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आकाश में उड़ेंगे ‘ड्रेगन’ और ‘परी’
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
Updated Fri, 05 Feb 2016 02:15 AM IST
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बसंत महोत्सव में पहली बार आकाश में विशाल आकार की परी, ड्रेगन, स्नेक और सतरंगी पतंगेें दिखाई देंगी। इस तरह की विशाल पतंग पूर्व में अहमदाबाद और जयपुर काइट फेस्टिवल में दिखी गई थीं।
जिमखाना मैदान में पतंगबाजी के शौकीन लोगों को पहली बार एक राष्ट्रीय स्तर का मंच प्राप्त होगा। अमर उजाला के सहयोग से मेरा शहर, मेरी पहल द्वारा 8 से 13 फरवरी तक पतंगबाजी प्रतियोगिता कराई जा रही है।
प्रतियोगिता में शहर के दिग्गज पतंगबाजों के साथ देश के प्रसिद्ध पतंगबाज भी भाग लेकर अपना हुनर दिखाएंगे। प्रतियोगिता में कुल 512 पतंगबाज भाग लेंगे। अमर उजाला में फार्म प्रकाशित होने के बाद पहले ही दिन 80 से अधिक लोगों ने अपनी एंट्री करा ली है।
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प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए और अपनी एंट्री सुनिश्चित करने के लिए अभी दो दिन और शेष हैं। इच्छुक लोग 5 फरवरी और छह फरवरी को दोपहर 12 बजे तक अपने नाम निश्चित स्थानों पर भरकर दे सकते हैं।
आठ से दस तक क्वार्टर फाइनल
8 से 10 फरवरी तक क्वार्टर फाइनल तक के सभी मैच कराए जाएंगे। उसके बाद के फाइनल राउंड 13 फरवरी को कराए जाएंगे, जो 3 पेच के रूप में होंगे।
पतंग और मांझा खुद लाएं
प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रतिभागी को अपने साथ 22 इंच की पतंग, अपना मांझा (चाइनीज मांझा प्रतिबंधित) व डोर स्वयं लाएं। प्रतियोगिता के दौरान निर्णायक का निर्णय ही सर्वमान्य होगा। प्रतियोगिता में सिर्फ मेरठ महानगर का निवासी ही भाग ले सकता है। एक व्यक्ति एक ही बार हिस्सा लेगा।
‘लगातार 24 घंटे उड़ाते थे पतंग’
व्यापारी संदीप मित्तल के अनुसार जब भी पतंग उड़ाते हैं बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। वे बताते है कि बसंत की पूर्व रात्रि से सदर में पतंगबाजी शुरू हो जाती थी। छत में पांच से छह दोस्त एकत्र होते थे। सर्दी से बचने के लिए अंगीठी जलाई जाती थी। पीली पतंग उड़ाते थे। संदीप ने बताया कि बचपन में वह 24 घंटे तक लगातार पतंग उड़ाते थे।
परिवार की बंदिशों के चलते बढ़ा क्रेज
व्यापारी अंकित गुप्ता के अनुसार पतंग उड़ाने को लेकर परिवार में काफी बंदिश थी। क्योंकि कई लोग घायल हो गए थे। परिवार वाले जितना रोकते थे, हम उतनी ही ज्यादा पतंग उड़ाते थे। स्कूल से आते ही बैग एक तरफ रखकर सीधा छत पर पहुंच जाते थे। बसंत के दिन परिवार की तरफ से पतंग उड़ाने के लिए पूरी छूट मिलती थी।
चुनिंदा दुकानों पर मिलती थीं पतंग
व्यापारी कमल कुमार गोयल के अनुसार शहर में खैरनगर और गोला कुंआ के बाद सदर में एक सिर्फ एक बड़ी दुकान थी जहां अच्छी पतंग मिलती थीं। पाकेट मनी बचाकर बसंत के लिए पैसा एकत्र करते थे। एक-एक पतंग को छांट कर खरीदते थे और रात को पतंग के कन्ने बांधकर उड़ाने की तैयारी की जाती थी। पीली पतंग से पतंगबाजी की शुरुआत की जाती थी।
