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चुनावी आगाज: तीसरी बार भी मेरठ से हवा का रुख तय करेंगे PM मोदी, अजित सिंह की गैर मौजूदगी में जयंत की परीक्षा

Sun, 31 Mar 2024 03:04 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Sun, 31 Mar 2024 03:04 PM IST
सार

भाजपा आज पश्चिमी यूपी से चुनावी आगाज कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले लोकसभा चुनाव की तरह आज क्रांतिधरा मेरठ से चुनावी शंखनाद करने जा रहे हैं। इस बार जयंत चौधरी भी उनके साथ होंगे।

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PM Modi decides voters direction from Meerut for third time, test for Jayant
पीएम मोदी,सीएम योगी व जयंत चौधरी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस बार भी हवा का रुख पश्चिम यूपी ही तय करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव का बिगुल मेरठ से ही फूंकेंगे। हालांकि 2019 के मुकाबले इस बार तस्वीर काफी अलग है। तब सपा, बसपा और रालोद का गठबंधन था। इस बार सपा और कांग्रेस का गठबंधन है। रालोद अब एनडीए का हिस्सा है। बसपा अकेले चुनावी रण में है। 

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27 मार्च 2019 को नरेंद्र मोदी ने मेरठ से लोकसभा चुनाव के प्रचार का आगाज किया था। रैली स्थल था एनएच-58 स्थित सिवाया टोल के पास वेदांत कुंज का मैदान। तब सपा-रालोद और बसपा गठबंधन में थे।
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प्रधानमंत्री ने इन्हें सराब (सपा-रालोद-बसपा) बताया था। कहा था, सेहत के लिए इनसे दूर रहें। भाषण में सर्जिकल स्ट्राइक, बेटियों की सुरक्षा और तीन तलाक का मुद्दा उठाया था और नए भारत का सपना दिखाया था। कांग्रेस पर भी हमला बोला था। गरीबी और विकास न होने के लिए इन्हें जिम्मेदार ठहराया था। किसानों के गन्ना भुगतान की बात की थी। अपने नाम पर वोट मांगा था। कहा था कि जो भी कमल का बटन दबाएगा, वोट सीधे मोदी को जाएगा।

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इससे पहले दो फरवरी 2014 में भी मोदी ने मेरठ में ही चुनावी रैली की थी। रैली शताब्दीनगर माधवकुंज में हुई थी। तब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने लोगों से भाजपा को वोट देने का आह्वान किया था। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत को याद किया था। 1857 की क्रांति के शहीदों को याद कर कांग्रेस और यूपीए सरकार पर उन्हें भुला देने का तंज कसा था। कहा था कि कांग्रेस विभाजनकारी पार्टी है। वे बांटो और राज करो में विश्वास करते हैं। 

मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास, कमजोर अर्थव्यवस्था और प्रदेश में रही कमजोर कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाया था। दंगा मुक्त यूपी देने का वादा किया था। उत्तर प्रदेश में बिजली के हाल पर तंज कसते हुए कहा था कि गुजरात में 365 दिन 24 घंटे बिजली मिलती है। रेलवे नेटवर्क, हवाई अड्डा, एक्सप्रेसवे और हवाई अड्डे का सपना दिखाया। गन्ना किसानों और उनके भुगतान की बात की। भ्रष्टाचार बढ़ने और बेरोजगारी पर भी अपनी बात कही थी। 

हिंदुत्व के एजेंडे को भी धार
सीएए लागू कर भाजपा ने साफ संदेश दे दिया है कि वह हिंदुत्व के एजेंडे पर चुनाव मैदान में उतरने जा रही है। इसके मद्देनर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोकस विकास के साथ आस्था पर रह सकता है। विकास में रैपिड, एक्सप्रेसवे, खेल विश्वविद्यालय, गंगा एक्सप्रेसवे और आईटी पार्क पर फोकस कर सकते हैं। राम मंदिर, मथुरा और काशी भी प्रमुख रहने की उम्मीद है।  

