मेरठ में कोरोना संक्रमित मरीजों की जान बचाने के लिए जूझ रहे तीमारदारों को समझ नहीं आ रहा है कि वे जाएं तो जाएं कहां। किसी अस्पताल में बेड नहीं मिल रहा तो कहीं ऑक्सीजन नहीं मिल रही। किसी अस्पताल में भी अधिकतर मरीजों को पूरा इलाज नहीं मिल पा रहा है।
बेबसी: जाएं तो जाएं कहां, कहीं बेड तो कहीं ऑक्सीजन का संकट, अपनों को बचाने के लिए भटक रहे परिजन
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केस एक : मां को घर पर ही दिलाना पड़ा इलाज
- शास्त्रीनगर निवासी सुभाष अपनी बुजुर्ग मां सावित्री देवी को लेकर सुबह से शाम तक अस्पतालों में भटकते रहे। कुछ अस्पताल में बेड थे तो ऑक्सीजन नहीं, कुछ ने मरीज ज्यादा बता दिए। अब मां को होम आइसोलेशन में रखा है।
केस दो- ऑक्सीजन अपनी लाओ, बेड दे देंगे
- पांडव नगर के उमेश के बड़े भाई रामेश्वर होम आइसोलेशन में हैं। उनका ऑक्सीजन स्तर लगातार गिर रहा है। उमेश ने आठ से दस अस्पतालों को फोन घुमाया। यही जवाब मिला कि अपनी ऑक्सीजन ले आओ, हम बेड दे देंगे।
केस तीन- भर्ती कर लेंगे, वेंटिलेटर की जिम्मेदारी नहीं
- मोदीपुरम के विशाल अपनी 55 वर्षीय मां शांति देवी को अस्पताल में भर्ती कराना चाहते हैं। शांति देवी की हालत नाजुक है, जहां पहले इलाज चल रहा था उस अस्पताल में वेंटिलेटर नहीं हैं। दूसरे अस्पताल में भर्ती कराना है लेकिन वेंटिलेटर वाले बेड नहीं मिल रहे। विशाल बस दुआ कर रहा है कि मां बच जाए।
जिम्मेदारी लेने से बच रहे अफसर
- तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमितों के इलाज की जिम्मेदारी लेने से अफसर बच रहे हैं। ऑक्सीजन, केन्यूला, बेड, इलाज, दवाएं, प्लाज्मा और रेमडेसिविर किसी भी मसले पर अफसर कुछ बोलना नहीं चाहते। मरीज, तीमारदार परेशान हैं। अस्पताल से लेकर घरों में मरीज तड़प रहे हैं, उचित इलाज नहीं मिल रहा। सांसों पर संकट है, मगर सुनवाई नहीं हैं।