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Ramadan 2022: रोजा सिर्फ भूखे रहना नहीं, मोहब्बत का पैगाम देता है रोजा, गरीबों से हमदर्दी जरूरी
Sun, 03 Apr 2022 03:27 PM IST
Dimple Sirohi
शाह आलम, संवाद न्यूज, मेरठ देहात
शाह आलम, संवाद न्यूज, मेरठ देहात
Published by: Dimple Sirohi
Updated Sun, 03 Apr 2022 03:27 PM IST
सार
इस पाक महीने को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमतों का है। खुदा की तरफ से रहमत बरसती है। भीषण गर्मी और जिस्म को झुलसा देने वाली धूप के बावजूद रोजेदार अपनी इबादत में जुटे रहते हैं।
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घंटाघर के बाजार में खरीददारी करते मुस्लिम लोग
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
माह-ए-रमजान रहमत व बरकत की बारिश का ऐसा महीना है जिसमें हर तरफ इबादत का सिलसिला चलता है। रमजानुल मुबारक का महीना मुसलमानों के लिए सबसे अफजल महीना माना गया है। यह महीना भाईचारे और इंसानियत का पैगाम भी देता है। रोजा सिर्फ दिन भर भूखा रहने का नाम नहीं, बल्कि रोजा इंसान को इंसान से प्यार करना सिखाता है। रोजा गरीब भाइयों से मुहब्बत करने का जज्बा पैदा करता है।
इस पाक महीने को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमतों का है। खुदा की तरफ से रहमत बरसती है। भीषण गर्मी और जिस्म को झुलसा देने वाली धूप के बावजूद रोजेदार अपनी इबादत में जुटे रहते हैं। उनकी इबादत के सामने मौसम की तल्खियां भी कोई असर नहीं डाल पाती हैं।
यह भी पढ़ें: Ramadan 2022: 14 घंटे का होगा पहला रोजा, कैसे बरतें एहतियात, सेहत का भी रखना होगा ध्यान
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सरधना से शहर काजी मुफ्ती शाकिर कासमी ने बताया कि रोजा सब्र का नाम है। हमें रमजान के पाक महीने में एक-दूसरे के साथ मुहब्बत का पैगाम देकर इंसानियत मजबूत करनी चाहिए। गरीबों को खाना खिलाकर हम दुआएं हासिल करें।
जामिया दारूसलाम के मोहतमिम मौलाना यूसुफ कासमी ने हदीस के हवाले से बताया कि रहमत और बरकत के नजरिए से रमजान के महीने को तीन हिस्सों (अशरों) में बांटा गया है। महीने के पहले 10 दिनों में अल्लाह अपने रोजेदार बंदों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरे अशरे में अल्लाह रोजेदारों के गुनाह माफ करता है और तीसरा अशरा दोजख की आग से निजात पाने की इबादत का जरिया बताया गया है। खुदा का हुक्म है कि रोजेदार अपनी हैसियत के अनुसार इस महीने में गरीब लोगों की ज्यादा से ज्यादा मदद करें। रोजा सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि गरीबों से हमदर्दी का नाम है।
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इस पाक महीने को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमतों का है। खुदा की तरफ से रहमत बरसती है। भीषण गर्मी और जिस्म को झुलसा देने वाली धूप के बावजूद रोजेदार अपनी इबादत में जुटे रहते हैं। उनकी इबादत के सामने मौसम की तल्खियां भी कोई असर नहीं डाल पाती हैं।
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सरधना से शहर काजी मुफ्ती शाकिर कासमी ने बताया कि रोजा सब्र का नाम है। हमें रमजान के पाक महीने में एक-दूसरे के साथ मुहब्बत का पैगाम देकर इंसानियत मजबूत करनी चाहिए। गरीबों को खाना खिलाकर हम दुआएं हासिल करें।
जामिया दारूसलाम के मोहतमिम मौलाना यूसुफ कासमी ने हदीस के हवाले से बताया कि रहमत और बरकत के नजरिए से रमजान के महीने को तीन हिस्सों (अशरों) में बांटा गया है। महीने के पहले 10 दिनों में अल्लाह अपने रोजेदार बंदों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरे अशरे में अल्लाह रोजेदारों के गुनाह माफ करता है और तीसरा अशरा दोजख की आग से निजात पाने की इबादत का जरिया बताया गया है। खुदा का हुक्म है कि रोजेदार अपनी हैसियत के अनुसार इस महीने में गरीब लोगों की ज्यादा से ज्यादा मदद करें। रोजा सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि गरीबों से हमदर्दी का नाम है।