मेरठ : ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आजादी की जंग लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी वेदपाल शास्त्री का सौ वर्ष की उम्र में निधन
तंत्रता सेनानी वेदपाल शास्त्री ने आजादी के बाद शिक्षा का उजियारा फैलाया। लाहौर से शास्त्री की पढ़ाई कर लौटे तो गुरुकुल डौरली में संस्कृत के शिक्षक बन गए।
विस्तार
गांव डौरली में वेदपाल शास्त्री का जन्म 1921 में हुआ था। उनके पिता लखपत सिंह किसान और माता गंगा देवी गृहणी थीं। रघुवीर शास्त्री और मूल शंकर के साथ 1942 में मेरठ घंटाघर पर तिरंगा लहराते हुए गिरफ्तारी दी थी।
पहले जिला कारागार मेरठ और इसके बाद आगरा जेल में रहे। उनके निधन से डौरली और आसपास के क्षेत्र में गम का माहौल बन गया। शाम करीब सात बजे उनका पार्थिव शरीर डौरली स्थित आवास पर लाया गया है, जहां पर एसडीएम सरधना अमित भारतीय ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
राजकीय सम्मान के साथ श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। बड़े बेटे देवराज ने मुखाग्निी दी। जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद के संगठन मंत्री दीपेंद्र जैन, गुरुकुल के प्रिंसिपल डॉ. राजेंद्र कुमार, समाज सेवी शीलेंद्र चौहान, डीएमजी इंटर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आरके सिंह, समीर चौहान, अध्यापक गुरुकुल कृष्ण कुमार ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
आजादी के बाद फैलाया शिक्षा का उजियारा
स्वतंत्रता सेनानी वेदपाल शास्त्री ने आजादी के बाद शिक्षा का उजियारा फैलाया। लाहौर से शास्त्री की पढ़ाई कर लौटे तो गुरुकुल डौरली में संस्कृत के शिक्षक बन गए। इसके बाद 53 साल तक संस्था से जुड़े रहे। शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उनके कार्य भी लोगों को हमेशा याद रहेेंगे। स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक और साहित्यकार के तौर पर उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।
वेदपाल शास्त्री डौरली में जन्में, यहीं पर पढ़े और देशसेवा के साथ शिक्षा क्षेत्र में अपनी सेवाएं दी। उन्होंने लाहौर विश्वविद्यालय से शास्त्री की पढ़ाई की थी। लाहौर से लौटकर वह गुरुकुल डौरली में संस्कृत के अध्यापक रहे।
यहीं पर 1972 से 1985 तक प्रधानाचार्य का कार्यभार संभाला। इसके अलावा वह डीएमजी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य भी रहे। उनके परिवार में तीन पुत्र थे, जिनमें एक की मृत्यु हो चुकी है।
जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद के संगठन मंत्री दीपेंद्र जैन ने बताया कि वेदपाल शास्त्री ने 1947 में यह संगठन बनाया था। जिसे अब तक चलाया जा रहा है। अब उनके वंशज संगठन को चला रहे हैं। उन्होने बताया कि स्वतंत्रता सेनानी के प्रोटोकॉल के अंतर्गत प्रशासन ने अंतिम संस्कार के लिए 12 हजार रुपये भी दिए हैं।
किसने क्या कहा
वह महान स्वतंत्रता सेनानी और हमारे प्रेरणास्रोत रहे। उनका जाना अपूरणीय क्षति है। उन्होंने स्कूल में रहते हुए शिक्षा को बढ़ावा दिया है। - डॉ. आरके सिंह, प्रधानाचार्य, डीएमजी इंटर कॉलेज
स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे आगे रहे। वह किसान परिवार में जन्मे और बहुत ही साधारण व्यक्ति थे। छोटी उम्र में ही अपनी गिरफ्तारी दी थी। उनके सहयोग को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। - शीलेंद्र
शास्त्री, समाजसेवी
वह अद्भुत प्रतिभा के धनी थी। वह साहित्यकार भी थे। उनका जाना इतिहास के बड़े स्तंभ का गिर जाना है। उन्हें लोग स्वतंत्रता सेनानी के रुप में हमेशा याद रखेंगे। - प्रमेंद्र सागर, अध्यक्ष जागृति मंच, पल्लवपुरम