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संस्कृत के माध्यम से विद्यार्थियों का नैतिक विकास संभव
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मवाना। भारतीय भाषा समर कैंप के छठे दिन बताया गया कि संस्कृत के माध्यम से विद्यार्थियों का नैतिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास संभव है। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के महात्मा गांधी प्रेक्षागृह में चल रहे कैंप में मेजर डाॅ. पूनम लखनपाल ने भगवद्गीता के श्लोकों के माध्यम से जीवन में संयम, स्वअनुशासन एवं एकाग्रता के महत्व को रेखांकित करते हुए विद्यार्थियों को प्रेरित किया।
उन्होंने संस्कृत के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति के मूलभूत आदर्शों, नैतिक मूल्यों एवं आत्मविकास के सूत्रों से जोड़ा। आचार्य सहायक अध्यापक रामस्वरूप ने छात्रों को नहरों, शहरों, सब्जियों व फलों के संस्कृत नामों से परिचित कराया। पूनम राय ने आधुनिक समय में संस्कृत सीखने के सरल और नवाचार युक्त तरीकों और रचनात्मक क्रियाकलापों की जानकारी दी। आचार्य नीलकमल, आचार्य तरुण एवं आचार्य देवेंद्र ने संस्कृत शिक्षण की विभिन्न विधियों एवं अभ्यासों में शिक्षार्थियों को सक्रिय रूप से सहभागी बनाया।
कार्यक्रम प्रभारी नरेश कुमार (प्रवक्ता) ने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति है। महापुरुषों जैसे महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद, आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा आदि ने संस्कृत को राष्ट्र पुनर्निर्माण की धुरी बताया है।
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प्राचार्य मनोज कुमार आर्य ने अपने प्रेरणास्पद उद्बोधन में कहा कि संस्कृत के माध्यम से विद्यार्थियों का नैतिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास संभव है। प्राचार्य ने सभी प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया और कहा कि संस्कृत भाषा में हमारी सांस्कृतिक चेतना समाहित है।
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उन्होंने संस्कृत के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति के मूलभूत आदर्शों, नैतिक मूल्यों एवं आत्मविकास के सूत्रों से जोड़ा। आचार्य सहायक अध्यापक रामस्वरूप ने छात्रों को नहरों, शहरों, सब्जियों व फलों के संस्कृत नामों से परिचित कराया। पूनम राय ने आधुनिक समय में संस्कृत सीखने के सरल और नवाचार युक्त तरीकों और रचनात्मक क्रियाकलापों की जानकारी दी। आचार्य नीलकमल, आचार्य तरुण एवं आचार्य देवेंद्र ने संस्कृत शिक्षण की विभिन्न विधियों एवं अभ्यासों में शिक्षार्थियों को सक्रिय रूप से सहभागी बनाया।
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कार्यक्रम प्रभारी नरेश कुमार (प्रवक्ता) ने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति है। महापुरुषों जैसे महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद, आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा आदि ने संस्कृत को राष्ट्र पुनर्निर्माण की धुरी बताया है।
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प्राचार्य मनोज कुमार आर्य ने अपने प्रेरणास्पद उद्बोधन में कहा कि संस्कृत के माध्यम से विद्यार्थियों का नैतिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास संभव है। प्राचार्य ने सभी प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया और कहा कि संस्कृत भाषा में हमारी सांस्कृतिक चेतना समाहित है।