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गंगा तेरा पानी ही नहीं अब तट भी अमृत   

Fri, 23 Feb 2018 01:49 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 23 Feb 2018 01:49 AM IST
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ganga tera paani hi nahi tat bhi amrat
फाइल फोटो - फोटो : meerut
गंगा पतित पावनी है, इसका पानी अमृत है। ऐसी धारणा युगों युगाें से चली आ रही है। नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत अब गंगा का तट भी लोगों के काम आएगा। इसके लिए वन विभाग ने हस्तिनापुर इलाके के तीन गांव भगवानपुर, सिकंदरपुर और दूधली में औषधीय पौधे लगाने का काम शुरू कर दिया है। कई दूसरे राज्यों से 36 हजार औषधीय पौधे मंगाकर उन्हें परीक्षितगढ़ नर्सरी में तैयार कर लिया है। ये औषधीय पौधे जटिल रोगों के इलाज में काम आएंगे।
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 गंगा को निर्मल बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से नमामि गंगे प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई थी। इसके लिए उत्तराखंड, यूपी, बिहार, वेस्ट बंगाल के लिए मिट्टी और मौसम को देखते हुए अलग-अलग मॉडल बनाए जाने थे। फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया देहरादून को मॉडल तैयार करने की जिम्मेदारी मिली थी। मेरठ में इसके लिए एनएफ-पी-वन मॉडल तय किया गया। डीएफओ अदिति शर्मा ने बताया कि इस मॉडल के तहत भगवानपुर, सिकंदरपुर और दूधली में दस-दस हेक्टेयर भूमि पर काम शुरू हो गया है। गड्ढों की खुदाई हो चुकी है। गाइड लाइन के मुताबिक जो औषधीय पौधे रोपे जाने हैं, उन्हें तैयार करके परीक्षितगढ़ नर्सरी में रख दिया गया है। मॉडल के मुताबिक गंगा के किनारे की तरफ पहले प्रति हेक्टेयर घास के चार सौ पौधे लगाए जाएंगे। ताकि कटान न हो और अधिक पानी आने पर पौधों को नुकसान न पहुंचे। इसके बाद झाड़ियां लगाई जाएगी फिर प्रति हेक्टेयर 12 सौ औषधीय पौधे रोपे जाएंगे। दस हेक्टेयर में इनकी संख्या 12 हजार हो जाएगी। इसके बाद प्रति हेक्टेयर छह सौ दूसरे पौधे लगाए जाएंगे। तीनों गांवों में इसी तरह से पौधे रोपे जाएंगे। जुलाई में ये रोपे जाएंगे।
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 दवाइयों में हो सकेगा इस्तेमाल 
 इतनी बड़ी संख्या में रोपे गए औषधीय पौधों को विभिन्न बीमारियों के लिए बनाई जाने वाली दवाईयों में इस्तेमाल किया जाएगा। जिससे कई बीमारियों का इलाज होगा। इसी के साथ गंगा किनारे का पर्यावरण भी बदलेगा। 
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ये हैं औषधीय पौधे 
जो औषधीय पौधे लगाए जाने हैं उनमें ब्राह्मी, कोलियस, ग्रेनियम, लेमनग्रास, घ्रतकुमारी, चिटरोनेला, मेनथोल मिंट, पिपली, रोजमेरी, सतावर, सर्पगंधा, स्टेविया, वाच, वेटीवर, अफ्रीकन मेरीगोल्ड, अश्वगंधा, ब्लैक हेनबेन, चमोली, करलमेघ, केवान्च, मिल्क थिस्टल, ओपियम पॉपी, पालमारोसा, स्वीट फिनाल, तुलसा, तुलसी, डामास्क रोज आदि शामिल हैं।  मेरठ कॉलेज के बॉटनी विभाग के डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि ये पौधे एक जगह पर नहीं मिलते हैं। अलग-अलग राज्यों में पाए जाते हैं। ऐसे में इनका एक साथ उगाया जाना बहुत उपयोगी है। मेरठ के तीनों गांवों का भी इससे नाम होगा।   


तेजी से चल रहा काम
नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत तेजी से काम चल रहा है। हाल ही में पौधे तैयार कराकर नर्सरी में रखे गए हैं। गड्ढों की खुदाई कराई जा चुकी है। जुलाई में इन पौधों को रोपा जाएगा। तीनों गांवों को भी इसका लाभ मिलेगा। -अदिति शर्मा, डीएफओ 
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