Kargil Vijay Day: जिनके इरादों को पहाड़ की आसमान छूती चोटियां भी नहीं डिगा पाईं... वो लौटे लेकिन तिरंगे में लिपटकर
- 2 महीने तक चली थी 1999 में कारगिल की लड़ाई
- 572 जवान-अफसर हुए थे शहीद भारतीय सेना के
- 05 लाल क्रांतिधरा के भी शहीद हुए थे कारगिल में
विस्तार
आए लेकिन तिरंगे में लिपटकर...
सन 1999 मई महीने की बात थी। अचानक मनहूस खबर आई। कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कई किलोमीटर तक कब्जा कर लिया है। पूरे देश में सेना के जवानों-अफसरों को छुट्टियां रद कर दी गईं। अधिकतर यूनिट का मूवमेंट कारगिल में होने लगा। जंग शुरू हो गई। पाकिस्तानी सैनिक हजारों मीटर ऊंची पहाड़ की चोटियों पर बैठे थे और भारतीय सेना को आसमान छूते इन पहाड़ों पर चढ़कर दुश्मन को खत्म करना था।
इतने दुर्गम इलाके में ये लड़ाई आसान नहीं थी। लेकिन दो महीने तक चले इस भीषण युद्ध में भारतीय सेना ने अपने अद्भुत शौर्य और पराक्रम के चलते कारगिल की चोटियों पर तिरंगा फहरा दिया। लेकिन इस विजय को पाने में भारतीय सेना के 572 वीर शहीद हो गए। देश का कोई कोना ऐसा नहीं था जब तिरंगे में लिपटे शहीदों के पार्थिव शरीर घर न आ रहे हों। मेरठ के भी पांच लाल अपनी माटी के लिए शहीद हो गए।
-3 मई 1999 : एक चरवाहे ने भारतीय सेना को कारगिल में पाकिस्तान सेना द्वारा घुसपैठ कर कब्जा जमा लेने की सूचना दी।
-5 मई : भारतीय सेना की पेट्रोलिंग टीम जानकारी लेने कारगिल पहुंची तो पाकिस्तानी सेना ने उसे पकड़ लिया और पांच जवानों की हत्या कर दी।
-9 मई : पाकिस्तानियों की गोलाबारी से भारतीय सेना का कारगिल स्थित गोला बारूद का स्टोर नष्ट हो गया।
-27 मई : भारतीय सेना ने हमला बोला।
-14 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऑपरेशन विजय में जीत की घोषणा की।
मेरठ के इन पांच वीरों ने दी थी शहादत
13 जून 1999: मेजर मनोज तलवार और सीएचएम यशवीर सिंह शहीद हुए थे
3 जुलाई 1999: नायक जुबैर अहमद हुए थे शहीद
28 जून 1999: लांस नायक सत्यपाल सिंह हुए थे शहीद
5 जुलाई 1999: ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव शहीद हुए थे
मेरठ से भेजी गई थीं दो यूनिट
युद्ध शुरू हुआ तो मेरठ से सेना की दो रेजीमेंट खास तौर पर कारगिल हिल पर भेजी गईं। यहां तैनात 18 गढ़वाल राइफल्स को कारगिल के द्रास सेक्टर में दुश्मन का खात्मा करने के लिए भेजा गया। बटालियन को 19 जून की रात को प्वाइंट 5140 पर कब्जा करना था। दुर्गम पहाड़ियों की चोटियों पर यह कठिन कार्य था। बर्फीली हवा और दुर्गम इलाके की परवाह न करते हुऐ 18 गढ़वाल राइफल्स के वीर सैनिकों ने वीरता का परिचय देते हुए द्रास सेक्टर की दुर्गम चोटियों पर कब्जा कर लिया।
इसके बाद 22 जून 1999 को बटालियन को प्वाइंट 4700 पर कब्जा किया। ऑपरेशन के दौरान 18 बहादुर जवानों ने अपनी मातृभूमि के लिये प्राणों का बलिदान दिया। इस शौर्य के लिए बटालियन को बैटल आनर द्रास और थियेटर ऑनर कारगिल से सम्मानित किया गया। बटालियन को इसके लिए 6 वीर चक्र, 2 सेना मेडल, 7 सेना मेडल, सात मेंशन इन डिस्पैच, 2 थल सेनाध्यक्ष प्रशंसा पत्र भी मिले।
197 कारगिल रेजीमेंट ने दागे थे 24 हजार गोले
दूसरी यूनिट मेरठ से197 कारगिल रेजीमेंट भेजी गई थी। इस यूनिट के रणबांकुरों ने कारगिल के युद्ध में 24 हजार दो सौ 39 गोले दागकर दुश्मन को नेस्तनाबूद कर दिया। तोलोलिंग, टाइगर हिल और प्वाइंट 5140 पर दुश्मन को तबाह कर दिया था।
इस पराक्रम के लिए रेजीमेंट को 5 सेना मेडल, 1 मैन्सन इन डिस्पेच, 2 सेनाध्यक्ष प्रशंसा पत्र और 14 जीओसी इन सी प्रशंसा पत्र दिए गए। रेजीमेंट के सराहनीय कार्य के के लिए तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल पीवी मलिक ने 15 जनवरी 2000 को प्रशंसा पत्र भेंट किया। कारगिल युद्ध में किए गए महत्वपूर्ण योगदान के लिए रेजीमेंट को 17 जुलाई 2005 को ऑनर टाइटल कारगिल से नवाजा गया।