभा के बाद विधानसभा में भी करारी हार के बाद अब पार्टी के सामने वजूद बचाने की चुनौती है। पार्टी को बचाने के लिए न सिर्फ संगठन को फिर से दुरुस्त करना होगा, बल्कि वफादार नेताओं व कार्यकर्ताओं पर भरोसा करना होगा। चौधरी अजित सिंह, जयंत चौधरी को दिल्ली की कोठी से निकलकर जमीनी राजनीति पर ध्यान देना होगा।
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रालोद को पश्चिमी यूपी की किसानों की आवाज उठाने वाली पार्टी के रूप में जाना जाता है। वेस्ट यूपी में जाटों की अच्छी संख्या के चलते पार्टी का पचास से ज्यादा सीटों पर प्रभाव रहता है। वर्ष-2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के चलते पार्टी का जाट-मुसलमान वोटर टूट गया था। इसका हश्र पार्टी को लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा था। पार्टी अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह बागपत से और उनके पुत्र जयंत चौधरी मथुरा सीट से चुनाव हार गए थे। इसके बाद पार्टी ने उठने और विधानसभा चुनाव में खोई सियासी जमीन वापस पाने के लिए कभी दिल्ली की सरकारी कोठी तो कभी जाट आरक्षण मुद्दे का सहारा लिया। लेकिन, गांव-गरीब से नेताओं का संवाद खत्म होने और बूथ स्तर तक संगठन खड़ा नहीं होने का खामियाजा विधानसभा चुनाव भी भुगतना पड़ा। जाट-मुसलमान बेस वोटर टूटने के बाद पार्टी ने इन्हें जोड़ने के लिए गंभीरता के साथ ठोस जमीनी कार्य नहीं किया। यहां तक कि पार्टी मेरठ जैसे बड़े और महत्वपूर्ण शहर में भी आज तक अपना कार्यालय नहीं बना सकी।
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बाहरियों को तरजीह पड़ी भारी
पार्टी ने पहली बार प्रदेश की 350 सीटों पर बिना किसी सक्रिय संगठन और सियासी गुणा-भाग के बाहरी प्रत्याशियों को वफादारों पर तरजीह देकर उतारा। जो नेता पार्टी के बुरे दौर में उसके साथ खड़े थे, प्रत्याशियों की सूची में उनके नाम के बजाय दूसरे दलों से आए बागियों के नाम थे। इसका अंजाम पार्टी को भुगतना पड़ा। कुछ को छोड़कर पार्टी के अधिकतर प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई।
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हवा में पाल बैठे जीत का सपना
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की जमीनी नेताओं से संवादहीनता और गैर सुलभता से पार्टी का वजूद लगातार दरक रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद लंबा समय मिलने के बाद भी पार्टी को उठाने के लिए न तो कोई ठोस रणनीति बनी और न ही ठोस प्रयास हुए। जाट-मुसलमान को फिर से जोड़ने और इसके अलावा पहले से पार्टी का साथ देने वाले अति पिछड़ा वर्ग को साथ लाने का प्रयास नहीं किया गया। शीर्ष नेतृत्व हवा में ही चुनाव जीतने का सपना पाले रहा और अनाप-शनाप फैसले लेता रहा।
वजूद बचाने की होगी चुनौती
लोकसभा के बाद विधानसभा में भी करारी हार के बाद अब पार्टी के सामने वजूद बचाने की चुनौती है। पार्टी को बचाने के लिए न सिर्फ संगठन को फिर से दुरुस्त करना होगा, बल्कि वफादार नेताओं व कार्यकर्ताओं पर भरोसा करना होगा। चौधरी अजित सिंह, जयंत चौधरी को दिल्ली की कोठी से निकलकर जमीनी राजनीति पर ध्यान देना होगा।