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...जब फिल्म 'गोल्ड' में आया ऐसा सीन, विदेशों तक गूंज उठा क्रांतिधरा मेरठ का नाम

Sat, 18 Aug 2018 07:34 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
यूपी डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Updated Sat, 18 Aug 2018 07:34 PM IST
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Meerut's name in the film Gold, and Meerut's name is other countries
फाइल फोटो

क्रांतिधरा मेरठ का नाम देश क्या विदेशों में चर्चा में हैं। हाल ही रिलीज हुई फिल्म 'गोल्ड' में मेरठ को यह सौभाग्य मिला है कि 157 मिनट की इस फिल्म में दिखाए गए विभाजन के सीन में खिलाड़ियों की चर्चा में मेरठ का नाम लिया गया है।

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बता दें कि 1948 में ओलंपिक खेलने गई भारत की टीम में आत्मविश्वास भरा हुआ था। सेमीफाइनल में नीदरलैंड के साथ हुए मुकाबले में भारतीय टीम मजबूती के साथ मैदान में उतरी थी।

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फिल्म रिव्यू
रीमा कागती की 'गोल्ड' के लिए यह सटीक समय है। स्वतंत्रता दिवस की गर्वीली भावनाएं और खेलों का नया मौसम, एशियाई खेल। 'चक दे इंडिया' (2007) और 'सूरमा' (2018) के बाद 'गोल्ड' हॉकी मैदान की एक और कहानी है। वह खेल, जिसमें दुनिया में भारत की तूती बोलती थी। 1948 से पहले के खेल इतिहास में हमारी टीमें ब्रिटिश इंडिया के नाम से उतरती थी। जीतने पर गोरों का ध्वज फहराता था। परंतु 'गोल्ड' 1948 के लंदन ओलंपिक खेलों में भारतीय टीम द्वारा अंग्रेजों को उन्हीं के मैदान पर पीटने की कहानी है। जब पहली बार अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर तिरंगा फहराया गया। इस हकीकत के सच होने के पीछे कई अफसाने हैं। रीमा ने उन्हीं अफसानों और सपनों को जोड़कर फिल्म रची है। 'गोल्ड' तपन दास (अक्षय कुमार) और 1936 में बर्लिन (जर्मनी) ओलंपिक में  गोल्ड जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के साथ शुरू होती है। जीतते भारतीय हैं और मैदान में झंडा ब्रिटेन का फहराता है। अब सबका सपना है कि जीत पर भारत के ध्वज को सलामी मिले। तपन टीम का जूनियर मैनेजर है। कुछ वर्षों में विश्वयुद्ध छिड़ जाता है। 1940 और 1944 के ओलंपिक रद्द हो जाते हैं। 1946 आते तय होता है कि 1948 में ओलंपिक होंगे और तपन दास फिर से हॉकी एसोसिएशन से जुड़कर टीम बनाने की तैयारी में लग जाता है। जब तक टीम बनती है, तब तक देश का विभाजन हो जाता है और आधे खिलाड़ी पाकिस्तान चले जाते हैं। क्या बेहद कम समय में टीम बन पाएगी और आजाद भारत का स्वर्ण पदक जीतने का सपना पूरा होगा? 'गोल्ड' सपना सच होने की कहानी है। 

मिलाप जवेरी की 'सत्यमेव जयते' भ्रष्टाचार मिटाओ नारे पर केंद्रित है और यहां हीरो के निशाने पर पुलिस फोर्स है। मिलाप ने दो भाई, ईमानदार पुलिस पिता और बेईमान पुलिस अफसरों को मिलाकर कहानी रची। एक जमाने में फिल्म बनाने के लिए इतने सूत्र पर्याप्त होते थे, लेकिन तरक्की करते सिनेमा में यह संभव है। यह ऐसी हिंसा से भरी फिल्म है, जिसका आप समर्थन नहीं कर सकते। कथित हीरो (जॉन अब्राहम) हर कथित मुजरिम को माचिस की तीलियां सुलगाते हुए जिंदा आग के हवाले कर रहा है। वजह है कि भ्रष्टाचार का आरोप लगने पर उसके पिता ने खुद पर कैरोसिन डालकर आग लगा ली थी। यह भी कहा जा सकता है कि यहां दो लाइनों के बाद कहानी नाम की कोई चीज नहीं है। सिर्फ हिंसा की भरमार है। सत्यमेव जयते भले कहे कि सत्य की सदा विजय होती है, लेकिन यह फिल्म सिनेमा की हार का नमूना है।

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