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Meerut News: अंग्रेजों की कूटनीति से रूबरू कराया, एकता का पाठ भी पढ़ा गए भागवत
Mon, 20 Mar 2023 01:59 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
Updated Mon, 20 Mar 2023 01:59 AM IST
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मेरठ/हस्तिनापुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत हस्तिनापुर में हुए कृषक सम्मेलन गौ आधारित जैविक खेती की सीख के साथ-साथ भारत की परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन का भी पाठ पढ़ा गए। अपने 40 मिनट के संबाेधन में वह मांसाहार और शाकाहार खुलकर बोले। उन्होंने अंग्रेजों की कूटनीति से किसानों को रूबरू कराया और आपसी एकता का संदेश दिया।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत के लोग भारत की स्वतंत्रता का 75वां वर्ष मना रहे हैं। इसमें स्व अद्भुत शब्द है। इसका मतलब है कि किसी की ओर देखना न पड़े, किसी की ओर जाना न पड़े। अपनी बुद्धि और मन के आधार पर जो सही हो वह करें। हमारे यहां मांसाहारी लोगों की अच्छी खासी संख्या है, लेकिन वे भी रोज नहीं खाते हैं। खाते हैं तो उसमें में भूमि से निकलने वाला शाकाहार मिलाकर खाते हैं। हमारा मुख्य भोजन जमीन से निकलने वाला शाकाहार है। पश्चिमी देशों में पशु पक्षी मारकर खाना लोगों की मजबूरी है। उन्होंने भारत से साहियावाल आदि गाय ले जाकर क्रास ब्रीड भी की। लेकिन वह इतना ही समझते हैं कि गाय का दूध पिया और दूध बंद हुआ तो मांस खा लिया। हमारे यहां गाय संस्कृति है। पहले तो दूध बेचना तक पाप समझा जाता था।
भागवत ने कहा कि गौ आधारित जैविक खेती हमारी परंपरा है। इससे हमारी प्रतिष्ठा है और इसे अनुशासन के साथ अपनाना चाहिए। अंग्रेजों के लिए उन्होंने कहा कि जिनसे हमने स्वतंत्रता ली, उनके साम्राज्य पर सूर्य अस्त नहीं होता था, लेकिन 1857 में भारतवालों ने अपने सारे भेद भूलकर, स्वार्थ भूलकर, एक हो गए। इससे अंग्रेजों को कूटनीति करनी पड़ी। पहले पत्थरों से भवन बनते थे तो उन्होंने नियम बना दिया कि अब जो भी भवन बनेगा वह इंग्लैंड के पोर्टलैंड सीमेंट का बनेगा। इससे महाराष्ट्र में 30 हज़ार परिवार बेरोजगार हो गए। उन्होंने आवाज उठाई तो उन्हें अपराधी करार कर दिया जाता था।
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किसान हैं भारतवर्ष के प्राण
भागवत ने कहा कि भारत की प्रतिष्ठा जो दुनिया में है वह खेत और जंगल से ही है। बेहतर खेती से दुनिया और गति से आगे बढ़ सकेगी। किसान भारतवर्ष के प्राण हैं, यह सारी दुनिया के लिए हैं। खेती किसानों की प्रयोगशाला है। सदियों के अनुभव से यह ज्ञान मिला है। ज्ञान शास्वत है सत्य है। भूमि से उतना ही लीजिए जितनी आवश्यकता है। पश्चिमी देशों की जमीन इतनी उपजाऊ नहीं हैं। इतनी औषधियां, वनस्पति वहां नहीं हैं। दुनिया भारत की तरफ देख रही है। सीखना चाहती है। हम भी सिखाना चाहते हैं। ऐसी कृषि ही सृष्टि का भी दोहन न हो और किसान का भी शोषण न हो। प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता बनी रहे। भारत में हो रही गौ आधारित खेती को तीन देशों ने मान लिया है और उसकी सराहना की है।
अब वैज्ञानिक भी मानने लगे
