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कार्बेट टाइगर रिजर्व में बढ़ी लैंटाना घास, बाघ के भोजन पर संकट

Wed, 29 Jul 2020 12:27 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 29 Jul 2020 12:27 AM IST
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Lantana grass increases in Corbett Tiger Reserve; Crisis on tiger food also
06ड्ड कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ क्षेत्र में फैली लैंटाना व गाजर घास - फोटो : DHAMPUR
कार्बेट टाइगर रिजर्व में बढ़ी लैंटाना घास, बाघ के भोजन पर भी संकट
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कालागढ़ (बिजनौर)। कार्बेट टाइगर रिजर्व/नेशनल पार्क के वनों में लैंटाना और गाजर घास तेजी से बढ़ रही है। यह घास सामान्य घास को नष्ट कर देती है, जिससे शाकाहारी जानवरों हिरन, बारहसिंघा आदि के लिए चारे का संकट हो जाता है। शाकाहारी पशुओं की संख्या कम होने से बाघ के सामने भी भोजन का संकट मंडरा रहा है।
कार्बेट टाइगर रिजर्व/नेशनल पार्क में लैंटाना और गाजर घास का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। लगभग 45-55 प्रतिशत वन क्षेत्र में लैंटाना फैल चुकी है। पारथेनियम जिसे गाजर घास भी कहते हैं, वनों में दिखाई दे रही है। पूर्व डीएफओ नरेन्द्र सिंह का कहना है कि लगभग 12 साल पहले ही उन्होंने वन विभाग को चेता दिया था कि दोनों ही खरपतवारों का दायरा बढ़ रहा है। इसका वन्यजीवों पर भी प्रभाव पड़ेगा। लैटाना और गाजर घास सामान्य घास को नष्ट कर देते हैं, जिससे हरे चारे का अभाव हो जाता है। ऐसे में शाकाहारी जानवरों को चारा नहीं मिलेगा और उनकी कमी हो जाएगी। फिर बाघों के लिए भी भोजन की कमी होगी और वे आबादी की ओर जाएंगे।
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कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक राहुल का कहना है कि टाइगर रिजर्व में 17 प्रतिशत भूमि पर घास के मैदान हैं। इनमें लगभग 20 25-प्रतिशत में लैंटाना फैल चुकी है। इसके खत्म करने के लिए कार्यक्रम चला रहे हैं। वहीं कालागढ़ के वन क्षेत्राधिकारी आरके भट्ट का कहना है कि लैंटाना को हटाया जा रहा है।
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कार्बेट में 250 बाघ होने का दावा
निदेशक राहुल का कहना है कि 1973 में कार्बेट नेशनल पार्क में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर बाघों को यहां छोड़ा गया था। अब 2020 में यहां करीब 250 बाघ होने का दावा है। पूर्व में हुई गणना में यह संख्या 215 थी।

मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने को प्रभावी कदम नहीं
क्षेत्र के ग्रामीण विनोद काला, विक्रम सिंह, महाराज सिंह, मलकीत सिंह आदि का कहना है कि बाघ के बढ़ने के कारण कार्बेट टाइगर रिजर्व के वनों से हिरन, बारहसिंगा, सेही, सांभर आदि खेतों में आ रहे हैं। उनके पीछे बाघ, गुलदार आदि गांवों में आ जाते हैं और इंसानों पर हमला कर देते हैं। इनके आबादी में प्रवेश को रोकने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। वन कर्मी सीमा पर गश्त तक नहीं करते हैं। वहीं, कालागढ़ के वन क्षेत्राधिकारी आरके भट्ट का कहना है कि मानव और वन्यजीवों में संघर्ष रोकने की दिशा में काम किया जा रहा है। लगातार गोष्ठी कर लोगों को जागरूक किया जा रहा है।
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