किठौर। नंगली किठौर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन परीक्षित मोक्ष तथा श्री शुकदेव व राजा परीक्षित के वाद की कथा का वर्णन किया गया। कथावाचक श्यामा शास्त्री ने बताया कि मरण नहीं, मोक्ष है। राजा परीक्षित ने जब मृत्यु का समय निकट देखा तो उन्होंने अपनी सारी मोह माया को त्यागकर भगवान श्री शुकदेव से श्रीमद्भागवत कथा श्रवण किया।सातवें दिन जब कथा पूर्ण हुई तब भगवान के नाम, रूप, लीलाओं और गुणों का स्मरण करते हुए राजा परीक्षित ने तक्षक नाग के विष को सहजता से स्वीकार किया। जो व्यक्ति मृत्यु से नहीं डरता और प्रभु में लीन हो जाता है, वह वास्तव में मोक्ष को प्राप्त करता है। भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप और विरह लीला कथा के इस भाग में भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा गमन, द्वारका स्थापना और अंत में विरह का वर्णन आता है।
यहां भक्तों के हृदय में वियोग और समर्पण की भावना जागती है। भक्ति में वियोग भी उतना ही पवित्र है जितना संयोग। जहां प्रेम की गहराई होती है, वहां मिलन और विरह दोनों में ईश्वर का अनुभव होता है। जब भगवान श्रीकृष्ण का पृथ्वी पर कार्य पूर्ण हुआ तो उन्होंने द्वारका में अपनी लीलाएं समाप्त कीं और अपने स्वधाम (गोलोक) को प्रस्थान किया। उन्होंने बताया कि ईश्वर का अवतार केवल धर्म की स्थापना और भक्तों की रक्षा के लिए होता है। भगवान कभी नष्ट नहीं होते, वह केवल अदृश्य होते हैं। उनका नाम, रूप और कथा ही सच्चा ईश्वर-रूप है, जो सदा विद्यमान रहता है। भक्ति ही परम साधन है। इस भागवत कथा का श्रवण और कीर्तन करने वाला भक्त जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त करता है। इस मौके पर भाजपा के पूर्व महानगर अध्यक्ष भाजपा मुकेश सिंघल, भाजपा नेता बलराज डूंगर, मनोज पंवार, रिंकू विकल, राहुल राणा, अरविद चंदेल, ब्रह्मपाल, वीरपाल चंदेल आदि मौजूद रहे।