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ये हैं कारगिल जंग के 6 हीरो... जिन्होंने देश पर कुर्बान की जिंदगी, हर किसी की अलग कहानी

Fri, 27 Jul 2018 12:09 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Updated Fri, 27 Jul 2018 12:09 PM IST
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Kargil Vijay Diwas: the story of six martyr warriors of Muzaffarnagar
फाइल फोटो

भारतवासियों के लिए 26 जुलाई का दिन बड़ा गौरवशाली है। सन 1999 में आज ही के दिन योद्धाओं ने दुश्मनों को ढेर कर कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। इसलिए आज के दिन को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज हम आपको उन छह योद्धाओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था। हर किसी की अपनी अलग कहानी... किसी ने बेटी का मुंह तक नहीं देखा तो किसी ने...

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Kargil Vijay Diwas: the story of six martyr warriors of Muzaffarnagar
अमरेश पाल

बेलड़ा गांव निवासी अमरेश पाल ने 28 जून 1999 को कारगिल की पहाड़ियों पर दुश्मनों से लड़ते हुए वीरगति पाई थी। अमरेश पाल के शहीद होने के बाद पूरा परिवार मुजफ्फरनगर में रहने लगा था। शहीद अमरेश पाल के दो बच्चे हैं। बड़ा बेटा बंटी बीएससी और छोटी बेटी ज्योति ने कक्षा 12 पास की है। शहीद अमरेश पाल जिस दिन ड्यूटी पर लौट रहा था, उसी दिन बेटी ज्योति का जन्म हुआ, जो बेटी का मुख नहीं देख पाया। अमरेश पाल की पत्नी उमाकांता जानसठ स्थित गैस एजेंसी का कार्य देखती हैं। पिता फूलसिंह और माता अतरकली भी पुत्रवधू के साथ रहते हैं।

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Kargil Vijay Diwas: the story of six martyr warriors of Muzaffarnagar
लांसनायक बचन सिंह

पचेंडा कलां निवासी लांसनायक बचन सिंह ने 12 जून 1999 को कारगिल युद्ध में बेटले ऑफ तोलोलिंग चोटी पर देश की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी थी। शहीद की पत्नी कामेशबाला ने बेटे हितेश को लेफ्टिनेंट बनाकर कारगिल शहीद पति को सच्ची श्रद्धांजलि दी है। शहीद बचन सिंह की शहादत के वक्त उसके जुड़वा बेटों हितेश और हेमंत की उम्र साढ़े पांच साल थी। लेफ्टिनेंट बना बेटा हितेश उसी राजपूताना रायफल्स में कमांडिंग अफसर बने हैं, जिस बटालियन में उनके पिता लांसनायक थे। हितेश ने आठ जून को ही आईएमए देहरादून की पासिंग आउट परेड पास की थी। उसकी पोस्टिंग जयपुर में हुई है। कामेशबाला ने दूसरे बेटे हेमंत को भी देश की सेवा के लिए सेना में भर्ती करने का मन बना रखा है, जो दिल्ली में सीडीएफ की तैयारी कर रहा है। कामेशबाला कहती हैं कि पति की शहादत के बाद सरकार की घोषणाओं में अभी एक घोषणा अधूरी है। शहर से पचेंडा कलां तक आने वाले मार्ग का नाम उनके पति शहीद बचन सिंह के नाम पर आज तक नहीं रखा गया है।

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Kargil Vijay Diwas: the story of six martyr warriors of Muzaffarnagar
सतीश कुमार

कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हुए फुलत के सतीश कुमार के नाम से गंगनहर के पास शहीद के नाम से मुख्य द्वार और गांव फुलत का नाम भी बदलकर शहीद के नाम पर नहीं रखा गया है। इतना ही नहीं शहीद के नाम से कक्षा 8 तक स्कूल बनवाने की घोषणा कर दी गई थी, लेकिन यह घोषणा भी हवा हवाई ही साबित हुई है। सैनिक परिवार को अब तक की सरकारों का रवैया ठीक नहीं होने की टीस है। सतीश कुमार 26 जुलाई 1999 में देश की रक्षा करते हुए कारगिल युद्ध में शहीद हुआ था। सतीश कुमार 238 इंजीनियर रेजीमेंट में था। उनके पिता धर्मपाल कहते हैं कि सतीश की शहादत पर पूरे गांव को फक्र है। परिवार को उसकी कमी हमेशा खलेगी, लेकिन सरकारों का सैनिक परिवारों के प्रति रवैया ठीक नहीं होने की परिवार को आज बेहद टीस है। शहीद की पत्नी बिमलेश फिलहाल मेरठ के कंकरखेड़ा में रामनगर में अपने दो बेटी रुपाली व झलक और पुत्र अतुल के साथ रहती हैं। बिमलेश ने बताया कि उसके शहीद पति सतीश के नाम से गांव में कक्षा 8 तक स्कूल बनाने की घोषणा की गई थी। उनका कहना है कि अभी तक स्कूल की जमीन में उसके शहीद पति का नाम तक नहीं चढ़ सका है। वे कई बार तहसील में अधिकारियों के यहां भी चक्कर लगा चुकी हैं। अधिकारी भी संतोषजनक जवाब नहीं देते हैं। बिमलेश का आरोप है कि पति की समाधि स्थल पर भी अवैध कब्जा कर लिया गया है।

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रिजवान त्यागी

बुढ़ाना में विज्ञाना गांव के किसान अब्दुल खालिक का बेटा रिजवान त्यागी वर्ष 1990 में देश की सेवा करने के लिए सेना में भर्ती हुआ था। रिजवान त्यागी की माता नूरजहां ने अपने लाल को खुशी- खुशी देश की सेवा के लिए भेज दिया था। रिजवान त्यागी के माता पिता ने उसकी शादी शबनम बानो के साथ कर दी थी। बेटी के रूप में रिजवान त्यागी के घर में हिना रिजवान आ गई। रिजवान त्यागी की पोस्टिंग कारगिल क्षेत्र के खालूबार शिखर हुई थी। दुश्मन के साथ लोहा लेते हुए 3 जुलाई 1999 को ऑपरेशन विजय के दौरान दुश्मन के छक्के छुड़ाता हुआ रिजवान शहीद हो गया था। पत्नी शबनम बानो का कहना है कि उन्हें सरकार, शासन व प्रशासन से कोई शिकायत नहीं है। उसकी बेटी हिना रिजवान ने बीए की पढ़ाई पूरी कर ली है। उनके परिवार में केवल उनके पति रिजवान त्यागी की कमी हमेशा खलती रहेगी।

Kargil Vijay Diwas: the story of six martyr warriors of Muzaffarnagar
नरेंद्र राठी

शहीद नरेंद्र राठी के बच्चे हुए कामयाब 
बुढ़ाना में गांव इटावा निवासी ताल सिंह का बेटा नरेंद्र राठी देश की सेवा करने के लिए वर्ष 1987 में मेरठ में भर्ती हुआ था। नरेंद्र राठी की माता चंदन कौर ने अपने कलेजे के टुकड़े को खुशी-खुशी देश की सेवा के लिए भेजा था। इसी दौरान नरेंद्र राठी की शादी अनिता के साथ हो गई। उनके घर में बेटे सुमित व बेटी सुरचना ने जन्म लेकर घर को खुशियों से भर दिया। अप्रैल 1999 में एक माह की छुट्टी घर पर काटने के बाद नरेंद्र राठी  की पोस्टिंग कारगिल की पहाड़ियों पर हो गई। ऑपरेशन विजय के दौरान दुश्मन के साथ लोहा लेता हुआ नरेंद्र राठी शहीद हो गया। वह अपने पीछे अपनी पत्नी अनिता देवी बेटा सुमित राठी तथा बेटी सुरचना को छोड़ गया। शहीद का बेटा सुमित राठी बीटेक करने के बाद नोएडा में नौकरी कर रहा है।

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फाइल फोटो

मुख्य द्वार नहीं बन पाया 
शहीद अमरेश पाल के परिजनों का कहना है कि लाडले की शहादत पर पूरे परिवार तथा गांव को फख्र है, लेकिन शहीद की याद में भोपा गंगनहर पुल पर मुख्य द्वार नहीं बन पाया। स्मारक भी नहीं बना। शहीद अमरेशपाल के भाई नेत्रपाल का कहना है कि पुण्यतिथि के समय पर एक दो वर्ष तो शासन प्रशासन के लोग आए, लेकिन अब कोई नहीं आता है।

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