सपा-बसपा गठबंधन ने पश्चिम की सात सीटों पर किया था कब्जा
भाजपा ने 2014 में मेरठ, बागपत, बिजनौर, नगीना, कैराना, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर जीती थी, जबकि 2019 में सहारनपुर, बिजनौर, नगीना और अमरोहा बसपा ने जीत ली। मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत और कैराना में भाजपा जीती थी। सपा का रामपुर, मुरादाबाद और संभल पर कब्जा रहा।

अजित सिंह की गैर मौजूदगी में जयंत की होगी परीक्षा 
हाल के लोकसभा चुनावों में चौधरी अजित सिंह के बिना यह पहला लोकसभा चुनाव होगा। 2014 व 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में अजित सिंह की पार्टी आरएलडी हाशिए पर थी। 2020 में अजित सिंह के निधन के बाद पहला चुनाव 2022 का विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी ने सपा के साथ गठबंधन किया और 9 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल कर ली। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद यह पहला चुनाव था जिसमें भाजपा को कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। पश्चिम में रालोद को संजीवनी मिली तो भाजपा की चिंता बढ़ गई। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर प्रधानमंत्री ने जयंत चौधरी का दिल जीत लिया। इस फैसले ने रालोद को भाजपा के साथ लाकर खड़ा कर दिया।

2014 में परचम 19 में घटी थीं सीटें 
2019 में भाजपा ने कई सीटों पर पकड़ खो दी। बसपा के सामने सहारनपुर, बिजनौर और नगीना में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। मुजफ्फरनगर, मेरठ, कैराना और बागपत में जीत मिली। इस बार भाजपा ने रालोद के साथ हाथ मिलाया है। नतीजे बताएंगे कि गठबंधन का जादू कितना कारगर होता है। 

मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट
वर्ष 2014 और 2019 के मेरठ-हापुड लोकसभा सीट पर मत प्रतिशत में भाजपा ने बढ़त बनाई। दूसरे स्थान पर बसपा और तीसरे एवं चौथे स्थान पर कांग्रेस रही है। कुल मिलाकर दोनों लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जनता में 1.35 प्रतिशत की बढ़त बनायी। जिसके चलते भाजपा के राजेन्द्र अग्रवाल ने 2014 में 532981 मत पाकर विजयी पताका फहराई, वहीं 2019 में 586184 मत पाकर तीसरी बार संसद पहुंचे। भाजपा का मत प्रतिशत 48.44 पहुंच गया, जबकि 2014 में 47.09 प्रतिशत था। इस बार भाजपा से अरुण गोविल, बसपा से देवव्रत त्यागी, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन का प्रत्याशी तय नहीं है।

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मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट
दंगे के बाद हुए चुनाव में भाजपा ने वर्ष 2014 में डॉ. संजीव बालियान को टिकट दिया था। लहर चली तो बालियान को 653391 और बसपा के तत्कालीन सांसद कादिर राना को 252241 वोट मिले थे। जीत का अंतर बड़ा था। सपा के कद्दावर नेता रहे और वर्तमान में भाजपा के एमएलसी वीरेंद्र सिंह को सिर्फ 160810 वोट मिले थे। वर्ष 2019 में भाजपा से डॉ. संजीव बालियान को 573780 वोट मिले, जबकि दिवंगत अजित सिंह को 567254 वोट मिले थे। पहले चुनाव में जीत का अंतर चार लाख से ज्यादा वोट का था, लेकिन 2019 में यह सिर्फ 6526 वोट पर सिमट गया। इस बार चुनाव से पहले भाजपा और रालोद का गठबंधन हुआ। अब नतीजों पर लोगों की निगाह टिकी है। सवाल है और जवाब सिर्फ नतीजों से ही मिलेंगे। सपा ने इस बार पूर्व राज्यसभा सांसद हरेंद्र मलिक और बसपा ने दारा सिंह प्रजापति को मैदान में उतारा है। 