भागवत ने कहा कि रसायन के ज्यादा प्रयोग से होने वाली बीमारियों और खराब होती जमीन के बारे में अब से 30-40 साल पहले वैज्ञानिक भी नहीं मानते थे, लेकिन वे भी अब मानने लगे हैं। हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं है, जो पुराना है सब अच्छा है और जो नया है वह सब खराब है। सही तरीका यह है कि उसकी परीक्षा कर फिर उसे अपनाएं।
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आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत के लोग भारत की स्वतंत्रता का 75वां वर्ष मना रहे हैं। इसमें स्व अद्भुत शब्द है। इसका मतलब है कि किसी की ओर देखना न पड़े, किसी की ओर जाना न पड़े। अपनी बुद्धि और मन के आधार पर जो सही हो वह करें। हमारे यहां मांसाहारी लोगों की अच्छी खासी संख्या है, लेकिन वे भी रोज नहीं खाते हैं। खाते हैं तो उसमें में भूमि से निकलने वाला शाकाहार मिलाकर खाते हैं। हमारा मुख्य भोजन जमीन से निकलने वाला शाकाहार है। पश्चिमी देशों में पशु पक्षी मारकर खाना लोगों की मजबूरी है। उन्होंने भारत से साहियावाल आदि गाय ले जाकर क्रास ब्रीड भी की। लेकिन वह इतना ही समझते हैं कि गाय का दूध पिया और दूध बंद हुआ तो मांस खा लिया। हमारे यहां गाय संस्कृति है। पहले तो दूध बेचना तक पाप समझा जाता था।
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भागवत ने कहा कि गौ आधारित जैविक खेती हमारी परंपरा है। इससे हमारी प्रतिष्ठा है और इसे अनुशासन के साथ अपनाना चाहिए। अंग्रेजों के लिए उन्होंने कहा कि जिनसे हमने स्वतंत्रता ली, उनके साम्राज्य पर सूर्य अस्त नहीं होता था, लेकिन 1857 में भारतवालों ने अपने सारे भेद भूलकर, स्वार्थ भूलकर, एक हो गए। इससे अंग्रेजों को कूटनीति करनी पड़ी। पहले पत्थरों से भवन बनते थे तो उन्होंने नियम बना दिया कि अब जो भी भवन बनेगा वह इंग्लैंड के पोर्टलैंड सीमेंट का बनेगा। इससे महाराष्ट्र में 30 हज़ार परिवार बेरोजगार हो गए। उन्होंने आवाज उठाई तो उन्हें अपराधी करार कर दिया जाता था।
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किसान हैं भारतवर्ष के प्राण
भागवत ने कहा कि भारत की प्रतिष्ठा जो दुनिया में है वह खेत और जंगल से ही है। बेहतर खेती से दुनिया और गति से आगे बढ़ सकेगी। किसान भारतवर्ष के प्राण हैं, यह सारी दुनिया के लिए हैं। खेती किसानों की प्रयोगशाला है। सदियों के अनुभव से यह ज्ञान मिला है। ज्ञान शास्वत है सत्य है। भूमि से उतना ही लीजिए जितनी आवश्यकता है। पश्चिमी देशों की जमीन इतनी उपजाऊ नहीं हैं। इतनी औषधियां, वनस्पति वहां नहीं हैं। दुनिया भारत की तरफ देख रही है। सीखना चाहती है। हम भी सिखाना चाहते हैं। ऐसी कृषि ही सृष्टि का भी दोहन न हो और किसान का भी शोषण न हो। प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता बनी रहे। भारत में हो रही गौ आधारित खेती को तीन देशों ने मान लिया है और उसकी सराहना की है।
अब वैज्ञानिक भी मानने लगे
भागवत ने कहा कि रसायन के ज्यादा प्रयोग से होने वाली बीमारियों और खराब होती जमीन के बारे में अब से 30-40 साल पहले वैज्ञानिक भी नहीं मानते थे, लेकिन वे भी अब मानने लगे हैं। हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं है, जो पुराना है सब अच्छा है और जो नया है वह सब खराब है। सही तरीका यह है कि उसकी परीक्षा कर फिर उसे अपनाएं।