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पढ़िए- क्यों दुनिया के कोने- कोने में जाना जाता है मेरठ, कमाल की है कारीगरी

Fri, 13 Dec 2019 06:08 PM IST
कपिल kapil शालू अग्रवाल, अमर उजाला, मेरठ
शालू अग्रवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Fri, 13 Dec 2019 06:08 PM IST
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Meerut's bat and pink ball are famous all over the world
पिंक गेंद - फोटो : सोशल मीडिया

1980 के बाद क्रिकेट के हर बड़े आयोजन में मेरठ का बल्ला चमका है। डे-नाइट टेस्ट मैच में इस्तेमाल हुई पिंक बॉल भी मेरठ की कंपनी एसजी ने बनाई है। क्रिकेट का बल्ला-गेंद आज मेरठ की पहचान बन चुका है। दुनिया के किसी भी कोने में जब क्रिकेट की चर्चा होती है तो मेरठ का नाम जरूर आता है। अंतरराष्ट्रीय फलक पर जहां क्रिकेट है, वहां मेरठ है। 

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जब देश गोरों की गिरफ्त में था तो 1857 में सदर चौक से भारतीय सिपाहियों ने फिरंगियों के खिलाफ क्रांति की चिंगारी फूंकी। अंग्रेजी हुकूमत को देश से उखाड़ फेंकने का ये आगाज धीरे-धीरे देशभर में फैला। 10 मई 1857 का दिन इतिहास में स्वर्णाक्षर में दर्ज होकर आज भी मेरठ के शौर्य का बखान करता है। दोआबा की इस माटी ने गोरों के गुरूर को बार-बार तोड़ा। 1983 में हुए क्रिकेट विश्वकप में मेरठ के बल्ले ने भारत को जीत दिला इतिहास रचा।
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1947 का आगाज हर बदलाव का साक्षी
दुनिया को बल्ला चलाना विदेशियों ने सिखाया, लेकिन उस बल्ले के हर बदलाव का नेतृत्व मेरठ ने किया। 1931 में सियालकोट में प्रारंभ हुई मशहूर कंपनी एसजी ने 1950 में मेरठ में कारोबार शुरू किया। 1947 के विभाजन में कई खेल उद्यमियों के परिवार और कारीगर औघड़नाथ मंदिर के पास रिफ्यूजी कैंपों में आकर बसे। बाद में रिफ्यूजियों को विक्टोरिया पार्क व सूरजकुंड स्पोर्ट्स कॉलोनी में सरकार ने आवास व यहीं से काम करने की इजाजत दी। सूरजकुंड, विक्टोरिया पार्क से खेल उद्योग की नींव पड़ी जो कालांतर में मवाना, परतापुर, मोहकमपुर, स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स तक फैली। 1958 में पंजाब के सीएम प्रताप सिंह मेरठ आए और यहां से कई उद्यमियों को पैकेज देकर जालंधर ले गए। उन उद्यमियों ने ही जालंधर में सरकारी भूमि, आवास और पूंजी पर खेल उद्योग प्रारंभ किया। जब देश में दिल्ली के सरदार गंडा सिंह की कंपनी ओबेरॉय ब्रदर्स बल्ला बनाती थी, तो वो बल्ला भी मेरठ से बनकर जाता था। आज एसजी, एसएस, एसएफ, भल्ला इंटरनेशनल, एचआरएस, बीडीएम क्रिकेट का सामान बनाने की प्रमुख कंपनियां हैं। इसके अतिरिक्त शहर में प्रीमियम लेगॉर्ड, नेशनल स्पोर्ट्स से लेकर तमाम इकाइयां संचालित हैं। 80 के दशक में बीसीसीआई से मान्यता मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में यहां के गेंद और बल्ले का प्रयोग होने लगा।

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कमाल की कारीगरी 

मेरठी कारीगरों के हाथों के हुनर से ही शहर के खेल उद्योग की सांसें जिंदा हैं। दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां तकनीक से जुड़कर मशीन से बल्ले की छिलाई, गेंद की सिलाई, पीस की कटाई पर आ गईं। लेकिन शहर में आज भी मशीन के बजाय अंगुलियों की कारीगरी को तवज्जो दी जाती है। पूंजी अभाव कहें या उद्यमियों के उसूल मेरठ के खेल उद्यमी आज भी हाथों से लकड़ी की छिलाई, कटाई, रंगाई और फिनिशिंग में यकीन रखते हैं। पुराने कारीगरों ने अपने हुनर से नई पीढ़ी को सींचा। युवा कारीगरों ने भी पूर्वजों की सीख अपनाकर खुद को पुराने गुणों में ढाल लिया।  

पहले 700- 800 ग्राम का बल्ला बनता था। आज 1200 ग्रा. का बल्ला बनता है। इंग्लिश विलो से ज्यादा कश्मीर विलो का बल्ला बनता था। - राकेश महाजन, संचालक बीडीएम इंटरनेशनल

क्रिकेट के बल्ले में पांच दशकों में जो बदलाव आया है, वो मेरठ की देन है। विभाजन से पहले सियालकोट, पंजाब का इलाका खेल उद्योग का हब था। लेकिन आज मेरठ बल्ला हब है। क्रिकेट किट में जो भी बदलाव होता है उसका आगाज मेरठ से होता है। - अनिल सरीन एमडी एसएफ स्पोर्ट्स 

क्रिकेट और मेरठ एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। 1947 के बाद खेल उद्योग की जो शुरुआत मेरठ में हुई वो आज पिंक बॉल के सफर को तय कर चुकी हैं। ये सफर इतना आसान नहीं था, इस दौरान कई उतार चढ़ाव कारोबार में आए। - पारस आनंद, एसजी इंटरनेशनल

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