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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Meerut News ›   Jayanti Special: shayar Hafeez Meerthi shook the foundation of British rule with his shayri

जयंती विशेष: 'देशप्रेम और खुद्दारी का पैकर...', हां, मैं हूं हफीज मेरठी! ब्रिटिश हुकूमत की हिला दी थी नींव

Wed, 10 Jan 2024 01:03 PM IST
Dimple Sirohi राजन शर्मा, अमर उजाला, मेरठ
राजन शर्मा, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Wed, 10 Jan 2024 01:03 PM IST
सार

मशहूर शायर हफीज मेरठी ने अपने अशआर से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। यही नहीं ताउम्र उन्होंने समाज और जिंदगी की कड़वी सच्चाई को शायरी के कैनवास पर उकेरा।  गुल ओ बुल, जाम ओ मीना और तितलियों के फसाने नहीं लिखे, बल्कि अपने फन और फिक्र को समाजी मसाइल व जंगे आजादी का परचम बना लिया।  

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Jayanti Special: shayar Hafeez Meerthi shook the foundation of British rule with his shayri
हफीज मेरठी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

हर जालिम से टक्कर ली सच्चे फनकारों ने हफीज, 

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हम वो नहीं जो डर के कह दें, हम हैं ताबेदारों में।

ये लाइनें महज लफ्जों की बुनावट नहीं, बल्कि यलगार हैं। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के दौरान फैज ए आम इंटर कालेज, मेरठ के मैदान में जलसा आयोजित किया गया। इसमें इंकलाबी शायर हफीज मेरठी ने ये शेर जोश ओ खरोश के साथ पढ़ा तो अंग्रेज अफसरों के इशारे पर पुलिसकर्मी हफीज मेरठी पर उनके बेहोश होने तक लाठियां बरसाते रहे।

होश आने पर इस क्रांतिकारी को अंग्रेज जज के सामने पेश किया गया। जज ने कहा कि अपने बचाव में आपको कुछ कहना है तो बोलिए। हफीज ने वहां भी बगावती तेवरों के साथ पढ़ना शुरू कर दिया कि-
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जब सबके लब सिल जाएंगे हाथों से कलम छिन जाएंगे, 
कातिल से लोहा लेने का ऐलान करेंगी जंजीरें।
आजादी का दरवाजा भी खुद ही खोलेंगी जंजीरें, 
टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगी जब हद से बढ़ेंगी जंजीरें।।

रोंगटे खड़े देने वाले इस वाकये का जिक्र इसलिए आया है कि आज ही के दिन 10 जनवरी 1922 को मेरठ के मोहल्ला पूर्वा शेखलाल में हकीम इब्राहिम के यहां अदब का चिराग रोशन हुआ था। घर के बड़ों ने नाम रखा हफीजुर्रहमान। शायरी का शौक चढ़ा तो आसिम बरेलवी की शार्गिदगी में रदीफ, काफिया व बहर की तकनीक थोड़ी उम्र में ही समझ ली और फूलों की पंखुड़ियों से पत्थर का जिगर चाक करने में महारत हासिल कर ली।

हफीजुर्रहमान ने अपना उपनाम रखा हफीज मेरठी। इन्होंने गुल ओ बुल, जाम ओ मीना और तितलियों के फसाने नहीं लिखे, बल्कि अपने फन और फिक्र को समाजी मसाइल व जंगे आजादी का परचम बना लिया। इनके लिखे अशआर अदब के माथे का झूमर बन गए। हफीज का गजल संग्रह शेर ओ शऊर और गहराईयां हैं। एक दीवान मता ए आखिरी शब को उर्दू अकादमी पुरस्कार मिला।

1975 में आपातकाल के दौरान साहित्य और सियासत के बड़े-बड़े दिग्गजों ने मौन साध लिया था तो उस वक्त भी इस शायर के अंदर का क्रांतिकारी जाग उठा। उन्होंने गरज के साथ शेर पढ़ा तो जेल मे डाल दिए गए। शेर था कि- 
आज कुछ ऐसा तय पाया है हक के ईजारादारों में,
हम पर जो ईमान न लाए चिनवा दो दीवारों में। 
सूरज को दो देश निकाला दिन का किस्सा पाक करो, 
बनते हैं ऐसे मंसूबे रात के रिश्तेदारों में।।

हफीज मेरठी ने समाज में फैली बुराईयों को शब्दों के पैकर में इस तरह ढाला कि वो समाज के लिए नायाब आईना बन गए। खुदगर्जी को भी उन्होंने बड़े सलीके से पेश किया कि-
कैसी भी मुसीबत हो बड़े शौक से आए,
कमजर्फ के अहसान से अल्लाह बचाए।


बहरहाल, हफीज मेरठी चमक-दमक से दूर रहे, लेकिन उनके शेर फनपारों की तरह समाज में रोशनी बिखेर रहे हैं। किराए के एक कमरे में बहुत सी किताबों के दरमियान खुद्दारी के साथ जिंदगी गुजारी और सात जनवरी 2000 को शायरे हिंद ये कहते हुए दो गज जमीन के दायरे में हमेशा के लिए सो गया कि-
हयात जिसकी अमानत थी उसको लौटा दी, 
मैं आज चैन से सोया हूं पांव फैलाकर।।  

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हुकूमत ने इनाम दिया 
कलंदर ने इन्कार किया

हफीज मेरठी उस आम आदमी की तरह जिंदगी बसर कर गए, जहां भूख और फाकों का अहसास होता है। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उन्हें यश भारती की पेशकश की, लेकिन इन्होंने साफ इंकार कर दिया। वरिष्ठ शायर डाॅ. नवाज देवबंदी की पहल पर जिला प्रशासन ने जिमखाना मैदान में हफीज मेरठी का नागरिक अभिनंदन किया। प्रशासन ने उन्हें दो लाख रूपये की मदद राशि देनी चाही, लेकिन इस खुद्दार शायर ने लेने से इंकार कर दिया। नवाज देवबंदी को इसका मलाल है कि हफीज साहब को अदब में वो सम्मान नहीं मिला, जिसके वो हकदार थे।   

साहित्य में हफीज साहब ने विशिष्ठ स्थान बनाया है। उनकी सृजन यात्रा का सहयात्री बनना ही महान शायर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। -हरिओम पंवार, ओज के कवि  

हफीज मेरठी ने अपनी अना को घायल नहीं होने दिया। उन्होंने  जिंदगी के तल्ख पहलुओं को   बड़े ही करीने से पेश किया। -अजहर इकबाल शायर 

मेरी खुशकिस्मती है कि मुझे हफीज साहब की सोहबत मिली। उनका तंज करने का ढंग निराला था। उनसे बहुत सीखने को मिला। -निर्मल गुप्ता, व्यंग्यकार

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