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चीख-पुकार और लाशों की लंबी कतारें, 1987 के मेरठ दंगों के दौरान मसीहा बन गईं थीं मेडिकल की नर्सें
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
Updated Sun, 04 Nov 2018 02:07 PM IST
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मेरठ न्यूज
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‘सब लोग घृणा कर सकते हैं, पर हम कैसे आंखें फेर सकते हैं अगर हम ही सांप्रदायिक हो गए तो इंसानियत ही मर जाएगी।’ यह कहना था उन नर्सों का, जो मेडिकल कॉलेज में रात भर जागकर घायलों की सेवा कर रही थीं। वर्ष 1987 में मेरठ में दंगे भड़के हुए थे। सारे शहर में हाल बुरा था। कभी किसी मुहल्ले में पथराव, गोलीबारी तो कभी किसी में।
रोज काफी लोग घायल हो रहे थे। एक तरह से मेरठ इस समय रक्त रंजित था। आलम यह था कि मेडिकल कालेज चीख-पुकार और रुदन का केंद्र बना हुआ था। जहां मोर्चरी पर लाशें पोस्टमार्टम के लिए आ रही थीं तो वहीं मेडिकल कालेज की इमरजेंसी में घायलाें की लाइन लगी थी। ऐसे समय में उन नर्सों की कर्तव्य परायणता एक मिसाल बन गई थी। जब शहर मजहबी उन्माद में डूबा, तब ये नर्सें मानवता की प्रतिमूर्ति बनी हुई थीं।
मेडिकल कॉलेज में सेवा करने वाली नर्सें दोनों ही संप्रदायों के आहतों की देखभाल कर रही थीं। उनके लिए न कोई हिंदू था न मुस्लिम। सभी को बराबर और तत्काल उपचार दिया जा रहा था। पूरा मेडिकल कॉलेज एक ऐसा देवालय हो गया था, जहां हर किसी की सेवा हो रही थी। संप्रदायवाद नहीं, वहां मानवतावाद का नजारा था।
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घायल सिर्फ घायल थे। किसी जाति संप्रदाय से मानो उनका कोई नाता न था। घायलों के उपचार में लगी तृतीय वर्ष की छात्रा ने उस समय उद्गार व्यक्त किया था कि उस दिन तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि किसकी दशा गंभीर मानें, किस की नहीं। आग में झुलसे और खून में लथपथ घायल पड़े थे। हर कोई जिंदगी की अंतिम सांस गिनते-गिनते यही कह रहा था कि ‘हमें बचा लो।’
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रोज काफी लोग घायल हो रहे थे। एक तरह से मेरठ इस समय रक्त रंजित था। आलम यह था कि मेडिकल कालेज चीख-पुकार और रुदन का केंद्र बना हुआ था। जहां मोर्चरी पर लाशें पोस्टमार्टम के लिए आ रही थीं तो वहीं मेडिकल कालेज की इमरजेंसी में घायलाें की लाइन लगी थी। ऐसे समय में उन नर्सों की कर्तव्य परायणता एक मिसाल बन गई थी। जब शहर मजहबी उन्माद में डूबा, तब ये नर्सें मानवता की प्रतिमूर्ति बनी हुई थीं।
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मेडिकल कॉलेज में सेवा करने वाली नर्सें दोनों ही संप्रदायों के आहतों की देखभाल कर रही थीं। उनके लिए न कोई हिंदू था न मुस्लिम। सभी को बराबर और तत्काल उपचार दिया जा रहा था। पूरा मेडिकल कॉलेज एक ऐसा देवालय हो गया था, जहां हर किसी की सेवा हो रही थी। संप्रदायवाद नहीं, वहां मानवतावाद का नजारा था।
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घायल सिर्फ घायल थे। किसी जाति संप्रदाय से मानो उनका कोई नाता न था। घायलों के उपचार में लगी तृतीय वर्ष की छात्रा ने उस समय उद्गार व्यक्त किया था कि उस दिन तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि किसकी दशा गंभीर मानें, किस की नहीं। आग में झुलसे और खून में लथपथ घायल पड़े थे। हर कोई जिंदगी की अंतिम सांस गिनते-गिनते यही कह रहा था कि ‘हमें बचा लो।’
एक नर्स के अनुसार पिछले सात दिनों में दंगे का जो दृश्य देखा उससे हम भी दहशत में आ गए। मेडिकल कालेज में बम फेंके जाने के बाद से तो ज्यादा ही असुरक्षा की भावना व्याप्त हो गई थी। पर, अब सब कुछ ठीक हो गया है। न डर है और न दहशत।
नर्स ने कहा कि हमारा तो काम ही है रोगियों की सेवा करना है। सब हिंदू-मुसलमान हो सकते हैं लेकिन हम नहीं हो सकते। अगर हम ही गलत कदम पर चल पड़े तो अस्पतालों से ही लोगों का विश्वास उठ जाएगा। कौन आएगा फिर यहां इलाज कराने?
इनका कहना था कि दंगे के बाद से यहां घायलों, लाशों से लदे ट्रक के ट्रक आ रहे हैं। जब ड्यूटी पोस्टमार्टम गृह के पास होती है तो वहां तो खड़ा भी नहीं हुआ जाता। खून खराबा देखकर आंखें भर आती। पर इससे होता क्या है? हमारा तो काम ही यह है। सब को देखो और इलाज करो। दंगे के बाद से वे पंद्रह-पंद्रह घंटे ड्यूटी दे रही थी। न उन्हें खाने का ही समय मिल पा रहा था और न सोने का ही।
मेडिकल कालेज में उस वक्त प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष की 60 सिस्टर, 180 छात्र-छात्राएं, 80 स्टाफ नर्स, 5 असिस्टेंट मैटरन, 1 मैटरन, एक चीफ मैटरन, 30 सुपरवाइजर और 12 ट्यूटर लगाई गई थीं। दंगे के चक्कर में इन सभी का हाल बेहाल हो गया। चीख-चिल्लाहट और रुदन भरे माहौल के बीच ये अपना फर्ज निभा रहे थे।
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नर्स ने कहा कि हमारा तो काम ही है रोगियों की सेवा करना है। सब हिंदू-मुसलमान हो सकते हैं लेकिन हम नहीं हो सकते। अगर हम ही गलत कदम पर चल पड़े तो अस्पतालों से ही लोगों का विश्वास उठ जाएगा। कौन आएगा फिर यहां इलाज कराने?
इनका कहना था कि दंगे के बाद से यहां घायलों, लाशों से लदे ट्रक के ट्रक आ रहे हैं। जब ड्यूटी पोस्टमार्टम गृह के पास होती है तो वहां तो खड़ा भी नहीं हुआ जाता। खून खराबा देखकर आंखें भर आती। पर इससे होता क्या है? हमारा तो काम ही यह है। सब को देखो और इलाज करो। दंगे के बाद से वे पंद्रह-पंद्रह घंटे ड्यूटी दे रही थी। न उन्हें खाने का ही समय मिल पा रहा था और न सोने का ही।
मेडिकल कालेज में उस वक्त प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष की 60 सिस्टर, 180 छात्र-छात्राएं, 80 स्टाफ नर्स, 5 असिस्टेंट मैटरन, 1 मैटरन, एक चीफ मैटरन, 30 सुपरवाइजर और 12 ट्यूटर लगाई गई थीं। दंगे के चक्कर में इन सभी का हाल बेहाल हो गया। चीख-चिल्लाहट और रुदन भरे माहौल के बीच ये अपना फर्ज निभा रहे थे।
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