बागपत लोकसभा सीट
2014 में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे डाॅ. सत्यपाल सिंह को 423475 वोट मिले थे, जबकि सपा के गुलाम मोहम्मद को 213609 वोट मिले। दिवंगत अजित सिंह 199516 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रहे।  वर्ष 2019 में भाजपा के वोट बढ़े, लेकिन जीत का अंतर कम रहा। डाॅ. सत्यपाल सिंह को 525789 और रालोद अध्यक्ष जयंत सिंह को 502287 वोट मिले थे। जीत का अंतर सिर्फ 23502 रहा गया। गठबंधन में इस बार सीट रालोद के हिस्से में चली गई। 

बिजनौर लोकसभा सीट
2014 में भाजपा के टिकट पर कुंवर भारतेंद्र को 486913, सपा के शाहनवाज राणा को 281139 और बसपा के मलूक नागर को 230124 वोट मिले थे। बड़े अंतर से भाजपा जीती, लेकिन वर्ष 2019 में बाजी पलट गई। बसपा के मलूक नागर ने 561045 और भाजपा के कुंवर भारतेंद्र सिंह को 491104 वोट मिले। 2014 के मुकाबले भाजपा को वोट अधिक मिले, लेकिन नतीजों में बसपा भारी रही। 1989 में बसपा अध्यक्ष मायावती की जीत के बाद बसपा ने सीट वापस हासिल की थी। देखने वाली बात यह होगी कि इस बार नतीजे क्या रहते हैं।

नगीना लोकसभा सीट
2009 में सपा के यशवीर सिंह ने 234815 वोट हासिल कर बसपा के रामकिशन सिंह को हराया। 2014 में भाजपा से डॉ. यशवंत सिंह ने 367825 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। सपा के यशवीर सिंह दूसरे और बसपा के गिरीश चंद्रा ने तीसरे स्थान पर रहे। लेकिन 2019 में यहां बसपा ने फिर बाजी पलट दी थी। बसपा के गिरीश चंद्रा 568378 वोट हासिल कर सांसद चुने गए थे। भाजपा के डॉ. यशवंत सिंह दूसरे स्थान पर खिसक गए। भाजपा से ओमकुमार, बसपा से सुरेंद्रपाल सिंह मैनवाल, सपा से मनोज कुमार और आसपा से चंद्रशेखर भी प्रत्याशी हैं।

कैराना लोकसभा सीट
2014 में भाजपा से हुकुम सिंह ने 565909 वोट हासिल कर 236828 वोटों के अंतर से सपा के नाहिद हसन को हरा दिया था। बसपा के टिकट पर कंवर हसन तीसरे स्थान पर रहे थे। हुकुम सिंह के निधन के बाद हुए उपचुनाव में रालोद-सपा गठबंधन से तबस्सुम हसन जीत गई और मृगांका सिंह को हार मिली। 2019 में भाजपा से प्रदीप चौधरी ने 566961 वोट हासिल किए और सपा की तबस्सुम बेगम को 92160 से हराया।  2014 में भाजपा की बड़ी जीत हुई थी। कांग्रेस के हरेंद्र मलिक तीसरे स्थान पर रहे थे। इस बार भाजपा ने प्रदीप चौधरी और सपा ने इकरा हसन को चुनाव मैदान में उतारा है।

सहारनपुर लोकसभा सीट
सियासत के रण में एक बार फिर से धुरंधर आ गए हैं। भाजपा और कांग्रेस सहारनपुर में वापसी के जिए जद्दोजहद कर रही है। 2014 में भाजपा के राघवलखन पाल जीते, लेकिन 2019 में बसपा प्रत्याशी हाजी फजलुर्रहमान जीत गए। इस बार भाजपा वापसी के लिए पूरे जोर लगा रही है। राघवलखन पाल भाजपा के प्रत्याशी हैं। 2019 में जहां बसपा-सपा और रालोद का गठबंधन था और जीत भी हासिल हुई थी, लेकिन इस बार बसपा अपने दम पर चुनाव मैदान में है। बसपा ने माजिद अली को मैदान में उतार रखा है। सपा-कांग्रेस से इमरान मसूद मैदान में हैं

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