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घट में करें ईश्वर का साक्षात् दर्शन : डॉ. सर्वेश्वर
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मेरठ। गढ़ रोड स्थित बुद्धा गार्डन में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित शिव कथा में व्यास डॉ. सर्वेश्वर ने सती प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। सुमधुर भजनों एवं चौपाइयों के माध्यम से हर किसी का उन्होंने मन मोह लिया। बताया कि भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी सती के साथ अगस्त मुनि के आश्रम में प्रभु राम की कथा श्रवण करने जाते हैं।
कथा व्यास ने बताया कि सती उस समय किसी कारणवश कथा के वास्तविक मर्म को नहीं समझ पातीं। यह भी प्रभु की ही लीला थी। जब वे भगवान राम को साधारण मानव लीला करते हुए देखती हैं। तो उनके मन में संशय उत्पन्न हो जाता है।
महादेव के निर्देश पर सती ने तब प्रभु राम की परीक्षा लेने जाती हैं। परंतु असफल होकर लौटती हैं। शिव से असत्य वचन कह देती हैं। परिणामस्वरूप उनका शिव से वियोग हो जाता है। इस प्रसंग के माध्यम से डॉ. सर्वेश्व ने स्पष्ट किया कि ईश्वर तर्क-वितर्क, मन, वाणी और बुद्धि से परे है। उन्होंने कहा कि रावण जैसा वेदों का ज्ञाता भी बुद्धि के माध्यम से प्रभु को समझने में असफल रहा।
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उन्होंने कहा कि ईश्वर तर्क का नहीं बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है। समय के पूर्ण सद्गुरु द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त होने पर ही ईश्वर का साक्षात् दर्शन संभव है। सद्गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर मनुष्य को अपने ही भीतर ईश्वर का अनुभव करना चाहिए।
स्वामी नरेशानंद ने बताया कि यह पावन कथा गौ संरक्षण प्रकल्प कामधेनु को समर्पित है। यह प्रकल्प भारतीय गाय के महत्व को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से समाज में जागरूकता फैलाने का कार्य कर रहा है। स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि एवं अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।
कार्यक्रम में आशुतोष महाराज जी के प्रतिभाशाली शिष्यों द्वारा प्रस्तुत मधुर भजनों ने वातावरण को शिवमय बना दिया। मंच पर सुसज्जित भोलेनाथ का दिव्य दरबार एवं आकर्षक झांकियां कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षण रहे। अंत में दिव्य आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ आयोजन संपन्न हुआ।
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कथा व्यास ने बताया कि सती उस समय किसी कारणवश कथा के वास्तविक मर्म को नहीं समझ पातीं। यह भी प्रभु की ही लीला थी। जब वे भगवान राम को साधारण मानव लीला करते हुए देखती हैं। तो उनके मन में संशय उत्पन्न हो जाता है।
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महादेव के निर्देश पर सती ने तब प्रभु राम की परीक्षा लेने जाती हैं। परंतु असफल होकर लौटती हैं। शिव से असत्य वचन कह देती हैं। परिणामस्वरूप उनका शिव से वियोग हो जाता है। इस प्रसंग के माध्यम से डॉ. सर्वेश्व ने स्पष्ट किया कि ईश्वर तर्क-वितर्क, मन, वाणी और बुद्धि से परे है। उन्होंने कहा कि रावण जैसा वेदों का ज्ञाता भी बुद्धि के माध्यम से प्रभु को समझने में असफल रहा।
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उन्होंने कहा कि ईश्वर तर्क का नहीं बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है। समय के पूर्ण सद्गुरु द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त होने पर ही ईश्वर का साक्षात् दर्शन संभव है। सद्गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर मनुष्य को अपने ही भीतर ईश्वर का अनुभव करना चाहिए।
स्वामी नरेशानंद ने बताया कि यह पावन कथा गौ संरक्षण प्रकल्प कामधेनु को समर्पित है। यह प्रकल्प भारतीय गाय के महत्व को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से समाज में जागरूकता फैलाने का कार्य कर रहा है। स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि एवं अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।
कार्यक्रम में आशुतोष महाराज जी के प्रतिभाशाली शिष्यों द्वारा प्रस्तुत मधुर भजनों ने वातावरण को शिवमय बना दिया। मंच पर सुसज्जित भोलेनाथ का दिव्य दरबार एवं आकर्षक झांकियां कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षण रहे। अंत में दिव्य आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ आयोजन संपन्न हुआ।