आखिर क्यों त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव भाजपा के लिए चुनौती, इस रिपोर्ट में पढ़िए
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त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है। इस साल चुनाव होंगे। अहम बात यह है कि यदि सब ठीक रहा तो जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुखों के चुनाव सीधे जनता द्वारा कराए जा सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो यह चुनाव भाजपा के लिए चुनौती होगी। क्योंकि अभी तक धन-बल के आधार पर होते आए इन चुनाव में जिसकी प्रदेश में सरकार उसकी ही गांवों में सरकार बनती रही है।
पंचायत चुनाव का काउंट डाउन शुरू हो चुका है। राजनीतिक दल भी अपनी गोटियां बिछाने में लग गए हैं। बात अगर पिछले दो चुनावों की करें तो 2010 में प्रदेश में बसपा की सरकार थी। सपा और भाजपा ने भी उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। लेकिन जनपद के 12 में से 10 ब्लाकों में बसपा के ब्लाक प्रमुख चुने गए। वहीं, जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर भी बसपा ने ही कब्जा किया। इसके बाद 2015 में चुनाव हुए तो प्रदेश में सपा की सरकार थी। इस चुनाव में भी अधिकांश ब्लाक प्रमुख सपा के निर्वाचित हुए तो जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर कांटे की टक्कर में सपा ने बाजी मारी। यह बात अलग रही कि 2017 में जैसे ही प्रदेश में भाजपा की सरकार आई तो जिला पंचायत अध्यक्ष की भाजपाइयों ने ऐसी घेराबंदी की कि उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा ने जीत हासिल की। वहीं, कई ब्लाक प्रमुख भी बदले माहौल में पाला बदलकर भाजपा के साथ आ गए।
इस बार है बड़ी चुनौती
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा तक के सभी चुनाव में भागीदारी का ऐलान कर चुका है। मतलब साफ है कि इस बार के पंचायत चुनाव में भाजपा पूरी गंभीरता से मैदान में उतरेगी। भाजपा की इस समय प्रदेश में सरकार भी है। बावजूद इसके जो माहौल इस समय बना हुआ है, उसके चलते पंचायत चुनाव में परचम लहराना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी। इसका बड़ा कारण यह है कि पंचायत चुनाव पार्टी स्तर पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत छवि और संबंधों पर टिके होते हैं। ऐसे में ग्राम पंचायत स्तर का चुनाव भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगा।
प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष पर नजर
प्रदेश सरकार की तरफ से पंचायत चुनाव में संशोधन को लेकर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। जिसमें ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव भी जनता द्वारा सीधे कराए जाने की मांग की गई है। यदि यह संशोधन होता है तो तय है कि चुनाव में धन और बल का प्रयोग नजर नहीं आएगा। वहीं, सत्ता का असर भी चुनाव में कम ही नजर आएगा।
देहात में पैठ बनाने में छूटेंगे पसीने
भाजपा का शहरी क्षेत्र में पूरा असर है, लेकिन देहात में अभी भी भाजपा कहीं न कहीं संघर्ष करती नजर आती है। ऐसे में यदि पंचायत चुनाव में इस बार भाजपा सफल हो जाती है तो उसके लिए बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन सपा, बसपा और रालोद इस चुनाव में भाजपा के सामने बड़ी चुनौती पेश करेंगी, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है।
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