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जिमखाना मैदान में पतंगबाजी के शौकीन लोगों को पहली बार एक राष्ट्रीय स्तर का मंच प्राप्त होगा। अमर उजाला के सहयोग से मेरा शहर, मेरी पहल द्वारा 8 से 13 फरवरी तक पतंगबाजी प्रतियोगिता कराई जा रही है।
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प्रतियोगिता में शहर के दिग्गज पतंगबाजों के साथ देश के प्रसिद्ध पतंगबाज भी भाग लेकर अपना हुनर दिखाएंगे। प्रतियोगिता में कुल 512 पतंगबाज भाग लेंगे। अमर उजाला में फार्म प्रकाशित होने के बाद पहले ही दिन 80 से अधिक लोगों ने अपनी एंट्री करा ली है।
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प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए और अपनी एंट्री सुनिश्चित करने के लिए अभी दो दिन और शेष हैं। इच्छुक लोग 5 फरवरी और छह फरवरी को दोपहर 12 बजे तक अपने नाम निश्चित स्थानों पर भरकर दे सकते हैं।
आठ से दस तक क्वार्टर फाइनल
8 से 10 फरवरी तक क्वार्टर फाइनल तक के सभी मैच कराए जाएंगे। उसके बाद के फाइनल राउंड 13 फरवरी को कराए जाएंगे, जो 3 पेच के रूप में होंगे।
पतंग और मांझा खुद लाएं
प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रतिभागी को अपने साथ 22 इंच की पतंग, अपना मांझा (चाइनीज मांझा प्रतिबंधित) व डोर स्वयं लाएं। प्रतियोगिता के दौरान निर्णायक का निर्णय ही सर्वमान्य होगा। प्रतियोगिता में सिर्फ मेरठ महानगर का निवासी ही भाग ले सकता है। एक व्यक्ति एक ही बार हिस्सा लेगा।
‘लगातार 24 घंटे उड़ाते थे पतंग’
व्यापारी संदीप मित्तल के अनुसार जब भी पतंग उड़ाते हैं बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। वे बताते है कि बसंत की पूर्व रात्रि से सदर में पतंगबाजी शुरू हो जाती थी। छत में पांच से छह दोस्त एकत्र होते थे। सर्दी से बचने के लिए अंगीठी जलाई जाती थी। पीली पतंग उड़ाते थे। संदीप ने बताया कि बचपन में वह 24 घंटे तक लगातार पतंग उड़ाते थे।
परिवार की बंदिशों के चलते बढ़ा क्रेज
व्यापारी अंकित गुप्ता के अनुसार पतंग उड़ाने को लेकर परिवार में काफी बंदिश थी। क्योंकि कई लोग घायल हो गए थे। परिवार वाले जितना रोकते थे, हम उतनी ही ज्यादा पतंग उड़ाते थे। स्कूल से आते ही बैग एक तरफ रखकर सीधा छत पर पहुंच जाते थे। बसंत के दिन परिवार की तरफ से पतंग उड़ाने के लिए पूरी छूट मिलती थी।
चुनिंदा दुकानों पर मिलती थीं पतंग
व्यापारी कमल कुमार गोयल के अनुसार शहर में खैरनगर और गोला कुंआ के बाद सदर में एक सिर्फ एक बड़ी दुकान थी जहां अच्छी पतंग मिलती थीं। पाकेट मनी बचाकर बसंत के लिए पैसा एकत्र करते थे। एक-एक पतंग को छांट कर खरीदते थे और रात को पतंग के कन्ने बांधकर उड़ाने की तैयारी की जाती थी। पीली पतंग से पतंगबाजी की शुरुआत की जाती थी।