पश्चिम में चाल बदलता रहा हाथी: 2019 में बसपा के दलित वोट बैंक से कई सीटें हुईं प्रभावित, इस बार बड़ी चुनौती
बसपा ने चुनाव चिन्ह हाथी की तर्ज पर अपने सियासी सफर में कभी धीमी तो कभी तेज चाल चली। मायवती के मुख्यमंत्री बनते ही राजनीति के अध्याय में नया पन्ना जुड़ गया। कभी BSP की लहर भी रही लेकिन पिछले चुनाव में हाथी की चाल धीमी हो गई। आलम है कि इस बार चुनाव मैदान में बसपा अकेले खड़ी नजर आ रही है।
विस्तार
अनुसूचित जाति के मतदाताओं को लामबंद कर चार दशक में बसपा ने सियासत शुरू की। चुनाव चिन्ह हाथी की तर्ज पर बसपा अपनी चाल चलती रही। जब मौका देखा दीगर दलों से दोस्ती कर ली। अपने मन मुताबिक तोड़ भी दी। साल 1995 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो राजनीति के अध्याय में नया पन्ना जुड़ गया। किस्से-कहानियां बनते रहे।
वर्ष 2007 की लहर भी चली और फिर थम भी गई। इस बार लोकसभा चुनाव में बसपा अकेले ही मैदान में खड़ी है। नई खबर यह कि अब मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को प्रचार के मैदान में उतारा है। पहले चरण के चुनाव वाली पश्चिम की सीटों का हाल देखें तो 2019 में सहारनपुर, बिजनौर और नगीना में बसपा ने जीत दर्ज की थी। चुनाव डेस्क की रिपोर्ट...
मुजफ्फरनगर: जीते एक बार, असर दिखा हर बार
लोकसभा चुनाव में बसपा ने एक बार जीत दर्ज की है। वर्ष 2009 में बसपा के टिकट पर कादिर राना ने भाजपा-रालोद गठबंधन की प्रत्याशी अनुराधा चौधरी को हराकर जीत दर्ज की थी।
कादिर राना को 275318 लाख और अनुराधा चौधरी को 254720 लाख वोट मिले थे। इस चुनाव में सपा के संगीत सोम को 106667 और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े हरेंद्र मलिक को 73848 वोट मिले थे।
वर्ष 2014 में भी कादिर राना ने ही बसपा से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के डॉ. संजीव बालियान ने उन्हें हरा दिया था। वर्ष 2019 में बसपा ने प्रत्याशी हीं उतारा था।
इससे पहले के चुनाव देखें तो वर्ष 2004 में बसपा के सूरत सिंह वर्मा को 182290 लाख, वर्ष 1999 में राजपाल सैनी को 163721, वर्ष 1998 में ताराचंद शास्त्री को 134718, वर्ष 1996 में ताराचंद शास्त्री को ही 114413 लाख वोट मिले थे। नतीजों पर हर बार बसपा का असर दिखा है। इस बार भी मैदान में ताल ठोके हुए है।
कैराना: एक बार जीता किला, मायावती भी लड़ीं
साल 1984 में बसपा सुप्रीमो ने कैराना लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। वर्ष 2019 के चुनाव में कैराना लोकसभा सीट से बसपा का कोई प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं उतरा। जबकि 2014 के चुनाव में कंवर हसन ने 160414 मत प्राप्त किए थे, जबकि भाजपा के हुकुम सिंह को 565909 वोट मिले थे।
कैराना सीट पर बसपा ने वर्ष 2009 में जीत दर्ज की थी, तबस्सुम हसन 283259 मत प्राप्त कर सांसद चुनी गई थीं। इससे पहले 2004 में बसपा के टिकट पर शाहनवाज को 181509 वोट मिले थे। 1999 में रामकिशन कश्यप को 158341 वोट मिले और 1998 में सुधीर कुमार गोयल सिर्फ 62038 वोट हासिल कर सके थे। इस बार भी बसपा सियासी रण में है।
सहारनपुर: तीन बार हाथी की चिंघाड़
