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जिनवाणी जीवन का दर्पण, ज्ञान को आचरण में उतारना ही सच्ची साधना : डॉ. श्रुत पूर्णा
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सरधना। आदर्श नगर स्थित नूतन श्री चंद्रप्रभु जैन श्वेतांबर मंदिर में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन क
संवाद न्यूज एजेंसी
सरधना। आदर्श नगर स्थित नूतन श्री चंद्रप्रभु जैन श्वेतांबर मंदिर में आयोजित धर्मसभा में साध्वी डॉ. श्रुत पूर्णा एवं साध्वी इष्ट प्रिया ने श्रद्धालुओं को जिनवाणी का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि जिनवाणी दर्पण के समान है, जो मनुष्य को उसके गुण और अवगुण का बोध कराकर जीवन की सही दिशा दिखाती है।
प्रवचन में डॉ. श्रुत पूर्णा श्री ने कहा कि जैसे दर्पण चेहरे की वास्तविक स्थिति दिखाता है और व्यक्ति उसे देखकर स्वयं को सुधार सकता है, उसी प्रकार जिनवाणी आत्ममंथन का माध्यम बनकर जीवन को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने कहा कि जीवन में तीन प्रकार के लोग होते हैं। पहले वह, जो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं, ऐसे लोगों के लिए ज्ञान का कोई महत्व नहीं होता। दूसरे वह, जो सुनकर केवल दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन करते हैं। जबकि तीसरे वे लोग होते हैं, जो ज्ञान को हृदय से ग्रहण कर उसे अपने आचरण में उतारते हैं। वही वास्तविक अर्थों में ज्ञानी कहलाते हैं।
उन्होंने कहा कि ज्ञान होना और ज्ञानी होना दोनों अलग बातें हैं। सच्चा ज्ञानी वही है, जो अपने जीवन में ज्ञान का पालन करता है। संचालन मंदिर ट्रस्ट संघ के अध्यक्ष आलोक जैन ने किया। नामित सभासद दीपक जैन का श्रीसंघ की ओर से सम्मान किया गया। धर्मसभा में संघ के संरक्षक सतेंद्र जैन, मंत्री रमेशचंद जैन, जयप्रकाश जैन, जगदीश प्रसाद जैन, वीरेंद्र जैन, राजीव जैन, नरेंद्र जैन, मोंटू जैन, मोहित जैन, ऋषभ जैन मौजूद रहे।
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सरधना। आदर्श नगर स्थित नूतन श्री चंद्रप्रभु जैन श्वेतांबर मंदिर में आयोजित धर्मसभा में साध्वी डॉ. श्रुत पूर्णा एवं साध्वी इष्ट प्रिया ने श्रद्धालुओं को जिनवाणी का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि जिनवाणी दर्पण के समान है, जो मनुष्य को उसके गुण और अवगुण का बोध कराकर जीवन की सही दिशा दिखाती है।
प्रवचन में डॉ. श्रुत पूर्णा श्री ने कहा कि जैसे दर्पण चेहरे की वास्तविक स्थिति दिखाता है और व्यक्ति उसे देखकर स्वयं को सुधार सकता है, उसी प्रकार जिनवाणी आत्ममंथन का माध्यम बनकर जीवन को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने कहा कि जीवन में तीन प्रकार के लोग होते हैं। पहले वह, जो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं, ऐसे लोगों के लिए ज्ञान का कोई महत्व नहीं होता। दूसरे वह, जो सुनकर केवल दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन करते हैं। जबकि तीसरे वे लोग होते हैं, जो ज्ञान को हृदय से ग्रहण कर उसे अपने आचरण में उतारते हैं। वही वास्तविक अर्थों में ज्ञानी कहलाते हैं।
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उन्होंने कहा कि ज्ञान होना और ज्ञानी होना दोनों अलग बातें हैं। सच्चा ज्ञानी वही है, जो अपने जीवन में ज्ञान का पालन करता है। संचालन मंदिर ट्रस्ट संघ के अध्यक्ष आलोक जैन ने किया। नामित सभासद दीपक जैन का श्रीसंघ की ओर से सम्मान किया गया। धर्मसभा में संघ के संरक्षक सतेंद्र जैन, मंत्री रमेशचंद जैन, जयप्रकाश जैन, जगदीश प्रसाद जैन, वीरेंद्र जैन, राजीव जैन, नरेंद्र जैन, मोंटू जैन, मोहित जैन, ऋषभ जैन मौजूद रहे।
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