कारगिल विजय दिवस: शहीद बेटे की याद में भर आती हैं बूढ़े मां-बांप की आंखें, तंगहाली में जी रहे जिंदगी
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26 जुलाई का दिन भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित है। यह वो दिन है जब देश के जांबाज सपूतों ने 1999 में हुए भारत पाकिस्तान कारगित की लड़ाई में विजय प्राप्त की थी। इस जंग में पश्चिमी यूपी के बहुत से बेटों ने बलिदान दिया जिनके वीरता का किस्से आज भी सुनाए जाते हैं ऐसे ही वीर सपूत थे सहारनपुर के लांसनायक राजेश बैरागी। जिन्होंने अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन दुश्मन को एक इंच भी आगे बढ़ने नहीं दिया। मगर सरकार आज उनके परिवार से किए सारे वादे भूल गई। आलम यह है कि अपने बेटे को देश पर न्यौछावर कर देने वाले शहीद के माता-पिता तंगहाली में गुजर बसर करने को मजबूर हैं।
बदहाल है शहीद का गांव
कारगिल में अपने सीने पर गोली खाकर लांसनायक राजेश बैरागी ने सहारनपुर का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया था। ग्राम जेहरा के राजेश बैरागी की शहादत ने हिंदुस्तान का परचम तो लहरा दिया, लेकिन प्रशासन उनकी शहादत पर किए गए वादों को भूल बैठा। उनके वयोवृद्ध बीमार माता-पिता बेहद गरीबी में जीवन बसर कर रहे हैं। शहीद का गांव भी बदहाल है। शहीद के बूढ़े मां बाप के सामने जब भी उनके बेटे का जिक्र करता है तो उनकी आंखों में अनायास ही आंसू छलछला जाते हैं।
सरकार ने पूरा नहीं किया कोई वादा
वर्ष 1999 में पाकिस्तान से हुई कारगिल की लड़ाई में गांव जेहरा निवासी पैराशूट रेजीमेंट में तैनात लांसनायक राजेश बैरागी शहीद हो गए थे। उनके अंतिम संस्कार के मौके पर जिला प्रशासन ने गंगोह के सहारनपुर बस अड्डा चौक पर शहीद की प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी। इसके साथ ही पिता को खेती के लिए जमीन देने का भी आश्वासन दिया गया था। इन घोषणाओं को आज तक पूरा नहीं किया गया है। इसके अलावा लापरवाही के चलते शहीद राजेश बैरागी के नाम से गंगोह वजीरपुर मार्ग का नामकरण कर शिलापट लगाया गया था।
लापरवाही के कारण वह शिलापट गायब हो चुका है। अब बस केवल गांव दूधला में ही जेहरा जा रहे मार्ग पर एक शिलापट लगा हुआ है। पिता ताराचंद एवं भाई राकेश बैरागी का कहना है कि शहीदों को शासन, प्रशासन एवं नेता चंद दिनों बाद ही भूल जाते हैं। कहा कि अब तो राष्ट्रीय पर्वों एवं कारगिल दिवस तक पर प्रशासन की ओर से कोई गांव तक नहीं आता।
दवा के लिए शहीद के मां बाप को लेना पड़ रहा है उधार
कारगिल युद्ध में शहीद हुए लांस नायक राजेश बैरागी के 90 वर्षीय वयोवृद्ध पिता ताराचंद बैरागी और 85 वर्षीय माता कांति देवी को जहां अपने बेटे की शहादत पर गर्व है। वहीं सरकार से अनेक शिकायतें है। बेटे को याद कर ताराचंद की आंखें डबडबा जाती हैं। उन्होंने रुंधे गले से कहा कि शहादत के बाद सरकार ने उनकी पेंशन तो आरंभ कर दी थी, लेकिन उन्हें पेंशन के लिए साल-साल भर इंतजार करना पड़ता है।
उनका कहना है कि पेंशन न मिलने के कारण वह अपना और शहीद की मां का उपचार तक नहीं करा पा रहे हैं। दवा के लिए भी उन्हें उधार लेना पड़ता है। उन्होंने बताया कि बेटे के शहीद होने के बाद बहू भी उन्हें छोड़कर चली गई। जो आजकल यमुनानगर में रह रही है। बताया कि बहू पौत्र के साथ कभी कभी गांव तो आ जाती है पर उनकी कोई मदद नहीं करती है।