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा के जगदीश राणा तीसरे स्थान पर रहे थे। उन्हें 235033 वोट मिले थे। भाजपा के राघव लखनपाल ने 472999 वोट लेकर जीत हासिल की। वर्ष 2019 में बसपा से सांसद फजलुर्रहमान जीते थे। उन्हें 514139 वोट मिले थे। दूसरे स्थान पर रहे भाजपा के राघव लखनपाल ने 491722 मत प्राप्त किए।
बसपा के अब तक तीन सांसद रहे। लोकसभा के 1999 में हुुए चुनाव में मंसूर अली खान, 2009 में जगदीश राणा और 2019 के चुनाव में फजलुर्रहमान ने जीत हासिल की।
पिछले पांच वर्षों में चार बार विधायक रहे जगपाल सिंह, पूर्व विधायक मनोज चौधरी, पूर्व विधायक महीपाल सिंह ने बसपा छोड़ दी। पूर्व विधायक इमरान मसूद ने भी कुछ समय के लिए बसपा में रहे। इस लोकसभा चुनाव में मुस्लिम को प्रत्याशी बनाया गया है।
अनुसूचित जाति का वोट बैंक
पश्चिम के विभिन्न जिलों में अनुसूचित जाति का बड़ा वोट बैंक है। मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर करीब दो लाख अनुसूचित जाति के मतदाता हैं। यही नहीं सहारनपुर में तीस, कैराना में बीस और बागपत 18 और मेरठ लोकसभा सीट पर 14 फीसदी मतदाता हैं।
वर्ष 2014 और 2019 में मेरठ लोकसभा सीट पर बसपा प्रत्याशियों का अच्छा खासा प्रभाव रहा है। 2019 में बसपा प्रत्याशी रहे हाजी याकूब कुरैशी को 581455 लाख वोट मिले थे। वर्ष 2004 में शाहिद अखलाक बसपा से सांसद चुने गए थे। वर्ष 2009 में मलूक नागर दूसरे स्थान पर रहे थे।
मेरठ लोकसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 6 लाख, दलित मतदाताओं की संख्या भी लगभग 3 लाख होने का अनुमान है। इस बार बहुजन समाज पार्टी ने त्यागी समाज से प्रत्याशी बनाया है।
जाहिर है कि मौके के हिसाब से बहुजन समाज पार्टी के वोट बैंक के साथ मुस्लिम मतदाता चलते रहे हैं। इस बार भी चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का रुख ही बसपा का भविष्य तय करेगा।
बागपत: कभी नहीं खुला खाता
लोकसभा सीट से वर्ष 2014 में बसपा से प्रशांत चौधरी मैदान में उतरे थे, जिनको 1,41,743 वोट लेकर चौथे स्थान पर रहे थे। इस चुनाव में भाजपा के डाॅ. सत्यपाल सिंह ने 4,23,475 वोट लेकर जीत दर्ज की थी। वर्ष 2019 में भाजपा के डाॅ. सत्यपाल सिंह 5,25,789 वोट लेकर सांसद चुने गए थे। बसपा ने यहां उम्मीदवार नहीं उतारा था।
बसपा का बागपत से अभी तक कोई सांसद नहीं बन सका है। बसपा के पूर्व विधायक लोकेश दीक्षित, पूर्व विधायक हेमलता चौधरी, पूर्व एमएलसी प्रशांत चौधरी पार्टी छोडक़र भाजपा में गए हैं। बसपा ने इस बार चुनाव में गुर्जर बिरादरी का प्रत्याशी मैदान में उतारा है।
बिजनौर में किला किया फतह
बिजनौर लोकसभा सीट पर बसपा ने पहली बार 1989 के चुनाव में जीत दर्ज कराई थी, उस वक्त मायावती सांसद बनीं। इसके बाद बिजनौर सीट पर तीस सालों के बाद साल 2019 में बसपा का सूखा खत्म हुआ और मलूक नागर सांसद चुने गए। हालांकि साल 2014 के चुनाव में बसपा के मलूक नागर 230124 मत लेकर तीसरे स्थान पर रहे थे।
बसपा के हिस्से में आया नगीना
साल 2009 में नगीना लोकसभा सीट अस्तित्व में आई। साल 2019 में बसपा के गिरीश चंद 568378 वोट लेकर संसद पहुंचे जबकि भाजपा के यशवंत सिंह 401546 वोट लेकर दूसरे नंबर पर रहे थे। साल 2014 में बसपा के गिरीशचंद नगीना सीट पर तीसरे स्थान पर रहे थे।