शासनादेश की अनदेखी: जघन्य अपराधों में इस्तेमाल हो रहे लाइसेंसी हथियार, आंख मूंदकर मुहर लगा देती है खाकी
- - हथियारों में पिस्टल, रिवाल्वर, राइफल और बंदूकें
- - अपराधियों के लाइसेंस पर थानेदार लगा देते हैं मुहर
- - डीएम के अधीन असलाह विभाग भी जिम्मेदार
- - शासनादेश की अनदेखी, नहीं होता निरस्तीकरण
- -161 लाइसेंसी हथियार हैं अपराधियों के पास
- -03 साल में होता है लाइसेंसों का नवीनीकरण
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विस्तार
सामान्य आदमी जान का खतरा होने और परिवार की सुरक्षा के लिए कड़ी मशक्कत के बावजूद भले ही शस्त्र लाइसेंस लेने में कामयाब न होता हो। लेकिन जिले में करीब 161 अपराधियों के पास पिस्टल, रिवाल्वर, बंदूक और राइफल जैसे हथियारों के लाइसेंस हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि हर तीन साल में लाइसेंसों का नवीनीकरण होता है। लेकिन थानेदार गंभीरता से सत्यापन न कर अपराधियों के लाइसेंस पर आंख मूंदकर मुहर लगा देते हैं। इसमें डीएम के अधीन असलाह विभाग भी कम जिम्मेदार नहीं है। शासनादेश की अनदेखी से अपराधियों को जारी लाइसेंस निरस्त नहीं होता और ऐसे लाइसेंसी हथियार जघन्य अपराधों में इस्तेमाल हो रहे हैं।
एनकाउंटर में मारे गए कानपुर के हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के पास दो शस्त्र लाइसेंस थे। पोल खुल जाने पर पर मुख्यमंत्री ने पुलिस-प्रशासन पर गहरी नाराजगी जताई। उसके बाद प्रदेश के सभी जिलों में अपराधियों के खिलाफ अभियान शुरू कराया गया।
मेरठ जिले में टॉप-10 अपराधियों में शामिल योगेश भदौड़ा और उधम सिंह के घर दबिश में अवैध हथियारों का जखीरा मिला। साथ ही सभी अपराधियों का सत्यापन शुरू कराया गया तो चौंकाने वाली बात सामने आई कि जिले में 161 अपराधियों के पास पिस्टल-रिवाल्वर, बंदूक और राइफल के लाइसेंस हैं। जबकि इन अपराधियों के खिलाफ संगीन धाराओं में मुकदमे दर्ज हैं।
धूल फांकती हैं इनकी फाइल
जान का खतरा और बदमाशों से खौफ के चलते जिले में हजारों लोगों ने शस्त्र लाइसेंस लेने के लिए आवेदन किया हुआ है। लेकिन इनकी फाइलें थानों में या फिर कलक्ट्रेट स्थित असलाह विभाग में धूल फांक रही हैं। उनके आवेदनों पर सुनवाई करने वाला कोई नहीं हैं।
शस्त्र लाइसेंस लेकर चलते हैं अपराधी
मुकदमा दर्ज होने के बाद भी अपराधियों के पास शस्त्र लाइसेंस की कोई कमी नहीं है। वह आम लोगों को रौब दिखाने के लिए लाइसेंसी शस्त्र साथ लेकर चलते हैं। पुलिस-प्रशासन इस बात की जानकारी होने के बावजूद भी खामोश है। इन लोगों का थानों और सरकारी विभागों में में भी बोलबाला है। एडीजी और आईजी के निर्देश पर अभियान शुरू किया, जिसके बाद इन लाइसेंस धारकों की पोल खुली।
थानों में करा लेते सत्यापन
शस्त्र लाइसेंस धारकों को हर तीसरे साल सत्यापन और नवीनीकरण कराना होता है। लेकिन शस्त्र लाइसेंस धारक अपराधी है और उसके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज हैं तो वह कैसे सत्यापन में पकड़ में नहीं आता। रिपोर्ट दर्ज होने के बावजूद भी थाना पुलिस कैसे अपराधियों के शस्त्र लाइसेंस के नवीनीकरण पर मुहर लगा देती है। इसकी भी गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
शस्त्र लाइसेंस निरस्तीकरण की रिपोर्ट भेजी
सत्यापन के बाद अपराधियों के शस्त्र लाइसेंस निरस्त कराने के लिए थाना पुलिस ने जहां जिला प्रशासन को रिपोर्ट भेजी। वहीं, लाइसेंस धारकों को नोटिस भी भेजा कि वह अपने शस्त्र को थाने में जमा कराएं। लेकिन इसमें गंभीरता न बरतने पर सवाल उठते हैं कि पुलिस अपराधियों के शस्त्र लाइसेंसों के प्रति गंभीर क्यों नहीं है।
अपराधियों के पास नहीं रहेगा शस्त्र लाइसेंस
मेरठ समेत जोन के सभी जिलों में अपराधियों के खिलाफ अभियान चल रहा है। कितने अपराधियों के पास शस्त्र लाइसेंस हैं, इसका भी सत्यापन कराया गया, जिसमें अपराधियों के शस्त्र लाइसेंस निरस्त करने के लिए प्रशासन को चिट्ठी लिखी गई। अपराधियों के पास शस्त्र लाइसेंस नहीं रहेगा। - राजीव सभरवाल, एडीजी जोन
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