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गांधी जयंती विशेष: हिंदुओं की कमीज पर था चांद-सितारा, मुस्लिमों ने लगाया पीला टीका
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मेरठ। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हमेशा भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल थे। क्रांतिधरा से उनकी कभी न मिटने वाली यादेें जुड़ीं हैं। बापू 1920 में आए तो मेरठ की धरती भाईचारे की मिसाल बन गई। बापू के कारवां में हिंदुओं की कमीज पर चांद-सितारा का चिह्न और मुस्लिमों ने पीला टीका लगाया था। उन्होंने मेरठ कॉलेज में वट वृक्ष के नीचे आयोजित यज्ञ में आहुति देकर स्वतंत्रता की अलख जगाई थी।
महात्मा गांधी का मेरठ से खासा लगाव रहा। पहली बार वह वर्ष 1920 जनवरी में मेरठ आए थे। यहां पर रात्रि प्रवास किया और चार स्थानों पर सभाएं कीं। वह मेरठ कॉलेज गए और छात्रों से मुलाकात की। मेरठ कॉलेज में वट वृक्ष के नीचे उन्होंने यज्ञ में शामिल होकर आहुति दी थी। देवनागरी कॉलेज से घंटाघर तक निकाले गए जुलूस में लोगों ने हिंदू-मुस्लिम एकता का परिचय दिया था। जिमखाना और कैसल व्यू पर हुई जनसभाओं में गांधी जी ने खिलाफत और असहयोग आंदोलन को एक सूत्र में पिरोया।
इतिहासकार प्रो. केडी शर्मा बताते हैं कि देवनागरी कॉलेज में स्वागत समारोह के बाद उन्होंने जुलूस का नेतृत्व किया था। इसमें हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की गई। जुलूस में हिंदुओं ने चांद-सितारा का चिह्न और मुस्लिमों ने पीला टीका लगा रखा था।
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नवाब इस्माइल के यहां किया रात्रि विश्राम
वर्ष 1920 में रेलवे रोड चौराहे पर लोगों ने भव्य स्वागत किया था। यहां से वह टाउन हॉल पहुंचे और सभा की। इसके बाद जिमखाना मैदान गए। जिमखाना को तब बर्फखाना कहा जाता था। यहां सभा करने के बाद वह मेरठ कॉलेज गए और छात्रों से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने वेस्ट एंड रोड पर नवाब इस्माइल के यहां पर रात्रि विश्राम किया था। इसके बाद गांधीजी 1929 में दोबारा मेरठ आए।
मेरठ में बना गांधी आश्रम का प्रधान कार्यालय
महात्मा गांधी पूरे देश में असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिए जनसभा कर रहे थे। दूसरी ओर बनारस हिंदू विवि से इस्तीफा देकर आचार्य जेबी कृपलानी अपने 20 छात्रों के साथ मेरठ गांधी आश्रम की नींव रखी। गांधी आश्रम की स्थापना 30 नवंबर, 1920 में हुई। उस दौरान बापू भी गांधी आश्रम पहुंचे। वर्ष 1926 में गांधी आश्रम का प्रधान कार्यालय बनारस से मेरठ लाया गया था।
बरगद का पेड़ दिलाता है बापू की याद
मेरठ कॉलेज में स्थित मंगल पांडे हॉल के पीछे पार्क में बरगद का पेड़ आज भी बापू की याद दिलाता है। उन्होंने इसी पेड़ के नीचे बैठकर छात्र-छात्राओं को संबंधित किया और यज्ञ में हिस्सा लिया था। कॉलेज में लगे बरगद के पेड़ को देखने के लिए लोग बाहर से भी आते हैं। मेरठ कॉलेज के प्रो. राय का कहना है कि 1857 की क्रांति में कॉलेज के छात्रों ने सहयोग किया था। बरगद का पेड़ भारत छोड़ो आंदोलन की भी याद दिलाता है।
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महात्मा गांधी का मेरठ से खासा लगाव रहा। पहली बार वह वर्ष 1920 जनवरी में मेरठ आए थे। यहां पर रात्रि प्रवास किया और चार स्थानों पर सभाएं कीं। वह मेरठ कॉलेज गए और छात्रों से मुलाकात की। मेरठ कॉलेज में वट वृक्ष के नीचे उन्होंने यज्ञ में शामिल होकर आहुति दी थी। देवनागरी कॉलेज से घंटाघर तक निकाले गए जुलूस में लोगों ने हिंदू-मुस्लिम एकता का परिचय दिया था। जिमखाना और कैसल व्यू पर हुई जनसभाओं में गांधी जी ने खिलाफत और असहयोग आंदोलन को एक सूत्र में पिरोया।
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इतिहासकार प्रो. केडी शर्मा बताते हैं कि देवनागरी कॉलेज में स्वागत समारोह के बाद उन्होंने जुलूस का नेतृत्व किया था। इसमें हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की गई। जुलूस में हिंदुओं ने चांद-सितारा का चिह्न और मुस्लिमों ने पीला टीका लगा रखा था।
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नवाब इस्माइल के यहां किया रात्रि विश्राम
वर्ष 1920 में रेलवे रोड चौराहे पर लोगों ने भव्य स्वागत किया था। यहां से वह टाउन हॉल पहुंचे और सभा की। इसके बाद जिमखाना मैदान गए। जिमखाना को तब बर्फखाना कहा जाता था। यहां सभा करने के बाद वह मेरठ कॉलेज गए और छात्रों से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने वेस्ट एंड रोड पर नवाब इस्माइल के यहां पर रात्रि विश्राम किया था। इसके बाद गांधीजी 1929 में दोबारा मेरठ आए।
मेरठ में बना गांधी आश्रम का प्रधान कार्यालय
महात्मा गांधी पूरे देश में असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिए जनसभा कर रहे थे। दूसरी ओर बनारस हिंदू विवि से इस्तीफा देकर आचार्य जेबी कृपलानी अपने 20 छात्रों के साथ मेरठ गांधी आश्रम की नींव रखी। गांधी आश्रम की स्थापना 30 नवंबर, 1920 में हुई। उस दौरान बापू भी गांधी आश्रम पहुंचे। वर्ष 1926 में गांधी आश्रम का प्रधान कार्यालय बनारस से मेरठ लाया गया था।
बरगद का पेड़ दिलाता है बापू की याद
मेरठ कॉलेज में स्थित मंगल पांडे हॉल के पीछे पार्क में बरगद का पेड़ आज भी बापू की याद दिलाता है। उन्होंने इसी पेड़ के नीचे बैठकर छात्र-छात्राओं को संबंधित किया और यज्ञ में हिस्सा लिया था। कॉलेज में लगे बरगद के पेड़ को देखने के लिए लोग बाहर से भी आते हैं। मेरठ कॉलेज के प्रो. राय का कहना है कि 1857 की क्रांति में कॉलेज के छात्रों ने सहयोग किया था। बरगद का पेड़ भारत छोड़ो आंदोलन की भी याद दिलाता है।