पंचायत चुनाव: भाजपा के लिए भारी न पड़ जाए भितरघात, पढ़िए अमर उजाला की ये खास रिपोर्ट
कोरोना महामारी के दौर में हुए पंचायत चुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में करीब दो प्रतिशत मतदान कम हुआ।
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कोरोना महामारी के दौर में हुए पंचायत चुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में करीब दो प्रतिशत मतदान कम हुआ। कम मतदान के बाद प्रत्याशी और उनके गणितज्ञ साथी बूथबार ऑकड़े जुटा कर नतीजों के आंकलन में जुट गए हैं। कई के चेहरे खिल गए हैं तो कुछ निराश भी हैं। दूसरी ओर भाजपा समेत सभी दलों के प्रत्याशियों के साथ भितरघात भी हुआ है।
2015 में कड़ाके की सर्दी, गन्ना कटाई के बीच हुए पंचायत चुनाव में 75.14 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार मौसम अनूकुल था, लेकिन कोरोना ने बाहर से आने वाले मतदाताओं को रोक दिया। यही कारण रहा कि जनपद में इस बार दो प्रतिशत कम मतदान हुआ। कम मतदान का असर मुख्य रूप से ग्राम प्रधान के पद के दावेदारों पर पड़ेगा। चूंकि जिला पंचायत सदस्यों का चुनाव भी साथ था, इसलिए हार-जीत का अंतर इन प्रत्याशियों पर भी पड़ना तय है।
इस बार के चुनाव में राजनीतिक दल खुलकर सक्रिय थे। बागी प्रत्याशियों पर भाजपा से लेकर बसपा, सपा और रालोद ने कार्रवाई की लेकिन, इनके बीच भितरघात नहीं रुक सका। वार्ड 32 से भाजपा के रोहताश पहलवान को प्रत्याशी मतदान के दिन हर तरफ से भितरघात का शिकार होते नजर आए। विपक्षी दलों ने तो उन्हें घेरा ही, भाजपा की एक लॉबी ने भी उनकी घेराबंदी की। यही स्थिति सबसे हाई प्रोफाइल सीट वार्ड 13 की रही। यहां से डॉ. मीनाक्षी भराला चुनाव लड़ रही हैं। वह लगातार दो बार से जिला पंचायत सदस्य हैं और भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश मंत्री भी हैं। उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए सशक्त दावेदार माना जा रहा है। लेकिन वह अपने वार्ड में विपक्षियों से ज्यादा अपनों से ज्यादा घिरी नजर आईं। भाजपा के परंपरागत वोट काटने के लिए त्यागी, ब्राहमण, वैश्य, गुर्जर आदि तमाम बिरादरियों से यहां प्रत्याशी खड़े कर दिए गए। किसान आंदोलन के चलते जाट वोट पहले से ही नाराज था। रही-सही कसर स्थानीय भाजपा नेताओं ने पूरी कर दी। सिवालखास विधानसभा की भावी राजनीति के चलते खुलकर तो कोई सामने नहीं आया लेकिन, भितरघात नहीं रोका जा सका।
हस्तिनापुर में वार्ड दो में वेदवती की भी पूरी घेराबंदी की गई। इस सीट पर हस्तिनापुर विधायक दिनेश खटीक की प्रतिष्ठा जुड़ी है। यहां विपक्षी तो एकजुट हुए ही, भाजपा के भी एक गुट ने जमकर खेल खेला। सीट फंसी हुई नजर आ रही है। वेदवती को भी भाजपा का एक खेमा जिला पंचायत अध्यक्ष का सशक्त दावेदार मान रहा है।
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पांच विधायकों का राजनीतिक भविष्य भी तय करेंगे परिणाम
जिला पंचायत के 33 वार्ड सदस्यों के चुनाव में जिले के पांच विधायकों की प्रतिष्ठा दांव पर है। हर वार्ड में भाजपा के प्रत्याशियों की राह आसान नजर नहीं आ रही है। किसान आंदोलन और स्थानीय मुद्दों पर मतदाता बंटे हुए नजर आए। गांवों में लोगों ने पार्टी को कम स्थानीय स्तर पर हुए कार्यों को अधिक तरजीह दी। ये भी तब, जबकि अधिकतर वार्डों में टिकट विधायकों की सिफारिशों पर हुए हैं।
जिले में जहां चुनाव हुए हैं, वहां सभी विधायक भाजपा के हैं। दक्षिण से सोमेंद्र तोमर, सरधना से संगीत सोम, किठौर से सत्यवीर त्यागी, हस्तिनापुर से दिनेश खटीक और सिवालखास से जितेंद्र सतवाई सभी वार्डों में अपने प्रत्याशियों को जिताने की कोशिश में थे। चुनाव के नतीजे प्रत्याशियों के साथ-साथ विधायकों के लिए अहम होंगे। अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होना है, ऐसे में किस विधायक का क्या असर है, ये परिणाम से स्पष्ट हो जाएगा। दूसरी ओर रालोद, सपा, बसपा और कांग्रेस के पास चुनाव में खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। इन दलों ने अधिकतर वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं। एक-दो वार्ड को छोड़कर अधिकतर जगह त्रिकोणीय मुकाबला नजर आया। हालांकि कृषि कानूनों को लेकर पहले से दिख रहा गुस्सा अगर मतदान के रूप में भी सामने आया तो नतीजे बिल्कुल अलग होंगे।
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